वह विवाहित है। उसके दो बच्चे भी हैं। पर वह अपने घर से अपने प्रेमी के साथ भाग कर आई है। इसलिए वह आम भारतीय महिला तो नहीं है जो अपने बच्चों के लिए कलपती रहे। अपना जीवन अपने प्रेमी के साथ मजे से जीना चाहती है। यहां पर एक पेच आगया है।उसका प्रेमी जैसा अक्सर होता है उसको छोड़कर अपने गांव वापस चला गया है। सुना है शादी रचा रहा है। उस पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा है।उसकी सपनों का संसार टूट गया है।वह किसी भी हालत में अपने प्रेमी को हासिल करना चाहती है। परंतु उसके पास शादी का कोई सबूत नहीं है। हां दस महिने वह आदमी उसका पति बन कर रहा है यह गवाही काफी लोग देने तैयार हैं।परंतु जिस संसथा में वह मदद मांगने गई वह इसको ज्यादा तवज्जों नहीं दे रही है। हां मदद का बादा नहीं ठुकराया है।
वह जल्दी में है।उसको अपने प्रेमी की शादी रुकवाने में अति शीघ्र मदद चाहिए।उसकी कोई महिला मित्र भी नहीं है जो उसको ढ़ढ़स बधा सके। वह जिसको भी अपनी व्यथा सुनाएगी वही उसको नीचा देखेगी।मायके वालों से भी कोई संवाद नही है। अलबत्ता अपने पड़ोसी पुरुषों से उसको सहानुभूति तथा मदद का वादा मिल रहा है।एक ने गांव जाकर उसके प्रेमी का अपहरण कर उसको सौंप दिने का वादा किया। वह उस पड़ौसी के साथ गाव जाने तैयार होगई।
यहीं से मेरी चिंता शुरु होगई।मैंने उसको कानून अपने हाथ में नहीं लेने की सलाह दी। उसको हो सकने वाले खतरों के बारे मे बताया। लेकिन वह अपना जिद पर अड़ी रही। मेरी चिंता बढ़ गई। मैं उसे धैर्य रखने व ठंडे दिमाग से सोच सम कर ही अगला कदम उठाने की सलाह देने लगी। पर बह कहां मानने वाली थी।आखिर उसने अल्टीमेटम दे दिया कि वह चार दिन की छुट्टी लेकर उस पड़ोसी के साथ गांव जाएगी और हर हालत अपने प्रेमी को साथ लेकर आएगी।
जब वह अपना हिसाब मांगने आई तो संयोग से एक सहेली बैठी थी जिसने काफी समय तक काउनसिलिंग का काम किया है। वह बार बार उस महिला से उसके मायके वालों के बारे में पूछ रही थी। उसको समझ में नही आरहा था कि प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर वह दिल्ली क्यों आई मायके क्यों नहीं गई। खैर बड़ी मुस्किल से उसने अपना इरादा बदला और यहीं से अपना प्रेमी के विरुद्ध कागजी लड़ाई लड़ने तैयार हो गई।पर यह पूरी कवायद मन में कई सवाल छोड़ गई। मसलन् क्या उसको गांव जाने से रोकना व अपराधियों की मदद से अपने प्रेमी को हासिल करने से रोकना सही था य़ा गलत।या औरत का परिवार से रिस्ते की लक्ष्मण रेखा क्या है। परिवार तो तभी पीछे खड़ा होगा जब स्त्री के हित व परिवार के हित समान होंगे। अक्सर दोनों के आपसी हितो में द्वंद उत्पन्न हो जाता है। मसलन् दहेज का मामला।अक्सर माता पिता दहेज के लोभी परिवारों के अत्याचार सहने बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।जिनका अंजाम कई बार दहेज के लिए की गई हत्या होता है। ऐसे में अगर समाज भी औरत से उसके मायके वालों के बारे में तीखे सवाल पूछना कितना सही है।
उस पड़ौसी पर शक करना कितना सही है। क्या कोई पुरुष निस्वार्थ किसी स्त्री की सहायता के लिए कानून हाथ में लेने की हद तक जा सकता है। वह गांव नही गई और यहां सुरक्षित है। जीने के लिए उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है। यह संतोष उपरोक्त सवालों से धुधला हो गया है।क्या पितृसत्ता के चुंगल से निकलना इतना कठिन है कि मैं स्वयं तो नहीं उबर पाई यदि कोई उबरने की कोशिश भी करती है तो अनिष्ट की संभावनाओं से कांप कर उसके भी पर बांध देने की कोशिश करती हूं।
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
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