मंगलवार, 14 जून 2011

एम एफ हुसैन का जाना

एम एफ हुसैन एक नए अंतहीन सफर के लिए निकल पड़े हैं। उनके निधन ने बहादुरशाह जफर की याद दिला दी। वह भी जीवन के अंतिम क्षणों में वतन की माटी के लिए तरसते रहे। एम एफ हुसैन को भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदारों ने देश छोड़ने मजबूर कर दिया। ऐसा करते समय उनको यह भी याद नहीं रहा कि भारतीय संस्कृति में उम्र को सम्मान दिया जाता है।जन भावनाएं भड़का कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के फिराक में शायद हर घर में बच्चों को सिखाई जाने वाली यह छोटी सी मान्यता कि --बड़ों की इज्जत करो--भूल गए। परंतु एम एफ हुसैन का जाना कई सवाल छोड़ गया।
पहला क्या भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदार एम एफ हुसैन को अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार चित्र बनाने से रोक पाए। समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार रामायण के पात्रों पर चित्र बनाना उनके अधूरे कार्यक्रमों में एक था जिसमें मौत ने ही बाधा डाली ।
दूसरा हुसैन ने भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों की नाजुक भावनाओं के आहत होने पर, खबरों के अनुसार, दुःख अवश्य जताया।पर क्या ये उनसे घूंघट में (जिसको शायद ये भारतीय परंपरा मानते हैं) में हिंदू देवियों के चित्र बनाने का आश्वाशन ले पाए? यदि नही तो हुसैन को देश निकाला देकर क्या हासिल किया? हुसैन ने तो इनको अपनी कूची, वाणी तथा कर्म से निशस्त्र कर दिया। देश या देश के बाहर वह अपना काम करते रहे। उनको व्यक्तिगततौर पर जानने वालों में से किसी ने भी उनके आक्रामक, सांप्रदायिक या अशांत होने की बात नहीं कही। वह चुपचाप कूची चलाते चलाते चले गए, साथ में लिख गए कि जहां निधन हो वही दफना भी दिया जाय। इस प्रकार उन्होंने एक बार फिर भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों को निशस्त्र कर दिया।
इसकी एक बानगी तब दिखी जब एक टी वी चैनल में इनके एक प्रवक्ता सरकार पर उनके शव को भारत लाने के लिए सहयोग का आश्वासन देने के लिए हमला बोल रहे थे और आरोप लगा रहे थे कि कांग्रेस सरकार हिंदू साधु संतों की तो परवाह नही करती। स्वामी निगमानंद के निधन ने उनकी तथा उनकी पार्टी की हिंदू साधु संतों की संरक्षक की छबि पर जो दाग लगा है उसको धोने के लिए कम से कम देश तथा साधु संतो से माफी तथा भविष्य में सावधान रहने का आश्वासन तो मिलना ही चाहिये था। पर इतना बड़ा दिल तथा इतना सच्चाई गांधी के इस देश में आज कहां! खैर हुसैन तो चले गए क्या इतिहास ऐसे तत्वों को माफ करेगा ?

मंगलवार, 7 जून 2011

ईमानदार व सच्चे प्रधान मंत्री

हमारे प्रधान मंत्री बड़े सच्चे आदमी हैं। कुछ समय पहले जब उन्होंने साझा सरकार की मजबूरियों की ओर इशारा किया था तो पूरा मीडिया उनकी साफगोई तथा इमानदारी पर एक ओर से फिदा हो गया था। इसी प्रकार जब सुप्रीम कोर्ट ने अनाज सड़ाने के बजाय गरीबों को बांटने का सुझाव दिया था तो प्रधान मंत्री ने दो टूक शब्दों में न्यायपालिका को अपनी हद में रहने को कह दिया। महंगाई कम करने के मुद्दे पर भी कई बार वादे करने बाद प्रधान मंत्री ने कह दिया कि वह ज्योतिषी तो नहीं हैं। अब भ्रष्टाचार के मामले में बुरी तरह घिर चुकी सरकार को बचाने के लिए भी प्रधान मंत्री ने कह दिया कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए मेरे पास कोई जादुई छड़ी नहीं है।
प्रधान मंत्री सही कह रहे हैं इस देश तथा इस देश के वासियों की समस्याओं का निदान करना उनके वश की बात नही है। पर अमेरिका के साथ परमाणु संधि, जैतापुर में परमाणु बिजली योजना या पास्को को आदिवासियों की जमीन देना या सेज के लिए ओने पौने दामों में उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहण जैसी तमाम पर्यावरण विरोधी, जन विरोधी और अक्सर विधि असम्मत कार्यक्रमों को आमजन के विरोध के बावजूद लागू कराने की जादुई छड़ी अचानक प्रधान मंत्री जी के पास आ जाती है।
यह जादुई छड़ी कैसे और कहां से आजाती है समझने के लिए हमें अपने प्रधान मंत्री की मजबूरियों को समझना होगा। बेचारे प्रधान मंत्री की सारी ताकत तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय बाजार उपलब्ध कराने व कच्चे माल के स्त्रोत खोलने में खर्च हो जाती है। यदि ऐसा नही करें तो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव और अमेरिकी राष्ट्रपतियों का कोप भाजन होना पड़ेगा। और यह कोपभाजन भारतीय जनमानस के कोपभाजन से भारी पड़ेगा ऐसा उन्हें लगता है इसीलिए एक प्रकार के कार्यक्रमों के लिए उनके पास जादुई छड़ी है जबकि दूसरे प्रकार के कार्यक्रम उनके वश में नहीं है। विरोधी दलों के नेताओं के मुंह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मलाई लग गई है। इसलिए वे विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उन कंपनियों पर प्रहार नहीं करते। उनको सारे कमियों बुराइयों की जड़ सोनियां गांधी लगती हैं और उनके सारे वार सोनियां गांधी पर होते हैं। आखिर औरत पर लाठी भांजने में मर्दानगी अधिक निखरती है। मसलन् राजघाट पर धरना देते समय कई भा ज पा नेताओं को नाचते हुए टी वी चैनलों ने दिखाया परन्तु कांग्रेस को सुषमा स्वराज ही नाचती नजर आई। जो मजा सुषमा स्वराज पर लाठी भांजने में आया होगा वह पुरुष नेताओं पर भाजने में नही आया होगा ना।