गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

पानी से भी अधिक है संवेदना का अकाल

पानी से भी अधिक है संवेदना का अकाल
महाराष्ट्र में 11साल की योगिता ने पानी लाने की जद्दोजहत में दम तोड़ दिया।एनडीटीवी के रवीश कुमार ने (19,4,16) का प्राइम टाइम पूरे सूखाग्रस्त महाराष्ट्र में परिवार के लिए पानी जुटाने में लगे छोटे बच्चों(लड़के, लड़कियां दोनों), औरतों तथा लड़कियों की कष्टमय दिनचर्या पर किया।महाराष्ट्र में पानी तथा पर्यावरण के मुद्दों पर काम कर रहे एक सज्जन ने बताया कि टैंकर के आने पर पानी लेने की मारा मारी में कई लोग कुचले जाते हैं और कई लोगों की मौत होगई है । एक पचास साल की  महिला को कुएं से पानी भरते समय चक्कर आगया और वह गिर कर मर गई।महाराष्ट्र में मध्यम वर्ग में सामाजिक काम करने की परंपरा रही है। इन्ही सामाजिक कार्यकर्ताओं जरिये मीडिया कर्मियों को भी पता चला कि महाराष्ट्र में महिलाओं तथा बच्चों को पानी एकत्र करने में किन किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यह तथ्य भी सामने आया है कि बड़े लड़के व पुरुष घर में बैठे रहते हैं जबकि बच्चे,लड़किया व औरतें परिवार के लिए पानी जुटाने में अपनी सारी ताकत लगा देती है। यह पितृसत्ता का एक और नृशंस चेहरा है। इस चिलचिलाती धूप में ये लोग नंगे पांव ही पानी की तलाश में निकलते हैं। बूढ़ों विकलांगों की हालत का पता नही चल पाया।पानी लाने की प्रक्रिया में लड़कियों के स्कूल भी छूट गये हैं।
फिर भी महाराष्ट्र में पत्रकार भी दिलाशा जैसे संगठन जन सेवा के लिए चला रहे हैं। उनकी मदद से राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार गांव गांव पहुच कर लोगों की कठिनाइयों को मीडिया में उजागर कर रहे हैं। तथा बच्चियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए अपने योगदान का ऐलान भी करते हैं।अन्य राज्यों में जहां समाज सेवा की संस्कृति नही है वहां के लोगों की मानवीय समस्याएं महज आकड़े बन कर रह गए हैं। 10 से 13 राज्य सूखे से प्रभावित बताए गए हैं।(केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में बताया है कि देश के दस राज्यों में 33करोड़ लोग पानी का अकाल झेल रहे हैं।)ये आकड़े यह नही बताते हैं कि इऩ गावों में पानी के अभाव में समाज के विभिन्न तबकों के लोग किस प्रकार गुजर बसर कर रहे हैं। हमें केवल इतना पता चलता है कि बुन्देलखंड क्षेत्र के गांव के गांव खाली हो गए हैं।लेकिन जो थोड़े बहुत लोग गांव में रह गए हैं खास कर महिलाएं,बूढ़े, विकलांग उनको पानी कहां से व कैसे मिल रहा है। पशुओं के चारा पानी का क्या प्रबंध है।जंगली पशुओं की क्या हालत है। महाराष्ट्र में पानी की तलाश में हिरनों के झुंड गावों की ओर आते टीवी में दिख रहे हैं। लेकिन अन्य राज्यों में अकाल से प्रभावित लोगों की वेदना उन क्षेत्रों से बाहर नही आरही है।महाराष्ट्र के कुछ सक्रिय  समाजसेवियों के अलावा राज्यों के अकाल पीड़ित लोगों की पीड़ा के बारे में नागरिक समाज उसी प्रकार उदासीन है जिस प्रकार कर्जे के बोझ से दबे किसानों द्वारा की जारही आत्महत्याओं के बारे में।
अब देखिये हो क्या रहा है।
अभी 24 अप्रेल को प्रधान मंत्री ने अपने मन की बात में पानी के संकट पर अपने विचार रखे । परन्तु पानी के लिए तड़पते लोगों को अपनी सरकार की ओर से कोई आश्वासन नही दिया। माताओँ व बेटियों के लिए संवेदनशील प्रधान मंत्री तक शायद परिवार के लिए पानी इकट्ठा करने की उनकी व्यथा पर शायद पहुची ही न हो। लेकिन प्रधान मंत्री  ने तो अपनी मां का कष्टमय जीवन देखा है। उनको इन माताओँ व बेटियों के कष्टों का भान तो होगा ही।खैर प्रधान मंत्री उन गावों के बारे बताते रहे जहां पर लोगों ने स्वंय जल संकट से निपटने की रणनीति बनाई है और खुशहाल जीवन जी रहे  हैं।जल संकट का महिला एंगल उन्होंने नजरअंदाज ही कर दिया। हां अच्छे बारिष होने की मौसम विभाग की घोषणा का जिक्र अवश्य किया।सुप्रीम कोर्ट के कड़े सवालों के जवाब में सरकार ने हलफनामा देकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझ ली है। 27 तारीख को राज्य सभा में सूखे पर बहस हुई है। इस बहस में भी (जितना मैं सुन पाई) किसी भी सांसद ने फौरी उपायों का जिक्र नही किया। किसी ने भी अपने संसदीय क्षेत्र की मानवीय तथा पशु पक्षियों की पीड़ा को नही बताया। शायद उन्हें मालूम ही न हो। किसी ने भी अपने संसदीय क्षेत्र में टेंकर भेजने की आवश्यकता नहीं बताई। पशुओं के लिए चारे पानी की सामूहिक व्यवस्था की मांग भी नहीं की। साफ लग रहा था सरकार ही नही सांसद (सत्ताधारी व विपक्ष दोनों ही) आमजन की व्यथा से व्यथित नहीं थे। कैसी बिडम्बना है कि मुख्य न्यायाधीश जेलों में न्याय की आस में बरसों से पड़े लोगों की व्यथा बताते हुए भरी सभा में रो पड़ते हैं पर हमारे माननीय जो अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों की सेवा करने के नाम पर अनगिनत सुविधाओं को भोगते रहते हैं उस क्षेत्र के लोगों के सामने आए इस अस्तित्व के संकट से विचलित नहीं होते और निरपेक्ष भाव से भविष्य के लिए नीतियां बनाने के सुझाव देते हैं। अरे पहले अभी तो लोगों,व पशुओं को मरने से बचाइये। फिर भविष्य की चिंता कीजिये। लोगों, व पशुओं को मरने से बचाने के लिए फौरी इंतजाम करने होंगे।पानी के संकट को कम करने के लिए पानी बचाना होगा।अपने स्वंय के एशो आराम पर कुछ अंकुश लगाना होगा। (उस दिन टीवी पर एक पर्यावरण विशेषज्ञ बता रहे थे कि चार साल के पानी के संकट से उबरने के लिए कैलिफोर्निया में पानी बचाने के लिए सारे तरणतालों को ही पाट दिया गया है। टी वी एंकर भी इससे आश्चर्यचकित था। शायद बिना तरणताल के उसे अपना अस्तित्व संकट में लग रहा हो।)जैसे लाल बहादुर शास्त्री ने अन्न बचाने की मुहिम चलाई थी वैसे ही पानी बचाने की मुहिम चलानी होगी। इसमें सरकार तथा नागरिक समाज दोनों की अहम भूमिका है। जिसको कोई नहीं निभा रहा है।  कारण सभी उपभोक्तावाद की बीमारी से ग्रसित हैं।
  मसलन् केंद्र तथा राज्यों की सरकारों ने एडवाइजरी जारी कर अपने विभागों से पानी बचाने की अपील नही की है। उल्टे केंद्रीय मंत्रियों तथा राज्य के मुख्य मंत्रियों को धूल मिट्टी से बचाने के लिए हैलीपैड या सड़क पर हजारों लीटर पानी का छिड़काव किये जाने के समाचार पढ़ने सुनने या देखने को मिल रहे हैं। आंध्र प्रदेश में तो मंत्री महोदय पानी की समस्या पर विचार विमर्श के लिए ही गए थे जब हैलीपैड नें हजारों लीटर पानी डाला गया। सभी पार्टियों के प्रवक्ता चैनलों में बेशर्मी से इसका बचाव करते रहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन माननीयों को लोगों के गुस्से का डर नहीं है। डर हो भी क्यों। सभी तो एक से हैं। लोगों के पास चुनाव में कोई विकल्प नही रहता है।
 महामहिम राष्ट्रपति, तथा उपराष्ट्रपति देश के ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राय रखते रहते हैं। परंतु पानी के मुद्दे पर उन्होंने कुछ कहा हो पढ़ने को नही मिला।प्रधान मंत्री ने अपने मंत्रियों तथा सांसदों से अपने घरों तथा पार्टी दफ्तरों में पानी की बचत करने की अपील नही की। प्रधान मंत्री स्वंय अपने आवास में पानी का राशनिंग करके एक उदाहरण रख सकते थे। पर नही किया। ऐसा ही राज्यों के गवर्नर तथा मुख्य मंत्री भी कर सकते थे। शायद अपनी व्यस्तता में ये माननीय ऐसा करना भूल गए हों। मुझे याद है बहुत साल पहले पश्चिम बंगाल में बिजली की किल्लत हो रही थी।तब वहां के राज्यपाल ने स्वयं राजभवन में बिजली की खपत नियंत्रित करने के निर्देश दिये थे। तब वहां वामपंथ की सरकार थी। तब वहां भी सरकारी दफ्तरों में या सरकारी आवासों में बिजली का उपभोग कम करने के निर्देशों के बारे मे नहीं पढ़ा।इसी प्रकार बाढ़ या सुनामी के समय एक दक्षिण पुर्वी देश के राष्ट्रपति ने(देश का नाम याद नहीं है) राष्ट्रपति भवन के दरवाजे इस आपदा में बेघर हुए लोगों के लिए खोल दिये थे। काश हमारे देश में भी इस प्रकार के संवेदनशील राजनीतिज्ञ होते।
यदि राजनीतिक तंत्र (जिसको जनप्रतिनिधि चलाते हैं) को जनता के कष्ट खासकर महिलाओं व बच्चों (जो दोहरी मार झेल रहे हैं एक पानी की कमी की वजह से पूरे परिवार की अर्थव्यवस्था का संकट , दूसरा रोज रोज पूरे परिवार के लिए पानी जुटाने का संकट) की परेशानियों के बारे में संवेदनशील नही है तो प्रशासनिक तंत्र से इसकी उमीद करना भी बेइमानी है। वे तो अपने मंत्रियों को धूल मिट्टी से बचाने के लिए सरकारी मशीनरी को झोंकने में ही अपना भला समझते होंगे।इसी से उनको तरक्की मिलती है।
यदि सरकारी तंत्र (चाहे वह किसी भी दल का हो) का रवैया असंवेदनशील है तो विपक्ष भी सत्तारूड़ दल से पीछे नही हैं। राहुल गांधी गरीब बस्तियों में जाते रहते हैं।जब उनकी केंद्र में सरकार थी उन्होंने बुंदेलखंड के लिए विशेष पैकेज का एलान भी करवाया। लेकिन स्थानीय स्तर पर स्थानीय नेताओं के माध्यम से वह वहां के लोगों को राहत पहुचाने के प्रयत्न कर सकते थे।लेकिन नही किया। पानी बचाने की मुहिम नागरिक समाज के स्तर पर तो चला सकते थे। शायद आज जनसेवा राजनाति में नहीं आती है।सार्वजनिक धन से लोगों को टुकड़े देना फिर उनके एवज वोट बटोरना ही राजनीति रह गई है। इसीलिए उन्होंने या कांग्रेस अध्यक्षा ने भी अपने घरों व पार्टी दफ्तरों में पानी का राशनिंग करने का एलान नही किया, और न ही कांग्रेस के सांसदों तथा विधायकों से अपने अपने व घरों दफ्तरों में पानी का राशनिंग करने की एजवारजरी जारी की। आम आदमी पार्टी की सरकार मराठवाड़ा को पानी भेजने तैयार थी। पर बुंदेलखंड के लोगों का दर्द उन्हें नही पसीजता।
हालांकि हर चैनल गावों की बदहाली दिखा रहा है परंतु नागरिक समाज की अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं है। आमतौर पर प्राकृतिक आपदा के समय नागरिक समाज सक्रिय हो जाता है लेकिन इस आपदा के प्रति उदासीन है। आज हमारे समाज में साधु संतों महंत बाबाओं का बोलबाला है। विश्व के कई देशों में अपने करोड़ो अरबों अनुयायी होने का ये लोग दावा करते हैं। लेकिन प्राणीमात्र के सामने आए अस्तित्व के इस संकट पर ये भी चुप्पी साधे हैं।इनमें से किसी ने पानी बचाने की अपील तथा प्यासों तक पानी पहुचाने की गुहार नही लगाई है।

   इस प्रकार मुझे लगता है आज पानी के संकट से बड़ा संवेदना का संकट है।