शुक्रवार, 21 जून 2013

देवभूमि ही नहीं बचेगी तो देवता कहां पूजोगे?

हिमालय ,पर्यावर्णीय क्षेत्र ,तीर्थयात्री,तिब्बतदेवभूमि ही नहीं बचेगी तो देवता कहां पूजोगे?
परसों(19,06,2013) एक टी वी चैनल में मेधा पाटकर के जब हिमालय जैसे नाजुक पर्यावर्णीय क्षेत्र में तीर्थयात्रियों के लाखों की संख्या में जाने पर हल्के से एतराज करने पर भा.ज.पा.पक्ष रखने आई प्रतिनिधि इतना भड़क गई कि एंकर को हस्तक्षेप करना पड़ा और कहना पड़ा कि इस मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग नहीं दें।जब देश का मुकुट ध्वस्त हो रहा हो एक वाजिब चिंता पर ऐसी जानी मानी वकील का इस तरह विफरना हैरान कर गया। साथ ही गांधी की 1909 में हिंद स्वाराज में की गई तथा कांचा इलैया की मैं हिंदू क्यों नही हूं में की गई टिप्पणी याद आगई। हिंद स्वराज में रेल यातायात व्यवस्था की आलोचना करते हुए गांधी कहते हैं कि रेल व्यवस्था आदमी की शैतान प्रवृति को बढ़ावा देती है।इसकी वजह से भारत के पवित्र स्थान अपवित्र हो गए हैं। प्राचीन काल में तीर्थाटन बड़ा मुस्किल काम था। भक्ति में लीन लोग ही जाते थे।हमारे महान पुरुषों ने पैदल या बैल गाड़ी में पूरे देश का भ्रमण किया । रेल के बहाने आधुनिक व्यवस्था पर प्रहार करते हुए गांधी कहते हैं कि अफीम का नशा करने वाले को  उसके नुकसानों का पता अफीम का सेवन करने के बाद ही पता चलता है।पवित्र अपवित्र का तो पता नहीं। लेकिन वैध और अवैध खनन्, डायनमाइट से विस्फोट कर सड़क, टनल आदि का निर्माण, बांधों का निर्माण, अनियंत्रित तीर्थाटन तथा पर्यटन ने हिमालय को रौंद दिया है।
      गड़वाल की अर्थव्यवस्था हमेशा से ही तीर्थाटन पर आधारित थी। लेकिन आधुनिक यातायात व्यवस्था व पर्यटन व्यवस्था के विकास से पहले ये तीर्थयात्री पैदल अपनी जान जोखिम में डालकर तीर्थयात्रा करते थे।उनकी यात्रा से स्थानीय पारिस्थितिकी पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता था। आज ये सवाल मौजू है कि क्या लाखों पर्यटकों तथा तीर्थयात्रियों के लिए आधुनिकतम सुविधाएं देने के नाम पर जो जोर जबरदस्ती  हिमालय के साथ होरही है उसको कब तक यह नाजुक पर्वत सहन कर पाएगा। अब जब मुस्किल समय आया है तो  राहत व बचाव में होरही देरी का कारण भारत सरकार के गृहमंत्री तथा सूचना मंत्री हिमालय की विषम परिस्थितियों को बता रहे थे। गृह मंत्री ने बताया कि घाटियां इतनी संकरी हैं कि और अधिक संख्या में हैलिकोप्टर नहीं लगाए जा सकते हैं। मनीश तिवारी भी डिफिकल्ट टर्रेन की हवाला दे रहे थे। काश इन सरकारों ने तथाकथित विकास की नीतियों को बनाते समय इन नैसर्गिक सीमाओं का आंकलन किया होता।
क्या इस साल की तबाही प्रकृति का धैर्य चूकने की निशानी नहीं है। तबाहियां पहले भी होती रही हैं। 1970 की अलखनंदा की बाढ़ चिपको आंदोलन की जनक थी। लेकिन स्वार्थी तत्वों को इसकी परवाह नही । हो भी क्यों उनकी झोली तो हमेशा भरती रहती है। मरते तो स्थनीय लोग हैं या पर्यटक तथा तीर्थयात्री ।तीर्थयात्रा का जो जनून पैदा किया जाता है उससे भी तो उसी माफिया की ही झोली भरती जो पहाड़ को लूट रहा है। अब सरकार ने अपनी तिजोरी राहत और पुनर्वास के लिए खोल दी है। मुझे1980 के दशक में छपी पी. साइनाथ की पुस्तक एवरीबडी लव्स ए गुड ड्रौट की याद आरही है। इस किताब में लेखक ने बताया कि किस प्रकार स्वार्थी तत्व राहत और पुनर्वास के लिए आबंटित राशि की लूट करते हैं।
यहां पर कांचा इलैया की टिप्पणी प्रासंगिक  हो जाती है।अपनी पुस्तक में इलैया लिखते हैं कि जो लोक देवता होते हैं उनके मंदिर भब्य या विशाल नही होते। इन देवताओं की स्थानीय निवासियों के हितों के संरक्षण में अहम भूमिका रही होती है। इसीलिये सभी स्थनीय लोग इन्हें अरिष्ट निवारक के रूप में देखते है।इनकी पूजा अर्चना के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं होती, न ही प्रार्थना के लिए किसी देव वाणी की। हर इंसान अपनी निजी भाषा में  बिना पवित्रता अपवित्रता की परवाह किये व किसी टीमटाम के बगैर इनकी पूजा अर्चना कर सकता है। गांधी भगवान को जातियों के बीच नहीं बाटते और लिखते हैं कि हमारे पूर्वज जानते थे कि पूजा घर में भी की जासकती थी। मन निर्मल हो तो गंगा घर में ही बहती है। इसलिए तीर्थयात्रा आध्यात्म के लिए आवश्यक नहीं है।
भब्य तीर्थस्थान बनाकर तीर्थाटन को बढ़ाने का भी एक अर्थशास्त्र है। दुर्भाग्य से धर्म के नाम पर चलाया गया यह अर्थशाशास्त्र भी पर्यावरण की परवाह नहीं करता। शायद ही कोई धर्म होगा जो पर्यावरण के प्रतिकूल आचरण को मान्यता देता हो। लेकिन दलाई लामा तथा स्वर्गीय स्वामी निगमानंद को छोड़कर आजकल के किसी धर्मगुरु को पर्यावरण के बारे में चिंता करते नहीं सुना। उल्टे हमारे नामी ग्रामी बापू लोग अपने भक्तों को हैलिकोप्टर से अमरनाथ लेजाकर वहां रामकथा करते हैं। उनको कोई मतलब नहीं कि हवा के प्रदूषण तथा बढ़ते तापमान से बाबा बर्फानी पिघल जाते हैं या नहीं। रामायण  में पर्यावरण को किस तरह देखा गया है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है।मतलब धर्मभीरु लोगों को होना चाहिये। उनको समझना चाहिये कि हिमालय उजाड़ने में लगा माफिया तो इसको लूट कर कहीं और लूटने चला जायगा। यदि हिमालय ही नहीं रहेगा हिमवासी नहीं रहेंगे तो क्या वे तीर्थाटन या पर्यटन कर पाएंगे।
हिमालय की विकट स्थिति को शायद ध्यान में रखते हुए एक अंय चैनल में हृदयेश जोशी सुझा रहे थे कि हमें चीन से सीख लेनी चाहिये और मानसरोवर यात्रा की तरह हिमालय के तीर्थ स्थानों की यात्राओं को भी सुनियोजित तथा सुनियंत्रित करना चाहिये। मन किया कि उनसे कहू हमें चीन से नही हमें तिब्बियों से सीखना चाहिये जो तिब्बत की नाजुक पारिस्थितिकीय(fragile ecology) की दुहाई दे रहे हैं, और उस पवित्र भूमि की संभाल सकने की क्षमता(carrying capacity ) के अनुसार ही वहां आधुनिकता की धमाचौकड़ी करने की इजाजत देने की मांग कर रहे हैं। यह बात अलग है कि उनकी कोई सुन नही रहा है। सुने भी क्यों अपने हिमालय की तरह ही तिब्ब्त भी चीन के लिये सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जो है।    

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