रविवार, 12 जनवरी 2014

लोकतांत्रिक विचारधारा पर आधारित नेतृत्व


Arthur L. Capline . पुस्तक WHEN MEDICINE WENT MAD:BIOETHICS AND THE HOLOCAUST, Minnesota, Universisty of Minnesota, 1992 उन लोगों को पढ़नी चाहिये जो आज देश के लिए मजबूत नेतृत्व की वकालत कर रहे हैं। मेरा मानना है कि नेतृत्व की लोकतांत्रिक विचारधारा हमारे लोकतंत्र के भविष्य के लिए अधिक आवश्यक है। अपने तर्क के समर्थन में इस पुस्तक के कुछ अंश हिंदी भाषी पाठकों के समक्ष रखूगी। उनमें सबसे प्रमुख है
Eva Mozes Kor , “Nazi Experiments as Viewed by a Survivor of Mengele’s Experiments”।पे.4-5 में Eva Mozes Kor बताती है कि 1944 में जब वह 9 साल की थी उसको व उसकी जुड़वा बहन को मां से छीन कर उन 1500 जोड़ी जुड़वा बच्चों में शामिल कर लिया गया जिनका Mengele ने अपनी प्रयोगशाला में अत्यत्न अमानवीय तरीकों से अपने भयावह प्रयोगों के लिए इस्तेमाल किया।वह लिखती है कि उनका दिन सुबह 6 बजे हाजरी से शुरु होता था।उसके बाद सब अपने बैरक में जाते थे।वहां रोज Mengele अपने 6-7 साथियों के साथ उनका मुआयना करता था। सप्ताह में तीन बार रक्त बैंक ले जाया जाता था। वहां अक्सर इतना खून निकाल लिया जाता था कि बच्चे बेहोश भी हो जाते थे। वहां पर डाक्टर जानना चाहते थे कितना अधिक खून निकल जाने के बाद भी बच्चे बच सकते थे।सप्ताह में एक रोज  नहलाया जाता था। सप्ताह में तीन रोज प्रयोगों के लिए प्रयोगशाला में लेजाया जाता था। ये प्रयोग 8-10 घंटे तक चलते थे। यहां बच्चों के सारे कपड़े उतार लिए जाते थे। एक बड़े कमरे में बच्चों को समूहों में रखा जाता था। यहां पर उनकी फोटो ली जाती थी।उनके शरीर के हर अंग को नापा जाता था, निशान लगाए जाते थे तथा चार्टों के माध्यम से तुलनात्मक अध्ययन किया जाता था। बच्चों के हर हरकत को नोट किया जाता था। लेखक लिखती है कि उसे लगता था वह मांस का एक लोथड़ा भर है।उन लोगों ने उसके शरीर पर कब्जा किया था उसकी आत्मा या भावनाओं(but not my spirit) पर नहीं जो हमेशा आजादी के सपने देखती थी।लेखक बताती है कि भावनात्मक स्तर पर इन परीक्षणों को झेलना बहुत कठिन होता था। लेकिन जो प्रयोग रक्त प्रयोगशाला में किये जाते थे वे अति भयानक होते थे।
1944 के जुलाय महिने की शुरुआत में लेखक को किसी बैक्टीरिया का टीका लगाया गया। शाम तक वह बीमार पड़ गई। इतना तेज बुखार आगया कि वह कांपने लगी। पूरा शरीर व दिमाग सुन्न होगया। अगली रक्त बैक में पेशगी के दौरान हर बार की तरह उसके हाथ पांव नहीं बाध गए।बल्कि उसका बुखार मापा। बच्ची को मालूम था कि बीमार होने पर हस्पताल ले  जाया जाता था और वहां से बच कर कोई नहीं आता था। वह अपनी बीमारी छुपाने की भरसक कोशिश कर रही थी।परंतु उसे हस्पताल भेज दिया गया।मंगले चार अंय डाक्टरों के साथ रोज दिन में दो बार उसको देखने आता था। वे लोग केवल उसके बुखार का चार्ट देखते थे लेकिन बच्ची के स्वास्थ की जांच कभी नहीं की गई।उसको कोई दवा, नहीं दी गई। खाना पानी से भी उसको महरूम रखा गया। एक डाक्टर ने एक दिन तंज किया कि दुर्भाग्य से उस बच्ची के पास जीने के लिये केवल दो सप्ताह ही बचे थे। लेकिन बीमार बच्ची मरना नहीं चाहती थी।उसे मालूम था कि यदि वह मर गई तो मंगले उसकी जुड़वा बहन को फिनाइल का इंजक्शन देकर मार देगा।फिर उनके अंदरूनी अंगों को निकाल कर उसके बीमार अंगो का उसकी बहन के अंगों से  तुलनात्मक अध्ययन किया जायगा। इसलिए वह बैरक के फर्श पर होश आने और बेहोशी के दौर से गुजरने पर भी जीवित रहने का संकल्प करती रहती थी। दो हफ्ते बाद बुखार टूटा और दोनों बहनें एक बार फिर मिली। 6 महिने बाद 27 जनवरी 1945 को सोवियत सेनाओं ने इन्हें आजाद किया।
      Sara Seiler Vigorito, A Profile of Nazi Medicine ,The Nazi Doctor—His Methods And Goalsमें  बताती है वह Mengele की निजी प्रयोगशाला में एक साल रही।यहां पर बच्चों को लकड़ी के पिजरों में रखा जाता था। पेज.12 Mengele किसी भी पिजरे के पास जाकर उसमें बंद दो बच्चों में से एक को जांच कक्ष में लाने का आदेश देता। बच्चे को जांच की मेज पर नंगा लाया जाता। उसका मुह बंद कर दिया जाता , उसकी आखों पर पट्टी बांध दी जाती। दोनों तरफ सहायक उसको पकड़े रहते थे। डाक्टर बच्चे को बिना बेहोश किये उसके शरीर से रक्त, मांस, हड्डियों से मज्जा निकाल लेता था।डाक्टर का काम पूरा होने पर घाव बांध दिया जाता था। बच्चे को दर्द की भी कोई दवा नहीं दी जाती। उसको वापस पिजरें में डाल दिया जाता। इस पूरी प्रक्रिया में कई बच्चे मर जाते थे। यह सब हिटलर के मजबूत नेतृत्व के तहत ही होरहा था। किताब में और बहुत कछ है जो अगले ब्लोगों में बताया जायगा।   

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

अरविंद जी आपने निराश किया!!!


अरविंद जी आपने निराश किया!!!
अरविंद जी जिस तरह से कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने को मजबूर कर आपने विधान सभा में बहुमत हासिल किया उससे लगा कि आप में अदभुत राजनीतिक इच्छा शक्ति है। हालांकि मेरी एक सहेली मेरी राय से असहमत थी। लेकिन ये क्या! सरकारी मकान व गाड़ी के मामले में तो आपने और आपकी सरकारी पल्टी मार दी।आपकी एक मंत्री ने कहा कि जब सरकारी काम कर रहे हैं तो सरकारी गाड़ी तो लेंगे ही। साथ ही खबरनबीसों से सवाल किया कि वे भी तो अपने दफ्तर की गाड़ी पर ही तो जाते हैं। लेकिन खबरनबीस तो नौकरी करते हैं आप तो सेवा करने आए थे। मैं मानती हूं कि तीन पहिया में बैठकर वह अपने काम को मितव्ययता तथा कार्यकुशलता से नहीं कर सकती। या छोटे छोटे घरों में रह कर सरकारी काम करना जो कई मामलों में चौबीस घंटों का है संभव नहीं है।क्यों कि सरकारी दफ्तर के लिए भी जगह चाहिये। नौकरशाही को पूरी सुविधाओं से लैस दफ्तर चाहिये। आज के तकनीकी युग में बिना 24 घंटे बिजली के दफ्तर चल भी नहीं सकते।साथ ही राजनीतिक भीड़ भाड़, शोर शराबा अड़ोसी पड़ोसी के लिये भी असुविधा का सबब होता है।
      आपके मीडिया को दिये गए जवाब ने भी निराश किया। पूर्व मुख्य मंत्री की दागी कमीज (यहां पर मकान की तुलना प्लैट से कर) से अपनी कमीज सफेद बताकर आप कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकते। या मेरा अपना फ्लैट चार कमरों का है यहां एक ही कमरा अधिक है।अंय पांच कमरे तो दफ्तर के हैं। यह कोई तर्क नहीं है। ऐसे ही गोलमोल तर्क और दल भी देते रहे हैं। केजरीवाल जी सादगी सादगी होती है। अपने पूर्ववर्ती से  तुलना कर अपनी पसंद ठीक ठहराने के बजाय यदि आप मीडिया को बताते कि आपको अपने कर्तब्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए जितनी कम से कम सुविधाओं की आवश्यकता आपको आपके मातहत बता रहे हैं उतनी ही सुविधाएं आप तथा आपकी सरकार के मंत्री ले रहे हैं। सादगी के अपने मापदंड होते हैं।उनको दूसरों की उपभोक्तावादी संस्कृति के उजाले में नहीं तोला जासकता। खासकर सादगी को जब जन सेवा के माध्यम के तौर पर पेश किया जारहा हो। अंयथा यह हरेक का व्यक्तिगत मामला है वह कैसी दिनचर्या अपनाए।
महात्मा गांधी भी जब दक्षिण अफ्रिका गए थे तो पूरे साहब बन कर गए थे।लेकिन जब उन्होंने वह चोला उतारा तो सादगी के नए मापदंड स्थापित कर दिये।क्या सादगी ने उनकी कार्यकुशलता कम करदी। आप पार्टी ने हर मसले पर विशेषज्ञ समिति बनाई है। क्या कोई समिति - किस प्रकार शासन प्रशासन में सादगी लाई जासकती है- है। यदि नहीं तो क्या आप ऐसी समिति बनाएंगे।