अरविंद
केजरीवाल पर चौतरफा हमले हो
रहे हैं।सबसे गंभीर उनके अपने साथियों (जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय से
लेकर पार्टी का गठन,सरकार का गठन अब लोक सभा चुनाव में करारी हार के समय तक जारी
हैं) के हैं। हमला करके साथ छोड़ने वालों का एक ही दर्द है कि पार्टी में उनकी
सुनी नहीं जाती। सवाल उठता है अपनी बात सुनाने के लिए आप अपने स्वयं के लगाए पौधे
को नोच खरोच दोगे। पार्टी में हरेक बात सुनी जाए इसके लिए संगठन का ढ़ाचा तथा लोकतांत्रिक
व्यवहार की नींव रखना भी तो सभी सदस्यों की (खासकर संस्थापक सदस्यों ) जिम्मेदारी
होगी।केजरीवाल को मर्ज को पहचानना होगा। (शायद मर्ज पार्टी के भीतर के विरोधियों
तथा पार्टी के बाहर के विरोधियों का एक ही है।) बड़ी परादर्शिता से उस मर्ज का
इलाज ढ़ूढ़ना होगा। केजरीवाल हमेशा अहिंसात्मक तरीकों खासकर खुद को कष्ट देने वाले
तरीकों (जो गांधी ने भी अपनाए थे) को अपनाते हैं। कांग्रेसी नेताओं को भी गांधी के
तरीके असमंजस में डालदेते थे। चूंकि उनके पास दूसरे विकल्प नहीं होते थे तथा अपने
नैतिक ताकत से गांधी अपने विरोधियों का दिल जीत लेते थे। इसीलिए लोग उनके साथ
जुड़े रहे। केजरीवाल को यदि अहिंसात्मक रास्ते पर चल कर परिवर्तन लाना है तो गांधी
का मूल मंत्र पाप से नफरत करो पापी से नहीं को अपनाना होगा। चंद भ्रष्ट लोगों के
बदले व्यवस्था की भ्रष्ट प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। जन लोकपाल आंदोलन
के दौरान यह हो भी रहा था। परंतु स्वार्थी तत्व व्यवस्था से व्यक्तियों की तरफ
आंदोलन को मोड़ने में सफल हो गए।अब आंदोलनकारी कोर्ट कचहरी के चक्करों में फस गए
हैं।यही नही लोक सभा चुनाव के दौरान भी विरोधी दलों ने अरविंद केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी
(आप) पर प्रायोजित हमले किए। फिर उन हमलों को आम आदमी का आप पर गुस्से की अभिव्यक्ति बता कर प्रचारित
किया। जब कि आम आदमी की
आप से गुस्से की कोई वजह थी ही नहीं।
स्वार्थी तत्वों द्वारा हिंसा के इसी
प्रकार के अनुभव महात्मा
गांधी को दक्षिण अफ्रिका में हुए। अपनी
आत्मकथा में उन्होंने इनका विस्तार से वर्णन किया है। यहां मैं खासकर उस जन हिंसा के अनुभव का जिक्र कर
रही हूं जो उन्हें 18 दिसंबर 1916 में
सपरिवार डरबन पहुचने पर हुआ। इस दिन डरबन बंदरगाह पर पहुचते ही उनके जहाज को
क्वारनटीन घोषित कर दिया गया।13जनवरी 1917 को क्वारनटीन हटाया गया। इस बीच स्वार्थी तत्वों
ने किस प्रकार का कुप्रचार किया कैसा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। और 13जनवरी 1917 के दिन शहर में प्रवेश करने के दौरान किस प्रकार की हिंसा हुई गांधी
जी ने इसका वर्णन अपनी आत्मकथा मेरे सत्य के प्रयोग में किया है। उसका सारांश गांधी
जी के शब्दों में इस प्रकार है।
दक्षिण अफ्रीका के बन्दरगाहों में यात्रियों के
स्वास्थ्य की पूरी जाँच की जाती थी। डाक्टरों ने जाँच करके पाँच दिन का सूतक (क्वारनटीन)
घोषित किया। पर इस सूतक की आज्ञा हेतु केवल स्वास्थ्य रक्षा न था । डरबन के गोरे
नागरिक हमें उल्टे पैरों लौटा देने का जो आन्दोलन कर रहे थे, वह भी इस आज्ञा के मूल में एक कारण था।
गोरे लोग एक के बाद दूसरी
विराट सभायें कर रहे थे । दादा अब्दुल्ला के नाम धमकियाँ भेजते थे, उन्हें लालच भी देते थे ।इस प्रकार डरबन में द्वन्द्व युद्ध
छिड़ गया । एक ओर मुट्ठीभर गरीब हिन्दुस्तानी और उनके इने-गिने अंग्रेज मित्र थे ; दूसरी ओर धनबल , बाहुबल
, विद्यालय और संख्याबल में भरेपूरे अंग्रेज थे ।
इन बलवान प्रतिपक्षियों को राज्य का बल भी प्राप्त हो गया था , क्योंकि नेटाल की सरकार ने खुल्लम-खुल्ला उनकी मदद की थी ।
मि. गेरी एस्कम्ब ने( जो मंत्रिमंडल में थे और उसके कर्ताधर्ता थे । )इन गोरों की
सभा में प्रकट रुप से हिस्सा लिया ।
मतलब यह कि हमारी सूतक ----का हेतु किसी भी तरह
--- हमें वापस भेजना था । एजेंट को तो धमकी मिल ही रही थी । अब हमारे नाम भी आने
लगीं : 'अगर तुम वापस न गये तो तुम्हें समुन्द्र में
डुबो दिया जायगा । इस हमले में मध्य बिन्दु मैं था । मुझ पर दो आरोप थे :1. मैने हिन्दुस्तान में नेटालवासी गोरों की अनुचित निन्दा की थी ।
2. मैं नेटाल को हिन्दुस्तानियों से भर देना चाहता था और इसलिए खासकर नेटाल में बसाने के लिए हिन्दुस्तानियों को 'कुरलैण्ड' और 'नादरी' में भर कर लाया था ।
पर मैं स्वयं बिल्कुल निर्दोष था । मैने किसी को नेटाल आने के लिए ललचाया नहीं था । 'नादरी' के यात्रियों को मैं पहचानता भी न था । 'कुरलैण्ड' में अपने दो-तीन रिश्तेदारों को छोड़कर बाकी के सैकड़ों यात्रियों के नाम-धाम तक मैं जानता न था । मैंने हिन्दुस्तान में नेटाल के अंग्रेजों के विषय में ऐसा एक भी शब्द नहीं कहा, जो नेटाल में कह चुका था । और जो कुछ मैने कहा था, उसके लिए मेरे पास काफी प्रमाण थे ।
बड़े दिन के त्यौहार के दिन कप्तान ने पहले दर्जे के यात्रियों को भोज दिया तथा पश्चिमी सभ्यता पर भाषण किया । मैं आनन्द में सम्मिलित हुआ। नेटाल के अंग्रेज जिस सभ्यता की उपज थे, जिसके प्रतिनिधि और हिमायती थे, उस सभ्यता के प्रति मेरे मन में खेद उत्पन्न हुआ। मैं उसी का विचार करता रहता था, इसलिए इस छोटी-सभा के सामने मैने अपने वे ही विचार रखे । मैने पश्चिमी सभ्यता को प्रधानतया हिंसक बतलाया और पूर्व की सभ्यता को अहिंसक कहा। प्रश्नकर्ताओं ने मेरे सिद्धान्त मुझी पर लागू किये । कप्तान ने ही पूछा : 'गोरे जैसी धमकी दे रहे हैं उसी के अनुसार वे आपको चोट पहुँचाये तो आप अहिंसा के अपने सिद्धान्त पर किस तरह अमल करेंगे ।'मैने जवाब दिया : 'मुझे आशा हैं कि उन्हें माफ कर देने की और मुकदमा न चलाने की हिम्मत और बुद्धि ईश्वर मुझे देगा । आज भी मुझे उनपर रोष नहीं हैं । उनके अज्ञान , उनकी संकुचित दृष्टि के लिए मुझे खेद होता हैं । मैं समझता हूँ कि वे जो कह रहे हैं और कर रहे हैं वह उचित हैं, ऐसा वे शुद्ध भाव से मानते हैं । अतएव मेरे लिए रोष का कोई कारण नहीं हैं।' पूछनेवाला हँसा । शायद मेरी बात पर उसे विश्वास नहीं हुआ ।
इस प्रकार हमारे दिन बीतते गये और लम्बे होते गये । सूतक समाप्त करने की अवधि अन्त तक निश्चित नहीं हुई ---- अन्त में यात्रियों को और मुझे अल्टिमेटम मिले । दोनों को धमकी दी गयी कि तुम्हारी जान खतरे में हैं । दोनों ने नेटाल के बन्दर पर उतरने के अपने अधिकार के विषय में लिखा और अपना निश्चिय घोषित किया कि कैसा भी संकट क्यों न हों, हम अपने इस अधिकार पर डटे रहेगे ।आखिर 13 जनवरी 1917 के दिन स्टीमरों को मुक्ति मिली औऱ यात्रियों को उतरने का आदेश मिला ।
जहाज धक्के पर लगा । यात्री उतरे । पर मेरे बारे में मि. एस्कम्ब ने कप्तान से कहलाया था : 'गाँधी को और उसके परिवार को शाम को उतारियेगा । उसके विरुद्ध गोरे बहुत उत्तेजित हो गये हैं और उनके प्राण संकट में हैं । पोर्ट सुपरिटेण्डेण्ट मि. टेटम उन्हें शाम को अपने साथ ले जायेंगे ।'कप्तान ने मुझे इस संदेश की खबर दी । मैने तदनुसार चलना स्वीकार किया । लेकिन इस संदेश को मिले आधा घंटा भी न हुआ कि मि. लाटन आये और कप्तान से मिलकर बोले, 'यदि मि. गाँधी मेरे साथ चलें , तो मैं उन्हें अपनी जिम्मेदारी पर ले जाना चाहता हूँ । स्टीमर के एजेण्ट के वकील के नाते मैं आपसे कहता हूँ कि मि. गाँधी के बारे में जो संदेश आपको मिला है उसके बन्धन से आप मुक्त हैं ।' इस प्रकार कप्तान से बातचीत करके वे मेरे पास आये और मुझ से कुछ इस मतलब की बातें कहीँ : 'आपको जीवन का डर न हो तो मैं चाहता हूँ कि श्रीमती गाँधी और बच्चे गाड़ी में रुस्तमजी सेठ के घर जाये और आप तथा मैं आम रास्ते से पैदल चलें । मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि आप अंधेरा होने पर चुपचाप शहर दाखिल हो। मेरा ख्याल हैं कि आपका बाल भी बाँका न होगा । अब तो सब कुछ शान्त हैं । गोरे सब तितर-बितर हो गये हैं । पर कुछ भी क्यों न हो, मेरी राय हैं कि आपको छिपे तौर पर शहर में कभी न जाना चाहिये । '
मैं सहमत हो गया । मेरी धर्मपत्नी और बच्चे गाड़ी में बैठकर रुस्तमजी सेठ के घर सही - सलामत पहुँच गये । कप्तान की अनुमति लेकर मैं मि. लाटन के साथ उतरा । रुस्तमजी सेठ का घर वहाँ से लगभग दो मील दूर था ।
जैसे ही हम जहाज से उतरे, कुछ लड़कों ने मुझे पहचान लिया और वे 'गाँधी, गाँधी' चिल्लाने लगे । तुरन्त ही कुछ लोग इकट्ठा हो गये और चिल्लाहट बढ़ गयी । मि. लाटन ने देखा कि भीड़ बढ जायगी, इसलिए उन्होंने रिक्शा मँगवाया । मुझे उसमे बैठना कभी अच्छा न लगता था । उस पर सवार होने का मुझे यह पहला ही अनुभव होने जा रहा था । पर लड़के क्यों बैठने देते ? उन्होंने रिक्शावाले को धमकाया और वह भाग खड़ा हुआ ।हम आगे बढ़े । भीड़ भी बढ़ती गयी । खासी भीड़ जमा हो गयी । सबसे पहले तो भीड़वालों ने मुझे मि. लाटन से अलग कर दिया । फिर मुझ पर कंकरों और सड़े अण्डों की वर्षा शुरु हुई । किसी ने मेरी पगड़ी उछाल कर फेंक दी। फिर लातें शुरु हूई ।मुझे गश आ गया । मैंने पास के घर की जाली पकड़ ली और दम लिया । वहाँ खड़ा रहना तो सम्भव ही न था । तमाचे पड़ने लगे ।
इतने में पुलिस अधिकारी की स्त्री जो मुझे पहचानती थी, रास्ते से गुजरी । मुझे देखते ही वह मेरी बगल में आकर खड़ी हो गयी और धूप के न रहते भी उसने अपनी छतरी खोल ली । इससे भीड़ कुछ नरम पड़ी । अब मुझ पर प्रहार करने हो , तो मिसेज एलेक्जेण्डर को बचाकर ही किये जा सकते थे ।इस बीच मुझ पर मार पड़ते देखकर कोई हिन्दुस्तानी नौजवान पुलिस थाने पर दौड़ गया। सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर ने एक टुकड़ी मुझे घेर कर बचा लेने के लिए भेजी । वह समय पर पहुँची । मेरा रास्ता पुलिस थाने के पास ही होकर जाता था । सुपरिटेण्डेण्ट ने मुझे थाने में आश्रय लेने की सलाह दी । मैने इन्कार किया और कहा , 'जब लोगों को अपनी भूल मालूम हो जायेगी, तो वे शान्त हो जायेंगे । मुझे उनकी न्यायबुद्धि पर विश्वास हैं ।'पुलिस के दस्ते के साथ मैं सही सलामत पारसी रुस्तमजी के घर पहुँचा । मेरी पीठ पर छिपी मार पड़ी थी । एक जगह थोड़ा खून निकल आया था । स्टीमर के डॉक्टर दादा बरजोर वहीं मौजूद थे । उन्होंने मेरी अच्छी सेवा-शुश्रषा की ।
यो भीतर शान्ति थी , पर बाहर गोरों ने घर को घेर लिया । शाम हो चुकी थी । अंधेरा हो चला था । बाहर हजारों लोग तीखी आवाज में शोर कर रहे थे और 'गाँधी को हमें सौंप दो' की पुकार मचा रहे थे । परिस्थिति का ख्याल करके सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर वहाँ पहुँच गये थे औऱ भीड़ को धमकी से नहीं , बल्कि उसका मन बहलाकर वश मे रख रहे थे ।फिर भी वे निश्चिंत तो नहीं थे । उन्होंने मुझे इस आशय का संदेशा भेजा : 'यदि आप अपने मित्र के मकान , माल-असबाब और अपने बाल-बच्चों को बचाना चाहते हो, तो जिस तरह मैं कहूँ उस तरह आपको इस घर से छिपे तौर पर निकल जाना चाहिये ।'
मैने हिन्दुस्तानी सिपाही की
वर्दी पहनी । कभी सिर पर मार पड़े तो उससे बचने के लिए माथे पर पीतल की तश्तरी रखी
और ऊपर से मद्रासी तर्ज का बड़ा साफा बाँधा । साथ में खुफिया पुलिस के दो जवान थे
। उनमें से एक ने हिन्दुस्तानी व्यापारी की पोशाक पहनी और अपना चेहरा हिन्दुस्तानी
की तरह रंग लिया । दुसरे ने क्या पहना, सो
मैं भूल गया हूँ । हम बगल की गली में होकर पड़ोस की दुकान में पहुँचे और गोदाम में
लगी हुई बोरों की थप्पियों को अंधेरे में लाँधते हुए दुकान के दरवाजे से भीड़ में
घुस कर आगे निकल गये। गली के नुक्कड़ पर
गाड़ी खड़ी थी उसमें बैठकर अब मुझे उसी थाने में ले गये , जिसमें आश्रय लेने की सलाह सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर ने
पहले दी थी । मैने सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर और खुफिया पुलिस के अधिकारियों को
धन्यवाद दिया ।
इस प्रकार जब एक तरफ से मुझे ले जाया जा रहा था, तब दूसरी तरफ सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर भीड़ से गाना गवा
रहे थे । उस गीत का अनुवाद यह हैं :'चलो, हम
गाँधी के फांसी पर लटका दे, इमली
के उस पेड़ पर फांसी लटका दें ।'जब
सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर को मेरे सही-सलामत थाने पर पहुँच जाने की खबर मिली तो
उन्होंने भीड़ से कहा, 'आपका
शिकार तो इस दुकान से सही सलामत निकल भागा हैं ।' भीड़ में किसी को गुस्सा आया, कोई हँसा, बहुतों
नें इस बात को मानने से इन्कार किया ।इस पर सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर ने कहा, 'तो आप लोग अपने में से जिसे नियुक्त कर दे उसे मैं अन्दर ले जाऊँ और वह तलाश करके देख ले । अगर आप गाँधी को ढूढ़ निकाले तो मैं उसे आपके हवाले कर दूँगा । न ढूढ़ सकें तो आपको बिखर जाना होगा । मुझे विश्वास तो हैं ही कि आप पारसी रुस्तमजी का मकान हरगिज नही जलायेंगे और न गाँधी के स्त्री-बच्चों को कष्ट पहुँचायेंगे ।'
भीड़ ने प्रतिनिधि नियुक्त किये । उन्होंने तलाशी के बाद उसे निराशाजनक समाचार सुनाये । सब सुपरिटेण्डेण्ट एलेक्जेण्डर की सूझ-बूझ और चतुराई की प्रशंसा करते हुए पर मन ही मन कुछ गुस्सा होते हुए, बिखर गये ।
उस समय के उपनिवेश मंत्री स्व. मि. चेम्बरलेन ने तार द्वारा सूचित किया कि मुझ पर हमला करने वालों पर मुकदमा चलाया जाय और मुझे न्याय दिलाया जाय । मि. एस्कम्ब ने मुझे अपने पास बुलाया । मुझे पहुँची हुई चोट के लिए खेद प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, 'आप यह तो मानेगे ही कि आपका बाल भी बाँका हो तो मुझे उससे कभी खुशी नहीं हो सकती । आपने मि. लाटन की सलाह मानकर तुरन्त उतर जाने का साहस किया । आपको ऐसा करने का हक था, पर आपने मेरे संदेश को मान लिया होता तो यह दुःखद घटना न घटती । अब अगर हमला करने वालों को पहचान सकें तो मैं उन्हें गिरफ्तार करवाने और उनपर मुकदमा चलाने को तैयार हूँ । मि. चेम्बरलेन भी यही चाहते हैं ।'
मैने जवाब दिया, 'मुझे किसी पर मुकदमा नही चलाना हैं । सम्भव हैं , हमला करनेवालों में से एक-दो को मैं पहचान लूँ , पर उन्हें सजा दिलाने से मुझे क्या लाभ होगा ? फिर, मैं हमला करनेवालो को दोषी भी नहीं मानता । उन्हें तो यह कहा गया हैं कि मैने हिन्दुस्तान में अतिशयोक्तिपूर्ण बातें कहकर नेटाल के गोरों को बदनाम किया हैं । वे इस बात को मानकर गुस्सा हों तो इसमें आश्चर्य क्या हैं ? दोष तो बड़ों का और मुझे कहने की इजाजत दें तो आपका माना जाना चाहिये । आप लोगों को सही रास्ता दिखा सकते थे, पर आपने माना और कल्पना कर ली कि मैने अतिशयोक्ति की होगी । मुझे किसी पर मुकदमा नहीं चलाना हैं । जब वस्तुस्थिति प्रकट होगी और लोगों को पता चलेगा, तो वे खुद पछतायेगे ।'
'तो आप मुझे यह बात लिख कर दे देंगे ? मुझे मि. चेम्बरलेन को इस आशय का तार भेजना पड़ेगा । मैं नही चाहता कि आप जल्दी में कुछ लिखकर दे दें। मेरी इच्छा यह हैं कि आप मि. लाटन से औऱ अपने मित्रों सं सलाह करके जो उचित जान पड़े सो करें । हाँ, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि यदि आप हमला करनेवालों पर मुकदमा नहीं चलायेंगे तो सब ओर शान्ति स्थापित करने में मुझें बहुत मदद मिलेगी औऱ आपकी प्रतिष्ठा तो निश्चत ही बढ़ेगी ।'
मैने जवाब दिया, 'इस विषय मे मेरे विचार पक्के हो चुके हैं । यह निश्चय समझिये कि मुझे किसी पर मुकदमा नही चलाना हैं , इसलिए मैं आपको यहीं लिखकर दे देना चाहता हूँ ।'यह कहकर मैं आवश्यक पत्र लिखकर दे दिया। हमले के दो-एक दिन बाद जब मैं मि. एस्कम्ब से मिला तब मैं पुलिस थाने में ही था । रक्षा के लिए मेरे साथ एक-दो सिपाही रहते थे , पर दरअसल जब मुझे मि. एस्कम्ब के पास ले जाया गया तब रक्षा की आवश्यकता रहीं नहीं थी ।
जिस दिन मैं जहाज से उतरा उसी दिन, 'नेटाल एडवरटाइजडर' नामक पत्र का प्रतिनिधि मुझ से मिल गया था । उसने मुझ से कई प्रश्न पूछे थे और उनके उत्तर में मैं प्रत्येक आरोप का पूरा-पूरा जवाब दे सका था । सर फिरोजशाह मेहता के प्रताप से उस समय मैंने हिन्दुस्तान में एक भी भाषण बिना लिखे नहीं किया था । अपने उन सब भाषणों और लेखों का संग्रह तो मेरे पास था ही । मैंने वह सब उसे दिया और सिद्ध कर दिखाया कि मैंने हिन्दुस्तान में ऐसी एक भी बात नहीं कहीं , तो अधिक तीव्र शब्दों में दक्षिण अफ्रीका में न कही हो । मैंने यह भी बता दिया कि 'कुरलैण्ड' और 'नादरी' के यात्रियों को लाने में मेरा हाथ बिल्कुल न था । उनमें से अधिकतर तो पुराने ही थे और बहुतेरे नेटाल में रहने वाले नहीं थे बल्कि ट्रान्सवाल जानेवाले थे । उन दिनों नेटाल में मन्दी थी । ट्रान्सवाल में अधिक कमाई होती थी । इस कारण अधिकतर हिन्दुस्तानी वहीं जाना पसन्द करते थे ।
इस खुलासे का और हमलावरों पर मुकदमा दायर न करने का इतना ज्यादा असर पड़ा कि गोरे शर्मिंदा हुए ।
समाचार पत्रों ने मुझे निर्दोष सिद्ध किया और हुल्लड़ करने वालों की निन्दा की ।
गांधी जी के इस अनुभव से
तीन चार बातें साफ हो जाती हैं। पहला आम जन का स्वतः स्पूर्त आवेग जैसी कोई चीज
नहीं होती। भीड़ हमेशा ही भड़काई जाती है। गोरों का यह हिंसात्मक विरोध निजी
स्वार्थी तत्वों के कुप्रचार का परिणाम था। अपने देश में भी हमने देखा है कि सारी
जातीय व सांप्रदायिक हिंसक घटनाएं कु-प्रचार के कारण हुई तथा प्रायोजित रही हैं।
कानून और नैतिक जिम्मेदारी से बचने के लिए नेता अपने स्वार्थ सिद्ध कर लेने के बाद
भीड़ पर हिंसा का दोषारोपण कर देते हैं।
दूसरा मीडिया यदि निष्पक्ष हो तो लोगों तक सही सूचना पहुंचा कर कुप्रचार में अंकुश लगाने में
अहम भूमिका निभा सकता है। दुर्भाग्य से जातीय व सांप्रदायिक उंमाद फैलाने में
हमारे यहां माडिया के एक हिस्से ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इन चुनावों में
भी निभा रहा था।
तीसरा यदि प्रशासनिक अधिकारी स्वतंत्र और निष्पक्ष हों तो वे उकसाए लोगों को चतुरता से शांत करने में कामयाब होते हैं। अंत में कानून के राज्य पर श्रद्धा हो तो
व्यवस्था अपनी वैधता बनाए रखती है।अपने विवरण में गांधी ने बताया है , कि इन बलवान प्रतिपक्षियों को राज्य का बल भी प्राप्त हो गया था , क्योंकि नेटाल की सरकार ने खुल्लम-खुल्ला उनकी मदद की थी । मि. गेरी एस्कम्ब ने जो मंत्रिमंडल में थे और उसके कर्ताधर्ता थे । इन गोरों की सभा में प्रकट रुप से हिस्सा लिया । अब वही मि. गेरी एस्कम्ब गांधी की मदद से आरोपियों को सजा दिला कर न्याय दिलाने की बात कर रहे थे। जब कि हमारे यहां हमेशा ही सत्ताशीन हिंसा के प्रायोजक नेताओं ने
आरोपियों बचाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग किया है कानून के साथ खिलवाड़ किया है। ईमानदार
और कर्तब्यनिष्ट अफसरों को परेशान किया है,दंडित किया है, तथा आतंकित किया है।