बुधवार, 6 मई 2015

धनकड़ जी इन महिलाओं के लिए आपके पास कोई योजना है

धनकड़ जी इन महिलाओं के लिए आपके पास कोई योजना है
हरियाणा के कृषि मंत्री आत्महत्या करने वाले किसानों की पत्नियों के लिए घड़ियाली आंसू बहा रहे थे। दिसंबर 2014 को पी. साइनाथ ने किसान मजदूरनियों की दयनीय  स्थिति का वर्णन किया और उनकी हालत सुधारने के लिए कुछ सुझाव दिये।धनकड़ जी व उनकी पार्टी उन सुझावों पर अमल करने के बारे में क्या सोच रही है यह जानना अत्यतं आवश्यक है।
साइनाथ लिखते हैं कि ओडिसा के रायगड़ का वह जमींदार बहुत प्रसन्न था। उसकी फोटो जो खींची जारही थी। वह अपने खेत में सीधा तन कर खड़ा था। पास ही 9 महिला मजदूर दोहरी झुक कर उसके खेत में धान की रोपाई कर रही थी। उसने बताया कि वह उन महिला मजदूरों को रोज 40 रुपये 82 पैसे मजदूरी देता था। बाद में महिलाओं ने बताया कि उनको केवल 25 रुपया 51 पैसा दिया गया था। ये ओडिसा के रायगड़ की खेतीहर मजदूरनियों की व्यथा थी।
भारत में जमींदार परिवारों की महिलाओं को भी पिता या पति के घर भूस्वामित्व का अधिकार नहीं होता। परित्यक्त, विधवा अथवा तलाकशुदा महिला को भी पेट पालने के लिए रिस्तेदारों के खेतों में मजदूरी करनी होती है। सरकारी आंकड़ो के अनुसार भारत में कुल 6करोड़ 30लाख महिला मजदूर हैं।इनमें से 2 करोड़ 80लाख  यानी 45 प्रतिशत खेतीहर मजदूर हैं। यह आकड़ा भी गलत है।इसमें वे मजदूर सम्मिलित नहीं हैं जो साल में 6 महिने या उससे अधिक रोजगार नहीं पाते। यह बहुत बड़ी चूक है।इसकी वजह से लाखों महिलाएं मजदूरनियों की श्रेणी में नहीं आती। इस प्रकार उनका राष्ट्र की अर्थब्यवस्था में योगदान अदृश्य ही रह जाता है। प्रत्यक्ष कृषि कार्य के अलावा जो भी काम ग्रामीण महिलाएं करती हैं उसको घरेलू काम कह कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सरकार द्वारा मान्य आर्थिक गतिविधि में भी कृषि कार्य ही महिलाओं के लिए सबसे बड़ा रोजगार की सुविधा है। इस आर्थिक गतिविधि में भी मामूली मजदूरी वाली खेती मजदूरी ही गरीब महिलाओं के लिए उपलब्ध  होती है। उदारीकरण के इस दौर में इस मामुली मजदूरी की उपलब्धता के दिन भी कम होते जारहे हैं। सरकारी आर्थिक नीतियां,मशीनीकरण, नकदी फसल.ठेकेदीरी प्रथा इसके लिए जिम्मेदार हैं।
आंध्र प्रदेश के अनन्तपुर गांव में केवल कीड़े मकोड़े पकड़ने का काम महिलाओं को उपलब्ध है। फोटो में दो लड़कियां लाल बालों वाली Caterpillars पकड़ रही हैं। जमींदार इनको एक किलो Caterpillars(यानी एक हजार से अधिक) पकड़ने के इनको 10रुपये 20 पैसे देता है। संसाधनों पर नियंत्रण (यानि मिल्कियत)नहीं होने से गरीबों खास कर महिलाओं की स्थिति काफी कमजोर हो जाती है।संपत्ति की मिल्कियत के साथ ही सामाजिक status भी जुड़ा है। बहुत थोड़ी महिलाएं जमीन की मालिक होती हैं। पंचायतीराज में उनकी भागीदारी तभी प्रभावशाली होगी जब वे जमीन की मालिक होंगी।        खेतीहर मजदूरों में दलितों की संख्या सर्वाधिक है। करीब 67 प्रतिशत खेतीहर मजदूरनियां दलित हैं। इनका तिहरा जाति आधरित, वर्ग आधरित व लिंग आधारित शोषण होता है। भूमि का अधिकार गरीब व निम्न कही जाने वाली जातियों की महिलाओं सामाजिक स्थिति सुदृड़ बनाएगा। अपनी जमीन होने पर यदि उन्हें दूसरों के खेतों में काम करना भी पड़ेगा तो अपनी मजदूरी के लिए मोल भाव कर सकती हैं। आवसश्यकता पड़ने पर न्यायिक शर्तों पर ऋण लेना भी संभव होगा।
इससे उनकी तथा उनके परिवारों की गरीबी दूर होगी। पुरुष अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा स्वयं पर खर्च करते हैं । जबकि महिलाएं अपनी पूरी आय परिवार पर खर्च करती हैं। महिलाओं की आय बढ़ने से बच्चों की स्थिति भी सुधरेगी। वास्तव में भारत में गरीबी की समस्या सुलझाने के लिए महिलाओं की भूमि का अधिकार मिलना चाहिये। पश्चिमी बंगाल में 400,000 परिवारों को भूमि का पट्टा संयुक्त नाम पर देकर एक पहल की है। परन्तु अभी काफी सम्बा रास्ता तय करना है।  चूंकि महिलाओं को हल चलाने की आजादी नहीं हैं इसलिए जमीन जोतने वाले की के नारे के बदले नया नारा जमीन उस पर काम करने वाले की होना चाहिये।

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