प्रतीकों की राजनीति
पूंजीवाद, साम्राज्यवाद की एक विशेषता प्रतीकों की राजनीति भी है। एक तरफ उपभोक्तावाद बढ़ाकर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध शोषण किया जाता है तो दूसरी ओर इन संसाधनों के विलुप्त होने का रोना भी रोया जाता है। इनके संरक्षण संवर्धन के लिए राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार, गोष्टियाँ होती हैं, कन्वैनशनों पर हस्ताक्षर होते हैं, दौड़ों का आयोजन होता है, दिवस मनाए जाते हैं, अभियान चलाए जाते हैं, कई महान विभूतियों को उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए पुरुस्कार दिये जाते हैं, कई स्वयंसेवी संगठनों को इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात!
चूँकि संसाधनों की बरबादी नहीं थमती इसलिए इन सारे तमाशों के बावजूद हवा, पानी, नदियों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों, जड़ी-बूटियों,पेड़- पौधों तथा इन प्राकृतिक संसाधनों पर जीवित रहने वाले हाशिये पर रह रहे लोगों पर संकट बढ़ता जारहा है। संकट के बढ़ने के साथ साथ नए प्रतीकों के साथ नई राजनीति प्रारंभ हो जाती है।
अपने देश में इंदिरा गांधी ने गरीबी को सत्ता हथियाने का एक कारगर प्रतीक बनाया। याद कीजिये उस समय को। तब भी अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, तथा विभिन्न तबकों के गरीबों का आक्रोश नक्सलबाड़ी व अन्य जन आंदोलनों के माध्यम से उभर रहा था।इंदिरा गांधी इस प्रतीक को भुनाने इतनी सफल हुई कि आज भी बहुत गरीब ऐसे हैं जो विश्वास करते हैं कि वह गरीबों की हितैषी थी।
उदारीकरण के बाद स्थिति दिन प्रतिदिन भयावह होती जारही है। जब अर्जुन सेनगुप्ता की रपट आई थी तब खाद्य पदार्थों में महंगाई एक निश्चित रफ्तार से बढ़ रही थी। तब भी 79 प्रतिशत लोग 20 रुपया रोज की आमदनी में कैसे गुजारा कर रहे होंगे यह ऊपर वाला ही जानता है। आज जब महंगाई आसमान छू रही है उन लोगों का क्या हाल होगा यह इस देश की नैया खेवनहारों की चिंता का विषय नहीं है। हाँ कुछ नए प्रतीक जरूर आगए हैं।
जैसे सादगी बरतने का प्रतीक। दलितों के घर रात विताने का प्रतीक। या आंबेडकर जयंती मनाने की प्रतीक।या बिहार में महादलित का सगूफा। दलितों के नाम का जाप अब हर राजनीतिक दल करता है। सभी राजनीतिक दलों को भली प्रकार मालूम है कि दलितों, आदिवासियों तथा गरीब गुरबाओं को बल पर सत्ता तभी तक हथियाई जा सकती है जब तक वे हासिये पर रहें और हासिये से मुख्यधारा में लाने का सपना दिखा कर ही उनके वोट लिए जासकते है। इसीलिए एक ओर उनको गरीब बनाए रखने के लिए नीतियाँ लागू की जाती हैं। दूसरी ओर गरीबों के हितों की रक्षा के सूझाव देने वाली समितियों और कमिशनों की रपटों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है या उन समितियों और कमिशनों का कार्यकाल ही समाप्त कर दिया जाता है या गरीबों के हित में चल रहे कार्यक्रमों को भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया जाता है। आखिर भ्रष्ट भी तो वही हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। यदि कोई राजनीतिक दल भ्रष्टों सरक्षण देना बंद कर दे तो उसके शासन काल में भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा।पर क्या बिना भ्रष्टाचार के कोई राजनीतिक दल जिंदा रह पाएगा?
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