एम एफ हुसैन एक नए अंतहीन सफर के लिए निकल पड़े हैं। उनके निधन ने बहादुरशाह जफर की याद दिला दी। वह भी जीवन के अंतिम क्षणों में वतन की माटी के लिए तरसते रहे। एम एफ हुसैन को भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदारों ने देश छोड़ने मजबूर कर दिया। ऐसा करते समय उनको यह भी याद नहीं रहा कि भारतीय संस्कृति में उम्र को सम्मान दिया जाता है।जन भावनाएं भड़का कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के फिराक में शायद हर घर में बच्चों को सिखाई जाने वाली यह छोटी सी मान्यता कि --बड़ों की इज्जत करो--भूल गए। परंतु एम एफ हुसैन का जाना कई सवाल छोड़ गया।
पहला क्या भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदार एम एफ हुसैन को अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार चित्र बनाने से रोक पाए। समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार रामायण के पात्रों पर चित्र बनाना उनके अधूरे कार्यक्रमों में एक था जिसमें मौत ने ही बाधा डाली ।
दूसरा हुसैन ने भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों की नाजुक भावनाओं के आहत होने पर, खबरों के अनुसार, दुःख अवश्य जताया।पर क्या ये उनसे घूंघट में (जिसको शायद ये भारतीय परंपरा मानते हैं) में हिंदू देवियों के चित्र बनाने का आश्वाशन ले पाए? यदि नही तो हुसैन को देश निकाला देकर क्या हासिल किया? हुसैन ने तो इनको अपनी कूची, वाणी तथा कर्म से निशस्त्र कर दिया। देश या देश के बाहर वह अपना काम करते रहे। उनको व्यक्तिगततौर पर जानने वालों में से किसी ने भी उनके आक्रामक, सांप्रदायिक या अशांत होने की बात नहीं कही। वह चुपचाप कूची चलाते चलाते चले गए, साथ में लिख गए कि जहां निधन हो वही दफना भी दिया जाय। इस प्रकार उन्होंने एक बार फिर भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों को निशस्त्र कर दिया।
इसकी एक बानगी तब दिखी जब एक टी वी चैनल में इनके एक प्रवक्ता सरकार पर उनके शव को भारत लाने के लिए सहयोग का आश्वासन देने के लिए हमला बोल रहे थे और आरोप लगा रहे थे कि कांग्रेस सरकार हिंदू साधु संतों की तो परवाह नही करती। स्वामी निगमानंद के निधन ने उनकी तथा उनकी पार्टी की हिंदू साधु संतों की संरक्षक की छबि पर जो दाग लगा है उसको धोने के लिए कम से कम देश तथा साधु संतो से माफी तथा भविष्य में सावधान रहने का आश्वासन तो मिलना ही चाहिये था। पर इतना बड़ा दिल तथा इतना सच्चाई गांधी के इस देश में आज कहां! खैर हुसैन तो चले गए क्या इतिहास ऐसे तत्वों को माफ करेगा ?
मंगलवार, 14 जून 2011
मंगलवार, 7 जून 2011
ईमानदार व सच्चे प्रधान मंत्री
हमारे प्रधान मंत्री बड़े सच्चे आदमी हैं। कुछ समय पहले जब उन्होंने साझा सरकार की मजबूरियों की ओर इशारा किया था तो पूरा मीडिया उनकी साफगोई तथा इमानदारी पर एक ओर से फिदा हो गया था। इसी प्रकार जब सुप्रीम कोर्ट ने अनाज सड़ाने के बजाय गरीबों को बांटने का सुझाव दिया था तो प्रधान मंत्री ने दो टूक शब्दों में न्यायपालिका को अपनी हद में रहने को कह दिया। महंगाई कम करने के मुद्दे पर भी कई बार वादे करने बाद प्रधान मंत्री ने कह दिया कि वह ज्योतिषी तो नहीं हैं। अब भ्रष्टाचार के मामले में बुरी तरह घिर चुकी सरकार को बचाने के लिए भी प्रधान मंत्री ने कह दिया कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए मेरे पास कोई जादुई छड़ी नहीं है।
प्रधान मंत्री सही कह रहे हैं इस देश तथा इस देश के वासियों की समस्याओं का निदान करना उनके वश की बात नही है। पर अमेरिका के साथ परमाणु संधि, जैतापुर में परमाणु बिजली योजना या पास्को को आदिवासियों की जमीन देना या सेज के लिए ओने पौने दामों में उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहण जैसी तमाम पर्यावरण विरोधी, जन विरोधी और अक्सर विधि असम्मत कार्यक्रमों को आमजन के विरोध के बावजूद लागू कराने की जादुई छड़ी अचानक प्रधान मंत्री जी के पास आ जाती है।
यह जादुई छड़ी कैसे और कहां से आजाती है समझने के लिए हमें अपने प्रधान मंत्री की मजबूरियों को समझना होगा। बेचारे प्रधान मंत्री की सारी ताकत तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय बाजार उपलब्ध कराने व कच्चे माल के स्त्रोत खोलने में खर्च हो जाती है। यदि ऐसा नही करें तो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव और अमेरिकी राष्ट्रपतियों का कोप भाजन होना पड़ेगा। और यह कोपभाजन भारतीय जनमानस के कोपभाजन से भारी पड़ेगा ऐसा उन्हें लगता है इसीलिए एक प्रकार के कार्यक्रमों के लिए उनके पास जादुई छड़ी है जबकि दूसरे प्रकार के कार्यक्रम उनके वश में नहीं है। विरोधी दलों के नेताओं के मुंह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मलाई लग गई है। इसलिए वे विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उन कंपनियों पर प्रहार नहीं करते। उनको सारे कमियों बुराइयों की जड़ सोनियां गांधी लगती हैं और उनके सारे वार सोनियां गांधी पर होते हैं। आखिर औरत पर लाठी भांजने में मर्दानगी अधिक निखरती है। मसलन् राजघाट पर धरना देते समय कई भा ज पा नेताओं को नाचते हुए टी वी चैनलों ने दिखाया परन्तु कांग्रेस को सुषमा स्वराज ही नाचती नजर आई। जो मजा सुषमा स्वराज पर लाठी भांजने में आया होगा वह पुरुष नेताओं पर भाजने में नही आया होगा ना।
प्रधान मंत्री सही कह रहे हैं इस देश तथा इस देश के वासियों की समस्याओं का निदान करना उनके वश की बात नही है। पर अमेरिका के साथ परमाणु संधि, जैतापुर में परमाणु बिजली योजना या पास्को को आदिवासियों की जमीन देना या सेज के लिए ओने पौने दामों में उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहण जैसी तमाम पर्यावरण विरोधी, जन विरोधी और अक्सर विधि असम्मत कार्यक्रमों को आमजन के विरोध के बावजूद लागू कराने की जादुई छड़ी अचानक प्रधान मंत्री जी के पास आ जाती है।
यह जादुई छड़ी कैसे और कहां से आजाती है समझने के लिए हमें अपने प्रधान मंत्री की मजबूरियों को समझना होगा। बेचारे प्रधान मंत्री की सारी ताकत तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय बाजार उपलब्ध कराने व कच्चे माल के स्त्रोत खोलने में खर्च हो जाती है। यदि ऐसा नही करें तो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव और अमेरिकी राष्ट्रपतियों का कोप भाजन होना पड़ेगा। और यह कोपभाजन भारतीय जनमानस के कोपभाजन से भारी पड़ेगा ऐसा उन्हें लगता है इसीलिए एक प्रकार के कार्यक्रमों के लिए उनके पास जादुई छड़ी है जबकि दूसरे प्रकार के कार्यक्रम उनके वश में नहीं है। विरोधी दलों के नेताओं के मुंह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मलाई लग गई है। इसलिए वे विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उन कंपनियों पर प्रहार नहीं करते। उनको सारे कमियों बुराइयों की जड़ सोनियां गांधी लगती हैं और उनके सारे वार सोनियां गांधी पर होते हैं। आखिर औरत पर लाठी भांजने में मर्दानगी अधिक निखरती है। मसलन् राजघाट पर धरना देते समय कई भा ज पा नेताओं को नाचते हुए टी वी चैनलों ने दिखाया परन्तु कांग्रेस को सुषमा स्वराज ही नाचती नजर आई। जो मजा सुषमा स्वराज पर लाठी भांजने में आया होगा वह पुरुष नेताओं पर भाजने में नही आया होगा ना।
रविवार, 13 मार्च 2011
जापान में हुई तबाही
जापान में हुई तबाही के आंकलन में प्राकृतिक कारणों के साथ साथ मानव कृत कारणों का भी ईमानदारी से आंकलन होना चाहिये। साथ ही भारत को मानव कृत कारणों से सबक सीखना चाहिये।खासकर परमाणु ऊर्जा संयत्रों से पूरे देशवासियों तथा पूरी मानवता पर जो खतरा मडरा रहा है इस संदर्भ में हमें सोचना चाहिये कि क्या इस कीमत पर हम परमाणु ऊर्जा चाहते हैं। इसका उत्तर उन लोगों से लेना चाहिये जिनके इलाकों में परमाणु ऊर्जा संयत्रों को लगाने का सरकार की इरादा है। यदि जापानी सरकार अपने पक्के इरादों तथा उन्नत तकनीकी ज्ञान के बावजूद अपने लोगों को विकीरण से नहीं बचा पा रही है तो अपनी भ्रष्ट व अकुशल व्यवस्थाओं से हम क्या उमीद कर सकते हैं यह भोपाल गैस कांड पीड़ित हमें हर साल अपनी व्यथा बताकर एहसास कराते हैं।
मंगलवार, 8 मार्च 2011
महिला दिवस 2011
आज महिला दिवस है। शहरों में मध्य वर्ग की कुछ महिलाएं इस दिन कोई न कोई कार्यक्रम करती हैं। या सेमिनार, बहस तथा मुबाहिसा होते हैं। परन्तु क्या अस्तित्व के संकट से जूझती आदिवासी महिलाएं, या पति की आत्महत्या के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी किसान महिलाएं किसी कार्यक्रम या या बहस तथा मुबाहिसा की चिंता का विषय कभी बनी हैं। मेरी जानकारी में नहीं। आज मुझे पुन्य प्रसून बाजपेई की छत्तीसगड़ में पुलिस ज्यादतियों की शिकार आदिवासी महिलाओं पर लिखी रपट याद आरही हैं। इस पर उन्हें पुरस्कार तो मिल गया। पर सभ्य समाज जिसको शायद सिविल सोसाइटी कहते हैं ने उन पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कोई मुहिम नहीं छेड़ी। चूंकि दमन की मुहिम अबिलम्ब चल रही है। इतने सालों में कई और पीडित आदिवासी महिलाओं नाम उन भुग्तभोगी महिलाओं के साथ जुड़ गए होंगे।पर समाज न तब जागा था न अब जागा है। आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरद्ध न महिला संगठन आवाज उठाते हैं न ही महिला आयोग की ये महिलाएं प्रार्थमिकता होती हैं और न ही अनुसूचित जाति अनुसुचित जनजाति आयोग इन महिलाओं के साथ हो रही ज्यादतियों पर कोई प्रतिक्रिया जताते हैं। महिला आंदोलनों का यह दुर्भाग्य रहा है कि बहनापे के नारे के बावजूद यह मध्य वर्ग से नीचे नहीं खिसक पाए हैं।जीवन की मूल सुविधाएं रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम आम गरीब, दलित शोषित महिलाएं, पग पग पर अस्तित्व के संकट से जूझती हर प्रकार की यौन हिंसा का शिकार आदिवासी महिलाओं के संघर्ष के मुद्दे यदि महिला आंदोलन या संगठनों की प्रार्थमिकता होती तो सुषमा स्वराज को महिला आरक्षण की भीख लोक सभा में पुरुष सदस्यों से नहीं मांगनी पड़ती। देश की 48 प्रतिशत महिलाएं 33 प्रतिशत आरक्षण पाने का इंतजार पिछले डेढ़ दशक से कर रही हैं और आज नेता विपक्ष इसके लिए भीख मांग रही है, इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या होसकती है। 80 प्रतिशत गरीब महिलाओं के संघर्षों से दूर ये महिलाए 33 प्रतिशत आपक्षण पाकर क्या सशक्त हो पाएंगी।
सोमवार, 17 जनवरी 2011
ईमानदारी का पैमाना
आजकल सत्ता के गलियारों में सर्वत्र भ्रष्टाचार की बयार बह रही है।ऐसा लगता है कि सत्ताशीनों के लिए ईमानदारी से शासन करना संभव ही नहीं है। यह सब तब हो रहा है जब हमारे प्रधान मंत्री की निजी ईमानदारी पर कोई शक नही करता। उन पर कोई कमिशनखोरी की इल्जाम उनके धुर विरोधी भी नहीं लगाते। समझ में नहीं आता प्रधानमंत्री इतने बेइमानों को झेलने के लिए क्य़ो मजबूर हैं.उनकी पिछली तथा वर्तमान मंत्री परिषद में धूमिल छबि के लोग मंत्री बने। ठीक है गठबंधन सरकार है। पर क्या एक ईमानदारी प्रधान मंत्री अपने सहयोगियों के सामने यह शर्त तो रख ही सकता है कि वह धूमिल छवि वाले मंत्रियों का नेत्रत्व नहीं करेगा। मनमोहन सिंह की स्थिति तो और भी मजबूत थी। जनता ने उनके नहीं श्रीमती सोनियां गांधी के नेत्रत्व को वोट दिया था। ऐसे में मनमोहन सिंह यह शर्त अपनी पार्टी के सामने भी रख सकते थे। पर ऐसा नहीं हुआ। पूरे पांच साल वह दागी मंत्रियों को मंत्रि परिषद में रखने का दंश झेलते रहे।अब जो होरहा है सबके सामने है। मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचारी शासको, प्रशासकों के सामने लाचार नजर आरही है। ऐसे में कई सवाल मन में आरहे हैं. पहला क्या ईमानदार इंसान इतना कमजोर होता है कि बेइमान को झेलना उसकी मजबूरी होती है। मनमोहन सिंह तो चुनाव भी कभी नहीं लड़े हैं।चुनाव खर्च की चिंता तो उन्हें कभी नही रही फिर क्यों वह यह शर्त नहीं रखा पाए उनके साथी ईमानदारी की मिशाल कायम रखेंगे अन्यथा वे सरकार नहीं चलाएगे। इस देश में एक मोहनदास करमचंद गांधी हुए थे। वह तो अपनी शर्त पर ही आंदोलन सत्याग्रह आंदोलन चलाते थे। शर्त टूटी नहीं कि उन्होंने आंदोलन वापस लिया। आज हम उनको भूल गए हैं।याद करते तो देश को आधुनिक सभ्यता की आग में नहीं झोंकते
दूसरा प्रश्न ईमानदारी की प्रकृति से जुड़ा है। क्या बेइमानी नजरअंदाज करना ईमानदारी के दायरे में नहीं आता। जिस प्रकार से अमेरिका के साथ परमणु संधि के लिए संसद में समर्थन जुटाया गया क्या वह ईमानदारी के दायरे में आता है।या परमाणु संधि से होने वाले लाभों का जो झुनझुना जनता को दिखाया गया क्या वह इमानदारी थी। या विकास के नाम पर जो विनाश होने दिया जारहा है वह इस देश तथा इसका जनता के साथ ईमानदारी है। बहुत सारे सवाल हैं पर उत्तर नही मिलता। कई बार सोचती हूं कि सत्यवादी हरीश चंद्र ने भी तो कुछ वादे शादी के समय सात फेरे लेते समय अपनी पत्नी से किये होंगे। पर जब परीक्षा की घड़ी आई तो उन पत्नी को दिये गए उन वादों का क्या हुआ। क्या ईमानदारी केवल मजबूत के संदर्भ में ही होनी चाहिये। अमेरिका को दिये गए वादे तो इस देश व जनता को हर कष्ट देकर निभाएं पर संविधान में इस देश के नागरिकों को दिये गए वादों का क्या । गिलास आधा भरा आधा खाली
दूसरा प्रश्न ईमानदारी की प्रकृति से जुड़ा है। क्या बेइमानी नजरअंदाज करना ईमानदारी के दायरे में नहीं आता। जिस प्रकार से अमेरिका के साथ परमणु संधि के लिए संसद में समर्थन जुटाया गया क्या वह ईमानदारी के दायरे में आता है।या परमाणु संधि से होने वाले लाभों का जो झुनझुना जनता को दिखाया गया क्या वह इमानदारी थी। या विकास के नाम पर जो विनाश होने दिया जारहा है वह इस देश तथा इसका जनता के साथ ईमानदारी है। बहुत सारे सवाल हैं पर उत्तर नही मिलता। कई बार सोचती हूं कि सत्यवादी हरीश चंद्र ने भी तो कुछ वादे शादी के समय सात फेरे लेते समय अपनी पत्नी से किये होंगे। पर जब परीक्षा की घड़ी आई तो उन पत्नी को दिये गए उन वादों का क्या हुआ। क्या ईमानदारी केवल मजबूत के संदर्भ में ही होनी चाहिये। अमेरिका को दिये गए वादे तो इस देश व जनता को हर कष्ट देकर निभाएं पर संविधान में इस देश के नागरिकों को दिये गए वादों का क्या । गिलास आधा भरा आधा खाली
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