सोमवार, 17 जनवरी 2011

ईमानदारी का पैमाना

आजकल सत्ता के गलियारों में सर्वत्र भ्रष्टाचार की बयार बह रही है।ऐसा लगता है कि सत्ताशीनों के लिए ईमानदारी से शासन करना संभव ही नहीं है। यह सब तब हो रहा है जब हमारे प्रधान मंत्री की निजी ईमानदारी पर कोई शक नही करता। उन पर कोई कमिशनखोरी की इल्जाम उनके धुर विरोधी भी नहीं लगाते। समझ में नहीं आता प्रधानमंत्री इतने बेइमानों को झेलने के लिए क्य़ो मजबूर हैं.उनकी पिछली तथा वर्तमान मंत्री परिषद में धूमिल छबि के लोग मंत्री बने। ठीक है गठबंधन सरकार है। पर क्या एक ईमानदारी प्रधान मंत्री अपने सहयोगियों के सामने यह शर्त तो रख ही सकता है कि वह धूमिल छवि वाले मंत्रियों का नेत्रत्व नहीं करेगा। मनमोहन सिंह की स्थिति तो और भी मजबूत थी। जनता ने उनके नहीं श्रीमती सोनियां गांधी के नेत्रत्व को वोट दिया था। ऐसे में मनमोहन सिंह यह शर्त अपनी पार्टी के सामने भी रख सकते थे। पर ऐसा नहीं हुआ। पूरे पांच साल वह दागी मंत्रियों को मंत्रि परिषद में रखने का दंश झेलते रहे।अब जो होरहा है सबके सामने है। मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचारी शासको, प्रशासकों के सामने लाचार नजर आरही है। ऐसे में कई सवाल मन में आरहे हैं. पहला क्या ईमानदार इंसान इतना कमजोर होता है कि बेइमान को झेलना उसकी मजबूरी होती है। मनमोहन सिंह तो चुनाव भी कभी नहीं लड़े हैं।चुनाव खर्च की चिंता तो उन्हें कभी नही रही फिर क्यों वह यह शर्त नहीं रखा पाए उनके साथी ईमानदारी की मिशाल कायम रखेंगे अन्यथा वे सरकार नहीं चलाएगे। इस देश में एक मोहनदास करमचंद गांधी हुए थे। वह तो अपनी शर्त पर ही आंदोलन सत्याग्रह आंदोलन चलाते थे। शर्त टूटी नहीं कि उन्होंने आंदोलन वापस लिया। आज हम उनको भूल गए हैं।याद करते तो देश को आधुनिक सभ्यता की आग में नहीं झोंकते
दूसरा प्रश्न ईमानदारी की प्रकृति से जुड़ा है। क्या बेइमानी नजरअंदाज करना ईमानदारी के दायरे में नहीं आता। जिस प्रकार से अमेरिका के साथ परमणु संधि के लिए संसद में समर्थन जुटाया गया क्या वह ईमानदारी के दायरे में आता है।या परमाणु संधि से होने वाले लाभों का जो झुनझुना जनता को दिखाया गया क्या वह इमानदारी थी। या विकास के नाम पर जो विनाश होने दिया जारहा है वह इस देश तथा इसका जनता के साथ ईमानदारी है। बहुत सारे सवाल हैं पर उत्तर नही मिलता। कई बार सोचती हूं कि सत्यवादी हरीश चंद्र ने भी तो कुछ वादे शादी के समय सात फेरे लेते समय अपनी पत्नी से किये होंगे। पर जब परीक्षा की घड़ी आई तो उन पत्नी को दिये गए उन वादों का क्या हुआ। क्या ईमानदारी केवल मजबूत के संदर्भ में ही होनी चाहिये। अमेरिका को दिये गए वादे तो इस देश व जनता को हर कष्ट देकर निभाएं पर संविधान में इस देश के नागरिकों को दिये गए वादों का क्या । गिलास आधा भरा आधा खाली

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें