मंगलवार, 8 मार्च 2011

महिला दिवस 2011

आज महिला दिवस है। शहरों में मध्य वर्ग की कुछ महिलाएं इस दिन कोई न कोई कार्यक्रम करती हैं। या सेमिनार, बहस तथा मुबाहिसा होते हैं। परन्तु क्या अस्तित्व के संकट से जूझती आदिवासी महिलाएं, या पति की आत्महत्या के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी किसान महिलाएं किसी कार्यक्रम या या बहस तथा मुबाहिसा की चिंता का विषय कभी बनी हैं। मेरी जानकारी में नहीं। आज मुझे पुन्य प्रसून बाजपेई की छत्तीसगड़ में पुलिस ज्यादतियों की शिकार आदिवासी महिलाओं पर लिखी रपट याद आरही हैं। इस पर उन्हें पुरस्कार तो मिल गया। पर सभ्य समाज जिसको शायद सिविल सोसाइटी कहते हैं ने उन पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कोई मुहिम नहीं छेड़ी। चूंकि दमन की मुहिम अबिलम्ब चल रही है। इतने सालों में कई और पीडित आदिवासी महिलाओं नाम उन भुग्तभोगी महिलाओं के साथ जुड़ गए होंगे।पर समाज न तब जागा था न अब जागा है। आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरद्ध न महिला संगठन आवाज उठाते हैं न ही महिला आयोग की ये महिलाएं प्रार्थमिकता होती हैं और न ही अनुसूचित जाति अनुसुचित जनजाति आयोग इन महिलाओं के साथ हो रही ज्यादतियों पर कोई प्रतिक्रिया जताते हैं। महिला आंदोलनों का यह दुर्भाग्य रहा है कि बहनापे के नारे के बावजूद यह मध्य वर्ग से नीचे नहीं खिसक पाए हैं।जीवन की मूल सुविधाएं रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम आम गरीब, दलित शोषित महिलाएं, पग पग पर अस्तित्व के संकट से जूझती हर प्रकार की यौन हिंसा का शिकार आदिवासी महिलाओं के संघर्ष के मुद्दे यदि महिला आंदोलन या संगठनों की प्रार्थमिकता होती तो सुषमा स्वराज को महिला आरक्षण की भीख लोक सभा में पुरुष सदस्यों से नहीं मांगनी पड़ती। देश की 48 प्रतिशत महिलाएं 33 प्रतिशत आरक्षण पाने का इंतजार पिछले डेढ़ दशक से कर रही हैं और आज नेता विपक्ष इसके लिए भीख मांग रही है, इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या होसकती है। 80 प्रतिशत गरीब महिलाओं के संघर्षों से दूर ये महिलाए 33 प्रतिशत आपक्षण पाकर क्या सशक्त हो पाएंगी।

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