टीम अन्ना के उपवास स्थल पर पहले तीन दिन
लोगों की कम उपस्थिति सरकार और बाबा रामदेव के लिए आत्मतुष्टि का सबब बनते देखकर
आश्चर्य हुआ।मैं तो सोच रही थी यह सबके लिए चिंता का विषय है। क्योंकि भ्रष्टाचार का मुद्दा जस का
तस है। आज टीम अन्ना सी ए जी की रपटों तथा अन्य विश्वसनीय सूत्रों जुटाए तथ्यों के
आधार पर मनमोहन सिंह समेत उनकी सरकार के 15 मंत्रियों को सबूतों के साथ कठघरे में
खड़ा कर रही है। जब कि पिछले अनशन के समय ये पाकसाफ नजर आरहे थे। सरकार के पास इन
सबूतों का कोई माकूल जबाब नहीं है। वह
मीडिया में टीम अन्ना के सदस्यों से उल्टा सीधा तो कह रही है पर उस पर लगाए गए आरोपों
पर जांच कराने की बात से बच रही है साथ ही टीम अन्ना के विरुद्ध कोई कानूनी कारवाही
भी नहीं कर रही है। आम इंसान जो पिछले उपवासों में बड़ी आशा तथा उमीद के साथ इस
आंदोलन से जुड़ा था उसके लिए यह भयावह स्थिति है। भ्रष्टाचार की वजह से उसके जीने
के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाएं दिन पर दिन उससे दूर होती जारही हैं। दूसरी तरफ
पिछले एक साल में सरकार ने जन लोकपाल विधेयक लाने से बचने के लिए जो दांव पेच खेले
हैं वे सबके सामने हैं।ऐसे में लोगों की टीम अन्ना के अहिंसात्मक तरीकों से
नाउमीदी भारतीय संविधान तथा लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी थी न कि टीम अन्ना खासकर
अरविंद केजरीवाल से मोहभंग था।
आमजन
की अपेक्षतया कम उपस्थिति पर जो बहस टी वी चैनलों पर होरही थी उसपर आश्चर्य होरहा
था। बाबा जी ने तो रामलीला मैदान में जो आंदोलन की रणनीति का जिक्र किया और 9
अगस्त को दिल्ली में 9 लाख लोगों के आने का दावा किया उससे जन आंदोलनों में आमजन
की स्वतः सुपूर्त भागीदारी की धारणा को ही सिर के बल खड़ा कर दिया। इस पर उनके
प्रवक्ता एक चैनल में उनको आंदोलन का जनक तथा टीम अन्ना खासकर अरविन्द केजरीवाल को
आंदोलन की उपज बता रहे थे। मैं सोच रही थी जब हमने तथाकथित जनक का नाम भी नहीं
सुना था तब अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के झुग्गीवासियों के साथ राशन की दुकानों या
डीडीए के दफ्तर जैसी जगहों में होने वाले भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे थे कई बार
राशन के दुकानदारों ने इनकी टीम पर हमला भी किया।आज भी उनकी संस्था के दरवाजे
झुग्गीवालों के लिए खुले हैं। मैं ऐसे कई झुग्गीवालों को जानती हूं जिनकी उन्होंने
मदद की थी। आज भी जरूरत पड़ने पर वे उनकी संस्था में जाते हैं। उनको जानने वाले
झुग्गीवालों का उनपर अटूट विश्वास है। अन्ना के पिछले आंदोलनों में इन
झुग्गीवासियों ने अपना सक्रिय योगदान दिया। अरविन्द केजरीवाल तथा प्रशांत भूषण जैसे अन्ना टीम के सदस्य अपना
ढ़ोल खुद नहीं पीटते हैं। लेकिन उनको जानने वाले जानते है वे क्या हैं।खुद को
आंदोलन का जनक मानने वालों को समझना चाहिये कि बंद मुट्ठी ही लाख की होती है। आज
जब सरकार में किसी को भी संविधान या
लोकतंत्र की चिंता नहीं दिखती ऐसे में मीडिया तथा आंदोलन के आलोचकों को आंदोलन की
सकारात्मक आलोचना करनी चाहिये ताकि तू तू मैं मैं के बदले कुछ ऐसे सुझाव इन बहस
मुबाहिसाओं से निकलें जिससे टीम अन्ना को अपनी गल्तियों का एहसास हो और आगे की
रणनीति बनाने के लिए कुछ नए आयाम मिल जाए ताकि आमजन का विश्वास अपनी संगठित ताकत
तथा जन आंदोलनों पर बना रहे। मेरा मानना है कि सवाल भीड़ का नहीं सवाल जनशक्ति पर
विश्वास का है।
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