शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

भ्रष्टाचार की जड़



व्यवस्था को पोसते इस भ्रष्टाचार पर भी तो सवाल उठने चाहिये।आज विश्व का शायद ही कोई देश होगा जहां अमीरी और गरीबी के बीच की खाई दिन पर दिन चौड़ी हुई जारही है। 80 के दशक के प्रारंभ से ही यह चौड़ाई अनियंत्रित रफ्तार से बढ़ रही है। द इकौनौमिस्ट में 13 अक्तूबर 2012 में छपे एक लेख के अनुसार अमेरिका में एक प्रतिशत सबसे धनी लोगों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा 10प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत होगया।समाज के शीर्ष के .01 प्रतिशत करीब 16000 परिवारों की आमदनी में इस दौरान चार गुना इजाफा हुआ,यानि राष्ट्रीय आय में इनका हिस्सा 1 प्रतिशत से बढ़कर 5 प्रतिशत होगया। अमेरिका ही नहीं ब्रिटेन, कैनाडा, स्वीडन, चीन तथा भारत में भी शीर्ष के 1 प्रतिशत लोगों की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी बढ़ी। विकासशील देशों में बढ़ती गरीबी के कारण समाज में हर प्रकार की विकृतियां आरही हैं।
मूल प्रश्न यह है कि क्या पूरे विश्व के इन धन्ना सेठों को यह छप्पर फाड़ धन वर्षा इमानदार साधनों से हुई या हर देश में सरकारों को गठन से लेकर नीति निर्धारण तथा उन नीतियों के क्रियांवयन में की गई गड़बड़ियों की वजह से हुई। यह तो हर कोई समझता है कि विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अंतर्राष्ट्रीय जगत में इन धन्ना सेठों के लिए जोड़ तोड़ करता है। इस स्थिति में हम क्या वर्तमान वैश्वीकरण-उदारीकरण की व्यवस्था या बाजार व्यवस्था का बोलबाला समाप्त किये बगैर क्या भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकते हैं।पूजींवादी व्यवस्था में भ्रष्ट साधनों से पूंजीपतियों ने अपना वर्चश्व कायम किया । अब वे पूरे विश्व के साधनों पर अपना एक छत्र नियंत्रण करने का प्रयत्न कर रहे हैं।

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र


अरविंद जी आप कई सवालों के जवाब जनता पर छोड़ देते हैं। अपनी पूरी मुहिम की ( )सफलता की जिम्मेदारी भी जनता पर छोड़ देते हैं। परंतु जनता के चरित्र पर कभी कुछ नहीं बोलते। हम सभी जानते हैं कि जनता बेनाम तथा बेआकार(नेमल्यस तथा फेसल्यस) नहीं होती। वह जाति,धर्म, स्त्री पुरुष,भाषा, प्रदेश, क्षेत्र , अमीर गरीब जैसे खाचों में बटी होता है। आंदोलन के दौरान सारे चेहरे और नाम अवश्य नैपथ्य में चले जाते हैं। सत्ता में आते ही ये खांचे अहम् हो जाते हैं। दुनिया की तमाम क्रांतियों, आंदोलनों के उदाहरण हमारे सामने हैं। सत्ता हाथ में आते ही संघर्षों में दशकों तपे लोग निजी स्वार्थों के मकड़जाल में फस गए।गांधी ने कुछ सोच कर ही आजादी मिलते ही कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया होगा। परन्तु वह सुझाव नही माना गया। क्यों यह चितन मनन का प्रश्न है।
खैर अभी कृपया इतना स्पष्ट कर दें जाति व्यवस्था पर आधारित गावों की संरचना में जो ग्राम सभाएं नीति निर्धारण की जिम्मेदारी संभालेंगी वे क्या दलितों तथा महिलाओं के प्रश्नों पर अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ पाएंगी । गांव के सवर्ण और दबंग ग्राम सभा को मिली  सत्ता  का दुरुपयोग अपने निजी स्वार्थ साधने के लिए नहीं करेंगे इसकी क्या गारंटी है। कृपया समझाएं।
समस्त शुभ कामनाओं सहित
गोपा जोशी

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

जवाबदेही




स. रा. अमेरिका में राष्ट्रपति के उम्मीदवार  नए रोजगारों का स्रजन, शिक्षा व्यवस्था व स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार, स्वास्थ्य बीमा की सीमाओं, ओबामा स्वास्थ्य बीमा की कमियों, करों में कटौती, विदेशी पुंजी की अमेरिका में आवक में बृद्धि के उपायों, जैसे मुद्दों में सार्वजनिक बहस करते हैं। ओबामा बार बार अपनी दादी जैसी गरीब अमेरिकियों का जिक्र कर आम अमेरिकी की समस्याओं को दूर करने की अपनी प्रार्थमिकता दोहरा रहे थे। इसके उलट हमारे यहां कांग्रेस अध्यक्षा उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को फोन कर अपने व अपने लाड़ले के संसदीय क्षेत्र में 24 घंटे बिजली की व्यवस्था करवाती हैं। जबकि खास लोगों के संसदीय क्षेत्रों को छोड़ कर पूरे प्रदेश में बिजली के लिए त्राहि त्राहि मची है। सस्ते गैस के सिलेंडरों की संख्या 6 करने के बाद कांग्रेस शासित प्रदेश सरकारों को तीन और सिलेंडर सस्ते दामों में बेचने का आदेश देती है। उनको दो संसदीय क्षेत्रों को छोड़कर बाकी उत्तर प्रदेश की जनता की बिजली की आवश्यकता,तथा गैर कांग्रेस शासित प्रदेशों के लोगों के लिए सस्ते गैस सिलेंडर की व्यवस्था करना अपनी जिम्मेदारी नही लगती।
हमारे प्रधान मंत्री का तो कहना ही क्या। वे तो चुनाव लड़ते ही नहीं । इसलिए आम आदमी कि चिंता भी क्यों करें।उनकी चिंता ही स. रा. अमेरिका की सरकार, वहां की बहुराष्ट्रीय निगमों की सुविधानुसार देश में बिजली सड़क पानी की व्यवस्था, विशाल  भारतीय बाजार की उनके लिए सहज उपलब्धि, विदेशी पूंजी के लिए  बाजार की व्यवस्था, जी डी पी आदि आदि रहे हैं।इसीलिए चौतरफा विरोध के बावजूद सुर्ख लाल चेहरा लिए बिना एक बार भी पलक झपकाए,पथरीली आखें देशवासियों पर तरेरते प्रधान मंत्री देश के नाम संदेश में लोगों को यह समझा रहे थे कि आज की माली हालत में खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश के बिना अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आसकती। लेकिन अर्थव्यवस्था पटरी से उतारने का श्रेय लेने की जुर्रत उन्होंने नहीं की।यह बताना भी ठीक नही समझा कि कैसे खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश  से भारतीय बच्चों में बढ़ता कुपोषण,बिगड़ती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य ब्यवस्था, बढ़ती हुई किसानों की आत्महत्याएं,अमीरी तथा गरीबी के बीच चौड़ी होती खाई,बिगड़ता पर्यावरण जैसी तमाम समस्याएं कैसे दूर होंगी। विपक्ष के लिए भी आम जन के सवाल बहस के मुद्दे नहीं हैं। वह खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश का विरोध कर अगले चुनाव की तैयारी करना चाहता है। इसीलिए  विकास का तमगा लगाए गुजरात के मुख्य मंत्री ने अपने चुनाव भाषणों में यह स्पष्ट करने के बजाय कि तथाकथित विकास करने में अग्रणी होने के बावजूद उनका प्रदेश मानव विकास मानकों जैसे बाल कुपोषण में क्यों आगे है सोनिया गांधी के विदेश में हुए इलाज में हुए सरकारी धन को मुद्दा बनाया। आम आदमी मूलभूत आवश्यकताएं भारत के किसी भी राजनीतिक दल  की चिंता नहीं है। ऐसा लगता है कि अमेरिका का राष्ट्रपति अपने देशवासियों के लिए जवाबदेह होता है जबकि हमारे नेता विदेशी पूंजी के लिए जवाबदेह होते हैं। उसको देश में खपाने के लिए एड़ी चोटी का दाव लगा देते हैं। सत्ता पाने के बाद क्या मंत्री क्या सांसद विधायक सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राओं की जुगत भिड़ाने में  लगे रहते हैं। अभी कुछ समय पहले कर्नाटक के विधायकों का अध्ययन के बहाने लम्बे विदेशी यात्राओ सपरिवार  करने का मामला एक चैनल ने उठाया था। उसके बाद क्या हुआ पता नही चला।