व्यवस्था को पोसते इस भ्रष्टाचार पर भी
तो सवाल उठने चाहिये।आज विश्व का शायद ही कोई देश होगा जहां अमीरी और गरीबी के बीच
की खाई दिन पर दिन चौड़ी हुई जारही है। 80 के दशक के प्रारंभ से ही यह चौड़ाई
अनियंत्रित रफ्तार से बढ़ रही है। द इकौनौमिस्ट में 13 अक्तूबर 2012 में छपे एक लेख के अनुसार अमेरिका में एक
प्रतिशत सबसे धनी लोगों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा 10प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत
होगया।समाज के शीर्ष के .01 प्रतिशत करीब 16000 परिवारों की आमदनी में इस दौरान
चार गुना इजाफा हुआ,यानि राष्ट्रीय आय में इनका हिस्सा 1 प्रतिशत से बढ़कर 5 प्रतिशत
होगया। अमेरिका ही नहीं ब्रिटेन, कैनाडा, स्वीडन, चीन तथा
भारत में भी शीर्ष के 1 प्रतिशत लोगों की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी बढ़ी। विकासशील
देशों में बढ़ती गरीबी के कारण समाज में हर प्रकार की विकृतियां आरही हैं।
मूल
प्रश्न यह है कि क्या पूरे विश्व के इन धन्ना सेठों को यह छप्पर फाड़ धन वर्षा
इमानदार साधनों से हुई या हर देश में सरकारों को गठन से लेकर नीति निर्धारण तथा उन
नीतियों के क्रियांवयन में की गई गड़बड़ियों की वजह से हुई। यह तो हर कोई समझता है
कि विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अंतर्राष्ट्रीय जगत में इन धन्ना
सेठों के लिए जोड़ तोड़ करता है। इस स्थिति में हम क्या वर्तमान वैश्वीकरण-उदारीकरण
की व्यवस्था या बाजार व्यवस्था का बोलबाला समाप्त किये बगैर क्या भ्रष्टाचार पर
लगाम लगा सकते हैं।पूजींवादी व्यवस्था में भ्रष्ट साधनों से पूंजीपतियों ने अपना
वर्चश्व कायम किया । अब वे पूरे विश्व के साधनों पर अपना एक छत्र नियंत्रण करने का
प्रयत्न कर रहे हैं।शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012
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