सोमवार, 15 जुलाई 2013

दागियों के लिए नरमदिली




सुप्रीम कोर्ट ने एक के बाद एक फैसलों से हमारे राजनीतिक दलों को पशोपेश में डाल दिया है। सर्व प्रथम 5 जुलाय 2013 को तामिलनाडु सरकार के घोषित मु्फ्त उपहार को चुनौती देने वाली याचिका में फैसला देते हुए ऐसे उपहारों की घोषणाओं को अवैधानिक बताया और चुनाव आयोग से इस सवाल पर दिशा निर्देश जारी करने को कहा। इसी प्रकार जनप्रतिनिधि कानून की धारा 8(4) को निरस्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया कि दो साल से अधिक कारावास की सजा पाते ही जनप्रतिनिधि उस सदन की सदस्यता के अयोग्य हो जाएंगे तथा जेल या पुलिस हिरासत से कोई भी चुनाव नही लड़ सकेगा।। उल्लेखनीय है जनप्रतिनिधियों को यह कानूनी संरक्षण न तो संविधान में प्राप्त है न ही जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में।1989 में इस कानून में संशोधन कर दो वर्ष या उससे अधिक सजा प्राप्त जनप्रतिनिधियो को तब तक अपनी कुर्सी पर बन रहने का अधिकार दे दिया जब तक उच्च अदालत में उनकी अपील पर फैसला न आ जाय।  इस प्रकार हमारे सांसद अपने वेतन भत्ते बढ़ाने तक ही नहीं रुके वरन उन्होंने स्वंय को गैरकानूनी काम करने पर सजा से बचने के लिए वे कानूनी संरक्षण भी दे डाले जो आम भारतीय को उपलब्ध नहीं हैं।आज सभी राजनितिक दलों के नेता इस फैसले का सार्वजनिकरूप से स्वागत तो कर रहे हैं। लेकिन उनकी मायूसी भी छिपाए नहीं छिप रही है। मसलन मणिशंकर अय़्यर जैसे नेता ने एक चैनल में कहा कि अपराधिक छबि वाले नेताओं की संख्या उतनी अधिक नही है जितना मीडिया बता रहा है। जब याचिकाकर्ता ने कहा कि यह संख्या चुनाव आयोग को चुनाव के समय स्वयं जनप्रतिनिधियों द्वारा दी सूचना पर आधारित है तो चुप होगए। सवाल है कि ये इमानदार नेता भी दागी नेताओं के प्रति सहानुभूति या सदाशयता क्यों रखते हैं । जबकि यह स्थिति किसी भी इमानदार नेता के लिए व्यथित करने वाली होनी चाहिये कि उसके कुछ साथी अपराधी छबि वाले हैं।
      दूसरा यह दलील दी जारही है कि पुलिस राजनीतिक दबाव में नेताओं पर गलत धाराएं लगा देती है।इसलिए राजनेताओं को राजनीतिक मजबूरियों की वजह से यह छूट दी जानी चाहिये। पुलिस तो आमजन को भी इसी तरह सताती है। कहा जाता है कि वह इस प्रकार सता कर जो पैसा वसूलती है वह ऊपर तक जाता है।अतः झूठे केसों से बचने के लिए ये नेतागण पुलिस सुधार की मुहिम क्यों नही चलाते हैं।इतिहास गवाह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद कोई भी राजनीतिक दल पुलिस सुधार की बात नहीं करता। इससे यह साफ होता है कि बोशक दागी करीब एक तिहाई हैं पर उनसे लाभांवित होने वालों की संख्या कई गुना अधिक होगी। इसीलिए राजनीतिक दल दबे स्वर में इस फैसले से उत्पनं होने वाली विसंगतियों की तरफ इशारा करते है। जिस जनता की दुहाई देते ये दल नहीं थकते वह तो इन विसंगतियों से रोज ही दो चार होती है।  

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