12,7,2013
के समांतर में भूख के बरक्स शीर्षक में गरीबों के लिये सस्ती राशन ब्यवस्था करने
पर अपनी पीठ ठोकने वाले राज्यों की असलियत बयान कर दी। खाद्य सुरक्षा अधिनियम का
जिक्र आते ही टी वी चैनलों में छत्तीसगढ़ का गुणगान होने लगता है। क्या राजनीतिज्ञ,
क्या विशेषज्ञ, सभी प्रशंसा करते नहीं थकते। पर यह जानकारी शायद किसी को नहीं है कि
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद वहां पर राशन की दुकानें महिने के किसी भी दो दिन
खोली जाती हैं। ये कौन से दो दिन होंगे यह भी तय नही है। आज की भ्रष्ट ब्यवस्था में यह क्यों किया गया होगा समझा जा सकता है। आश्चर्य यह सब जिला कल्कटर के आदेशानुसार हुआ है। स्वाभाविक है अक्सर बहुत से
लोगों को इन दुकानों के खुलने का पता नही चलता होगा। उनके हिस्से के अनाज का क्या होता होगा यह आपकी ही रपट से स्प्ष्ट हो जाता है। आप लिखते हैं कि इन दुकानों के ज्यादातर डीलर समाज के वर्चस्वशालू तबके से आते हैं। स्थनाय समाज राशन की दुकानों पर किस प्रकार निगरानी रख सकता है यह भी परिभाषित नहीं है। आपने यह भी बताया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के
अनुसार इन दुकानों को हर महिने 26 दिन
खुलना होता है। इसी प्रकार आपने बताया है कि
राज्य सरकार के आदेश के अनुसार हर तीन किलोमीटर की परिधि में एक राशन की दुकान
होनी चाहिये। जो कि नहीं है। आश्चर्य है कि विरोधी दलों के राजनीतिक दलों के साथ
साथ मीडिया में छाये रहने वाले विशेषज्ञों को भी इस हकीकत का पता नहीं है। आज के
सूचना के युग में यदि गरीबों की समस्या संबंधी प्रश्नों पर हमारी जानकारी की यह
स्थिति है और हम जमीनी स्तर की अपनी जानकारी को पुख्ता किये बगैर ही पुख्ता सूचना होने का माहौल बना
देते हैं। ऐसी घोर उदासीनता की मानसिकता लिए हम किन गरीबों के पोषण की समस्या का
समाधान करने का दम भरते हैं। यह समझा जा सकता है ।
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