शनिवार, 21 सितंबर 2013

मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा के निहितार्थ



अगस्त सितंबर 2013 हुई मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा के जो तथ्य समाचार माध्यमों से सामने आए हैं उनसे साफ होजाता है कि यदि पुलिस व प्रशासन यौन हिंसा के मामलों को गंभीरता से लेता और निष्पक्ष भाव से दोषियों को कानून के हवाले करता तो सांप्रदायिक तत्वों को इस प्रकार की हिंसा के बहाने जन भावनाओं को भड़काने का मौका नहीं मिलता। यह तब होता जब पुलिस प्रशासन शासकों के राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होता। पुलिस प्रशासन को अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए पुलिस रिफार्म आवश्यक हैं। समस्त पुलिस प्रशासन को यौन हिंसा पीड़ितों के दुख दर्दों के प्रति संवेदनशील बनाना दूसरी आवश्यकता है।यदि पुलिस प्रशासन यौन हिंसा के मामलों में जीरो टौलरेंस की नीति अपना ले तो समाज में कई मूलभूत परिवर्तन आजाएंगे। मसलन यौनहिंसा पीड़ित स्वंय पुलिस की सहायता से मुजरिम को कानून का हवाले करा सकती है। ऐसी अवस्था में परिजनों को कानून को हाथ में लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।कमजोर परिवारों व समाजों की महिलाओं को भी न्याय मिलने का विश्वास रहेगा। ऐसे आश्वस्त समाज की भावनाओं को भड़काने लिए  सांप्रदायिक तत्वों के लिए आसान  नहीं होगा।
दूसरा इस जघन्य हिंसाकांड ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजानीति नेताओं के बबुवाओं के बस की नहीं है। राजनीति करने के लिए समाज में रचा बसा होना आवश्यक है। सारी सुविधाओं से लैस पांचसितारा माहौल में बचपन व यौवन काटने के बाद चांदी काटने के लिए राजनीति में आना इस देश व देशवासियों के साथ घोर अन्याय है। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने अभी तक समय की नजाकत को पहचान कर मौके पर पहुच कर आमजन के जख्मों पर मरहम लगाने का जरुरत को महसूस नहीं किया है।इसके विपरीत एक पत्रकार ने अपने लेख में लिखा कि उन्हें अधिकारियों की जमीनी स्तर की रपटों को सुनने में भी कोई रस नहीं आता। ऐसे अवसरों पर थोड़े समय बाद ही वे अपना धैर्य खो बैठते हैं और अपने मोबाइल फौन को पढ़ने लगते हैं। साफ है उन्हें जनता के मामलों को गंभीरता से लेने का पाठ नही पढ़ाया गया है।
सांप्रदायिक हिंसा के बाद हिंसा पीड़ितों को धर्म के आधार पर रेखांकित किया जाता है।सुरक्षा, मुआवजा, पुनर्वास धर्म के आधार पर पीड़ितों को दिया जाता है। परंतु बड़ी संख्या में दंगों की वजह से गरीब मजदूर, रेहड़ी खोम्चे वाले बेरोजगार होगए।बड़ी संख्या में ये लोग सपरिवार पलायन कर चुके हैं। पर उनके इस विस्थापन की ओर सरकार, या पत्रकारों  किसी का भी ध्यान नही गया। दिल्ली की एक छोटी सी बैठक में इस इलाके से दिल्ली पीएचडी करने आए एक सज्जन ने बताया कि कई हजार दलित मजदूर वहां से पलायन कर गए हैं। अभी दो तीन दिन पहले जनसत्ता में छपी एक खबर के अनुसार यहां किसानों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। कारण दंगों की वजह से वे सपरिवार पंजाब या उत्तराखंड को पलायन कर चुके हैं।  परंतु किस मजबूरी में उन्हें पलायन करना पड़ा। इससे उन्हें कितना नुकसान हुआ इसपर किसी को खोज करने की जरूरत नहीं पड़ रही है। यहा यह कहना प्रासंगिक है कि गरीब तथा महिलाएं ही दंगों की मार सबसे अधिक झेलती हैं।

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