आजकल हमारे देश में स्वतंत्रता आंदोलन
में महत्वपूर्ण विभूतियों की भूमिका पर चुनावी भाषणों तीखी टिप्पणी की जारही
हैं।कुछ पर देश के विभाजन तथा देश को अवनति की दिशा में लेजाने का आरोप लगाए जारहे
हैं। लेकिन आरोप लगाने वाले यह नहीं बताते कि जब देश के विभाजन की तथाकथित साजिश
चल रही थी उनके अपने संगठन क्या कर रहे थे। क्या उन्होंने इसे रुकवाने की असफल ही
सही कोई कोशिश की थी। यदि नहीं तो आज चुनाव में फायदे के लिए इतिहास के साथ
खिलवाड़ करने का किसी को क्या अधिकार है।
रविवार, 17 नवंबर 2013
इन सवालों के उत्तर तो मिलने ही चाहिये
आज 17,11, 2013 की सुबह किसी चैनल
में नजमा हैपतुल्ला को कहते हुए सुना कि
गुजरात के 2002 के दंगों के अलावा भा.ज.पा. शासित राज्यों में दंगे नही हुए हैं.।
बिहार में भी भा.ज.पा. जे.डी.यू. की दोस्ती टूटने के बाद ही सांप्रदायिक तथा आतंकी
हिंसा की बारदातें होने लगी हैं।पर ऐसा क्यों होता है यह समझ में नहीं आता। बिहार
में मोदी की रैली से पहले ही विस्पोट होने लगे थे। रैली स्थल में भी विस्फोट हुए।
एक जिंदा बम स्टेज के नीचे पाया गया।लेकिन पूरा का पूरा नेतृत्व निर्भीक होकर अपने
काम में जुटा रहा।इसके विपरीत जब संसद में हमला हुआ कोई भी नेता सुरक्षा कवज के
घेरे को तोड़ कर बाहर नही निकला। हमले का
सारा दंश सुरक्षा बलों ने झेला।कई शहीद हुए। लेकिन नेता कोई बाहर नहीं निकला। बिहार
रैली स्थल में ही नहीं उसके बाद भी कई जगह कई लाइव बम पाए गए । इससे पहले एक बार गुजरात में
(यदि मुझे ठीक से याद है तो सूरत में) कई जगह इस प्रकार के बम पाए गए। शायद यह पता
नहीं चल पाया कि इन बमों को बनाने तथा रखने में किसका हाथ था। तथा क्या कारण था कि
इतने सारे बम नही फटे व कई लागों की जानें बच गई।
जब सारा देश सचिन और क्रिकेट के रंग में
रगा था टीवी पर पट्टी में लिखा आरहा था की बिहार के कुछ भागों में नमक की कमी की
अफवाह गरम थी और नमक 100रु. किलो तक बिक रहा था इसके बाद यह अफवाह अन्य प्रदेशों
में भी फैल गई तथा नमक को 200 रु किलो तक बिकने के समाचार पढ़ने को मिले। बहुत साल
पहने गणेश जी के दूध पीने की अफवाह जंगल की आग की तरह फैली।इन अफवाहों के लिए कौन
जिम्मेदार था या थे पता नहीं चल पाया।
क्या कभी इन तथा इन जैसे अन्य प्रश्नों के उत्तर मिल पाएंगे।
सोमवार, 11 नवंबर 2013
सरदार के नाम पर ठगी
सरदार पटेल अचानक ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। मोदी के गुजरात में कारपोरेट जगत की चांदी है। आम आदमी की वहां पर कोई कदर नहीं है। इस बेकदरी को ढ़कने में मोदी ने अभी तक तो अपने हिंदू कार्ड के माध्यम से सफलता पाई है।लेकिन जैसा कि सामाजिक विकास के मापदंडों से साफ हुआ है मोदी राज में आम इंसान के जीवन में किसी भी प्रकार की संपनंता नही आई है। चूंकि हिंदू कार्ड का असर पूरे देश में 2014 तक उतना पुख्ता नही किया जासकता जितना गुजरात में किया है इसलिए सरदार कार्ड खेला जारहा है। पूरे देश के किसानों से मूर्ति बनाने के लिए लोहा देने की अपील की जारही है।
किसान ही
क्यों लोहा दें। कारण पटेल को सरदार की उपाधि बारडोली के किसान सत्याग्रह के बाद
मिली थी। मोदी जो राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ नेताओं को पानी पी पी कर कोस रहे हैं
इमानदारी से बताएं इस आंदोलन में आर एस एस की क्या भूमिका थी। दूसरा बताए किस
प्रकार पिछले 10 साल में गुजरात में किसान की खुशहाली बढ़ी है। तीसरा बताएं किस
प्रकार सरदार की दुनियां में सबसे विशालतम मूर्ति लगाने से गुजरात व देश के किसानों
का भला होगा। यदि ये नहीं कर सकते तो कम से कम इस देश के लोगों से इतनी तो
इमानदारी बरतें और कहें कि सरदार सरोवर की पृष्टभूमि में वह गुजरात में पर्यटन
उद्योग को बढ़ावा देने के लिये यह कदम उठा रहे हैं। मोदी तथा भा.ज.प. दोनों को
समझना चाहिये कि भले ही भावनाओं में बह कर लोग आज उन पर विश्वास कर लें ,पांच साल
बाद नहीं करेंगे। उत्तर प्रदेश के अपने अनुभव से सबक लेना चाहिये। इतिहास तो इस
झूठ के पुलिंदे के लिए उन्हें बिलकुल माफ नही करेगा।
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