सरदार पटेल अचानक ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। मोदी के गुजरात में कारपोरेट जगत की चांदी है। आम आदमी की वहां पर कोई कदर नहीं है। इस बेकदरी को ढ़कने में मोदी ने अभी तक तो अपने हिंदू कार्ड के माध्यम से सफलता पाई है।लेकिन जैसा कि सामाजिक विकास के मापदंडों से साफ हुआ है मोदी राज में आम इंसान के जीवन में किसी भी प्रकार की संपनंता नही आई है। चूंकि हिंदू कार्ड का असर पूरे देश में 2014 तक उतना पुख्ता नही किया जासकता जितना गुजरात में किया है इसलिए सरदार कार्ड खेला जारहा है। पूरे देश के किसानों से मूर्ति बनाने के लिए लोहा देने की अपील की जारही है।
किसान ही
क्यों लोहा दें। कारण पटेल को सरदार की उपाधि बारडोली के किसान सत्याग्रह के बाद
मिली थी। मोदी जो राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ नेताओं को पानी पी पी कर कोस रहे हैं
इमानदारी से बताएं इस आंदोलन में आर एस एस की क्या भूमिका थी। दूसरा बताए किस
प्रकार पिछले 10 साल में गुजरात में किसान की खुशहाली बढ़ी है। तीसरा बताएं किस
प्रकार सरदार की दुनियां में सबसे विशालतम मूर्ति लगाने से गुजरात व देश के किसानों
का भला होगा। यदि ये नहीं कर सकते तो कम से कम इस देश के लोगों से इतनी तो
इमानदारी बरतें और कहें कि सरदार सरोवर की पृष्टभूमि में वह गुजरात में पर्यटन
उद्योग को बढ़ावा देने के लिये यह कदम उठा रहे हैं। मोदी तथा भा.ज.प. दोनों को
समझना चाहिये कि भले ही भावनाओं में बह कर लोग आज उन पर विश्वास कर लें ,पांच साल
बाद नहीं करेंगे। उत्तर प्रदेश के अपने अनुभव से सबक लेना चाहिये। इतिहास तो इस
झूठ के पुलिंदे के लिए उन्हें बिलकुल माफ नही करेगा।
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