आजकल हमारे देश में स्वतंत्रता आंदोलन
में महत्वपूर्ण विभूतियों की भूमिका पर चुनावी भाषणों तीखी टिप्पणी की जारही
हैं।कुछ पर देश के विभाजन तथा देश को अवनति की दिशा में लेजाने का आरोप लगाए जारहे
हैं। लेकिन आरोप लगाने वाले यह नहीं बताते कि जब देश के विभाजन की तथाकथित साजिश
चल रही थी उनके अपने संगठन क्या कर रहे थे। क्या उन्होंने इसे रुकवाने की असफल ही
सही कोई कोशिश की थी। यदि नहीं तो आज चुनाव में फायदे के लिए इतिहास के साथ
खिलवाड़ करने का किसी को क्या अधिकार है।
सरदार
पटेल के उचित संमान नहीं दिये जाने के बारे में भी सवाल उठता है पिछली एनडीए सरकार
ने क्यों नहीं सरदार पटेल को उचित संमान दिलाने के लिए सही कदम उठाए। असल में
चुनाव के समय जनता के मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह शगूफा छो़ड़ा जारहा
है।यहां पर चीन के राष्ट्रीय आंदोलन का जिक्र करना समचीन होगा।चीनी राष्ट्रीय
आंदोलन के एक स्तंभ सुन येतसेन हैं। उनको राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है।
विचारधारा में भिन्नता के बावजूद चीनी कम्युनिष्ट पार्टी ने न तो सुन येत सेन की
राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका पर या उनके इतिहास में स्थान पर सवाल उठाए। उल्टे
भारत में महात्मा गांधी जैसी हस्ती जिनके समाने विश्व की जानीमानी हस्तिया भी समय
समय पर नतमस्तक होती रही हैं उनके जीवनकाल तथा बाद में अनेक प्रकार के अनर्गल आरोप
लगते रहे हैं। ऐसा क्यों है। यदि अपने राष्ट्रीय आंदोलन के पुरोधा देश को गलत
रास्ते पर लेजारहे थे उनकी आज आलोचना करने वाले संगठन तब चुप क्यों थे। असल में
चीनी कम्युनिष्ट पार्टी की एक विचारधारा थी। अपनी विचारधारा के अनुरूप चीन को
गढ़ने के लिए उसने संघर्ष किया। कुरबानियां दी। उसके लिए चुनौती अपनी विचारधारा की
शुद्धता बनाए रखना उसको चीनी परिस्थियों के अनुरूप गढ़ने की चुनौती थी अतः पार्टी
के भीतर ही विचारधारा पर बहस मुबाहिसा होती रहती थी।इसके विपरीत आज के देशभक्तों
को पास अपने भूतकाल के बारे में बताने को कुछ नही है।आज अपनी कमजोरी को छिपाने के
लिए राष्ट्रीय आंदोलनों के स्तंभों पर कीचड़ उछाली जारही है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें