शनिवार, 15 अगस्त 2015

प्रधान सेवक जी यह कैसी सेवा

Iजनसत्ता 14,8,2015
प्रधान सेवक जी यह कैसी सेवा है!!!
१४ अगस्त २०१५ को सुरक्षा के नाम पर  देश की सेवा में अपनी जवानी समर्पित कर अब बुढ़ापे में अपनी जायज़ माँगों को मनवाने के लिए पिछले ६० दिन से धूप,  बारिश , आँधी की परवाह किये बग़ैर जन्तर मन्तर में धरना दे रहे इन पूर्व सैनिकों पर क़हर बरपाया। आपकी पुलिस द्वारा उनकी फाड़ी गई क़मीज़ों से लटक रह उनके पदक आपकी सेवा की कहानी कह रहे थे। आपकी पुलिस की इस करतूत ने हर आम भारतीय को शर्मसार कर दिया। शायद मेरी तरह हर भारतीय उम्मीद लगाए  था कि आप , आज १५ अगस्त को , पूर्व सैनिकों के आहत सम्मान  पर मरहम लगाने के लिए वन रैंक वन पैन्सन को लागू करने की घोषणा कर देंगे।
        सत्ता पाते ही आपने अपने को प्रधान सेवक घोषित किया। सेवा तो कमज़ोर तबक़ों की होती है। जन्तर मन्तर में धरने पर बैठे पूर्व सैनिक ७०साल ८०साल कुछ तो ९० साल से भी ऊपर की आयु के हैं। वे आप से किसी प्रकार की सेवा नहीं माँग रहे हैं बल्कि वे हक़ माँग रहे हैं जो उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के अनुसार उनके हैं। जिन पर संसद ने दो बार अपनी सहमति जताई है । चुनाव जीतने की ख़ातिर जब आपने उनसे न्यायालय के फ़ैसले पर अमल करने का वादा किया था तो सोच समझ कर ही  किया होगा। यह कहना आपको मालूम नहीं था कि मामला जटिल है आपको नहीं सुहाता।यदि आप जटिल समस्या निदान नहीं कर सकते तो ५६ इंच की छाती पर घमण्ड करने का क्या मतलब है?
         वैसे भी क्या ७० साल या इससे अधिक आयु वाले बृद्ध से और इन्तज़ार करने के लिए कहना उसके साथ भद्दा मज़ाक़ नहीं है। आपकी सरकार को कारपोरेट जगत को करोड़ों रुपये की टैक्स रिबेट देने में कोई अड़चन नहीं आती।    बैंकों में नान परफौरमिंग एसैट के बढ़ जाने से सरकारी बैंकों की हालत ख़स्ता होने लगी तो वित्त मंत्री ने १४ अगस्त को ७०हजार करोड रुपये की राहत बैंकों को देने की घोषणा कर दी। बैंकों की इस ख़स्ता हालत के लिए भी बड़े बड़े औद्योगिक घराने ही ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने अपना क़र्ज़ बैंकों को नहीं लौटाया है। आश्चर्य कि किसी भी सरकार को औद्योगिक व ब्यापारिक घरानों को दोनों हाथों से सरकारी धन लुटाने में कोई जटिलता नज़र नहीं आती। पर जब अनाज को सड़ाने के बजाय भूखी जनता को देने का उच्चतम न्यायालय का सुझाव आता है तो हमारे मौनी मनमोहन सिंह तक अदालत पर विफर जाते हैं। आपको पूर्व सैनिकों के परिवारों के वोट लेते समय तो ओआरओपी को लागू करने में जटिलता नहीं दिखी तो अब भी नहीं दिखनी चाहिये।जहाँ तक धन का प्रश्न सरकार अपनी फ़िज़ूलख़र्ची कम करे तो उससे पूर्व सैनिकों के हक़ों की पूर्ति के अलावा इस देश के हर नागरिक की रोटी ,कपड़ा  ,मकान, शिक्षा व स्वास्थ्य की समस्या भी हल हो सकती है । उसके लिए सेवक बनने का दम भरने की ज़रूरत नहीं होती सेवक बनके दिखाना पड़ता है।
               कल रात ndtv के  रवीश कुमार के  रात ९ बजे के प्रोग्राम में एक पूर्व सैनिक की पत्नी ने कहा कि मोदी जी नेपाल के मंदिर के लिए चंदन की आपूर्ति के लिए तीन करोड़ रुपये दे सकते हैं परन्तु हमारी पैंन्सन केलिएउनके पास पैसे नहीं है। यह उस सरकारी ख़र्चे की तरफ़ इशारा था जिस पर सरकार दिल खोल कर दोनों हाथोंसे धन उलीच रही है। हमारे राष्ट्रीय तथा प्रांतीय स्तर के नेता किसी न किसी बहाने से सरकारी धन से विदेशोंकी सैर करते रहते हैं। टाइम्स नाउ  ने कई बार इस तरह की विदेशी यात्राओं की बेवाक भाषा में पोल खोली । पर सरकारी तंत्र को शायद ही कोई असर पड़ा हो। संक्षेप में यह प्रश्न जटिलताओं का नहीं है। यह प्रश्न प्रार्थमिकता का है।

शनिवार, 6 जून 2015

और नन्हे भालू ने लकड़ी का घर नहीं बनाया !!!



और नन्हे भालू ने लकड़ी का घर नहीं बनाया !!!

(कल विश्व पर्यावरण दिवस था। डीजल चलित गाड़ियों में सवार होकर एयर कंडीसंड कमरों  में बैठकर विगड़ते पर्यावरण पर विशेषज्ञों ने खूब माथापच्ची की।वह सब देख सुन कर मुझे चीनी भाषा में बच्चों की यह कहानी याद आगई।)

चीन की एक पहाड़ी गुफा में भालू का एक बड़ा परिवार रहता था। परिवार में दादा, दादी, अम्मा, बाबा के साथ साथ छोटे बच्चे भी रहते थे। इतने सारे प्राणियों के लिए गुफा छोटी पड़ती थी। इसलिए दादा भालू ने नन्हे पोते भालू को सुझाव दिया कि वह पास के जंगल से लकड़ी काट कर एक लकड़ी का घर बनाए।

नन्हा भालू बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ही घर बनाने के लिए लकड़ी काटने पास के घने जंगल में घुसा। जंगल में गजब की हरियाली छाई थी। वहां के सारे पेड़ हरे हरे पत्तों से अपना श्रंगार किये थे। नन्हे भालू को यह हरियाली इतनी भाई कि इन सजे धजे सुंदर हरे हरे पेड़ो को को काट कर अपना घर बनाना उसे अच्छा नही लगा। और वह खाली हाथ गुफा लौट आया। बसन्त के बाद ग्रीष्म ऋतु आई। नन्हा भालू फिर जंगल में पेड़ काटने गया। लेकिन जंगल के सारे पेड़ रंग बिरंगी फूलों की चादर ओढ़े थे। सारा जंगल उन फूलों की खुशबू से महक रहा था। नन्हा भालू इस रंग में भंग नही करना चाहता था। रंग बिरंगी फूलों से लदे पेड़ों को काटना उसको अच्छा नहीं लगा। बसन्त ऋतु की भांति ही इस बार भी वह खाली हाथ वापस गुफा में आगया। फिर आई हेमन्त ऋतु।नन्हा भालू फिर पेड़ काटने जंगल गया। इस बार जंगल के सारे पेड़ फलों से लदे थे। नन्हे भालू को लगा कि फलों से लदे पेड़ो को नहीं काटना चाहिये। एक बार फिर वह अपना सा मुह लेकर अपनी गुफा में खाली हाथ लौट आया। हेमन्त के बाद शिशिर ऋतु आई।नन्हे भालू को लगा घर बनाने का यह सबसे उत्तम समय है।वह जंगल की ओर चल पड़ा। इस बार जंगल में किसम किसम की चिड़ियों की चहचआहट गूज रही थी। हर पेड़ की डाल से उनके घोंसले लटक रहे थे। नन्हा भालू अपने एक घर के लिए इतनी चिड़ियों को कैसे बेघर कर सकता था। इसलिए बिना पेड़ काटे बह अपनी गुफा में वापस आगया। इस प्रकार साल दर साल गुजरते गए। नन्हे भालू को कोई भी ऐसा मौसम नहीं मिला जब किसी को हानि पहुचाए बिना वह पेड़ काटकर अपना घर बना सकता था। इसलिए वह खुशी खुशी अपनी पत्थर की गुफा में ही अपने बड़े परिवार के साथ रहने लगा। नन्हे भालू की इस जिओ और जीन दो की नीति का उस जंगल में रह रहे सभी जीव जन्तओँ ने स्वागत किया । उन्होंने नन्हे भालू का आभार जताने के लिए उसे ताजे फूलों का एक गुलदस्ता भैंट किया ।

गुरुवार, 7 मई 2015

महिला आयोग की महिला अधिकारों की समझ
दिल्ली महिला आयोग ने विरोधी दल की एक कार्यकर्ता की शिकायत पर फटाफट अमल करते हुए उसी दल को राष्ट्रीय स्तर के नेता को अपने दफ्तर में बुलाया। कार्यकर्ता चाहती है कि ये नेता महोदय तथाकथित का पति उन पर विश्वास कर फिर से महिला को अपना लें।यह प्रस्ताव ही महिला आंदोलन की जड़ों में मटठा डालता है और महिला को क्रमशः उसके पिता, भाई, पति व पुत्र की संपत्ति की भूमिका में पेश करता है। समूचे विश्व के देशों में महिला अधिकार का मूल मंत्र महिला का उसके स्वयं के शरीर, दिल व दिमाग पर पूर्ण नियंत्रण रहा है। उसे अपने संबंधों के बारे में न तो किसी से इजाजत लेने की आवश्यकता होनी चाहिये न किसी के सर्टिफिकेट की। ऐसे में भा.ज.पा. महिला शाखा का उस कार्यकर्ता की मांग के समर्थन में केजरीवाल के घर प्रदर्शन पूरे महिला आंदोलन की तौहीन है। लेकिन महिला आयोग तो एक संवैधानिक संस्था है। देश की राजधानी में धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल श्रुद्र राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जाना या महिला समानता विरोधी कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए किया जाना महिला आयोग के विधान का उल्लंघन है। क्या इसके विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होना चाहिये।

बुधवार, 6 मई 2015

धनकड़ जी इन महिलाओं के लिए आपके पास कोई योजना है

धनकड़ जी इन महिलाओं के लिए आपके पास कोई योजना है
हरियाणा के कृषि मंत्री आत्महत्या करने वाले किसानों की पत्नियों के लिए घड़ियाली आंसू बहा रहे थे। दिसंबर 2014 को पी. साइनाथ ने किसान मजदूरनियों की दयनीय  स्थिति का वर्णन किया और उनकी हालत सुधारने के लिए कुछ सुझाव दिये।धनकड़ जी व उनकी पार्टी उन सुझावों पर अमल करने के बारे में क्या सोच रही है यह जानना अत्यतं आवश्यक है।
साइनाथ लिखते हैं कि ओडिसा के रायगड़ का वह जमींदार बहुत प्रसन्न था। उसकी फोटो जो खींची जारही थी। वह अपने खेत में सीधा तन कर खड़ा था। पास ही 9 महिला मजदूर दोहरी झुक कर उसके खेत में धान की रोपाई कर रही थी। उसने बताया कि वह उन महिला मजदूरों को रोज 40 रुपये 82 पैसे मजदूरी देता था। बाद में महिलाओं ने बताया कि उनको केवल 25 रुपया 51 पैसा दिया गया था। ये ओडिसा के रायगड़ की खेतीहर मजदूरनियों की व्यथा थी।
भारत में जमींदार परिवारों की महिलाओं को भी पिता या पति के घर भूस्वामित्व का अधिकार नहीं होता। परित्यक्त, विधवा अथवा तलाकशुदा महिला को भी पेट पालने के लिए रिस्तेदारों के खेतों में मजदूरी करनी होती है। सरकारी आंकड़ो के अनुसार भारत में कुल 6करोड़ 30लाख महिला मजदूर हैं।इनमें से 2 करोड़ 80लाख  यानी 45 प्रतिशत खेतीहर मजदूर हैं। यह आकड़ा भी गलत है।इसमें वे मजदूर सम्मिलित नहीं हैं जो साल में 6 महिने या उससे अधिक रोजगार नहीं पाते। यह बहुत बड़ी चूक है।इसकी वजह से लाखों महिलाएं मजदूरनियों की श्रेणी में नहीं आती। इस प्रकार उनका राष्ट्र की अर्थब्यवस्था में योगदान अदृश्य ही रह जाता है। प्रत्यक्ष कृषि कार्य के अलावा जो भी काम ग्रामीण महिलाएं करती हैं उसको घरेलू काम कह कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सरकार द्वारा मान्य आर्थिक गतिविधि में भी कृषि कार्य ही महिलाओं के लिए सबसे बड़ा रोजगार की सुविधा है। इस आर्थिक गतिविधि में भी मामूली मजदूरी वाली खेती मजदूरी ही गरीब महिलाओं के लिए उपलब्ध  होती है। उदारीकरण के इस दौर में इस मामुली मजदूरी की उपलब्धता के दिन भी कम होते जारहे हैं। सरकारी आर्थिक नीतियां,मशीनीकरण, नकदी फसल.ठेकेदीरी प्रथा इसके लिए जिम्मेदार हैं।
आंध्र प्रदेश के अनन्तपुर गांव में केवल कीड़े मकोड़े पकड़ने का काम महिलाओं को उपलब्ध है। फोटो में दो लड़कियां लाल बालों वाली Caterpillars पकड़ रही हैं। जमींदार इनको एक किलो Caterpillars(यानी एक हजार से अधिक) पकड़ने के इनको 10रुपये 20 पैसे देता है। संसाधनों पर नियंत्रण (यानि मिल्कियत)नहीं होने से गरीबों खास कर महिलाओं की स्थिति काफी कमजोर हो जाती है।संपत्ति की मिल्कियत के साथ ही सामाजिक status भी जुड़ा है। बहुत थोड़ी महिलाएं जमीन की मालिक होती हैं। पंचायतीराज में उनकी भागीदारी तभी प्रभावशाली होगी जब वे जमीन की मालिक होंगी।        खेतीहर मजदूरों में दलितों की संख्या सर्वाधिक है। करीब 67 प्रतिशत खेतीहर मजदूरनियां दलित हैं। इनका तिहरा जाति आधरित, वर्ग आधरित व लिंग आधारित शोषण होता है। भूमि का अधिकार गरीब व निम्न कही जाने वाली जातियों की महिलाओं सामाजिक स्थिति सुदृड़ बनाएगा। अपनी जमीन होने पर यदि उन्हें दूसरों के खेतों में काम करना भी पड़ेगा तो अपनी मजदूरी के लिए मोल भाव कर सकती हैं। आवसश्यकता पड़ने पर न्यायिक शर्तों पर ऋण लेना भी संभव होगा।
इससे उनकी तथा उनके परिवारों की गरीबी दूर होगी। पुरुष अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा स्वयं पर खर्च करते हैं । जबकि महिलाएं अपनी पूरी आय परिवार पर खर्च करती हैं। महिलाओं की आय बढ़ने से बच्चों की स्थिति भी सुधरेगी। वास्तव में भारत में गरीबी की समस्या सुलझाने के लिए महिलाओं की भूमि का अधिकार मिलना चाहिये। पश्चिमी बंगाल में 400,000 परिवारों को भूमि का पट्टा संयुक्त नाम पर देकर एक पहल की है। परन्तु अभी काफी सम्बा रास्ता तय करना है।  चूंकि महिलाओं को हल चलाने की आजादी नहीं हैं इसलिए जमीन जोतने वाले की के नारे के बदले नया नारा जमीन उस पर काम करने वाले की होना चाहिये।