शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

संवेदना की सीमाएं




आम आदमी पार्टी ने अपनी जीत का जश्न क्रांतिकारी गीत गा कर किया न कि फटाकों की लड़िया फोड़कर। कारण पार्टी पर्यावरण प्रदूषण के बारे में सचेत थी। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी को गुजरात की एक अदालत से गुजरात मामलों में मिली फौरी राहत का जश्न भा.ज.पा. ने फटाकों की लड़ियां फोड़कर ही मनाया। साफ है पार्टी के लोग अपनी खुशी के ज्वार को पर्यावरण की संवेदना से नियंत्रित नहीं करना चाहते थे।पर्यावरण प्रदूषण के अलावा फटाकेबाजी समस्त प्राणीजगत को आतंकित करती है। दिवाली की रात हम देखते है कि पक्षी आतंकित होकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उड़ते रहते हैं। पर समाज के कर्णधार धनी संभ्रांत अपने मद में चूर लोगों के फर्क नहीं पड़ता।वे फटाके फोड़ते ही रहते हैं।
महिला संबंधी प्रश्न आज की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण होगए हैं। कल यानि 26,12,13,को जब अलका लांबा का काग्रेस छोड़कर आप में जाने का समाचार टीवी चैनलों में उछला तो एक चैनल को फोन पर अलका जी ने बताया कि शीला दीक्षित ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया। लेकिन इन पूरे 15 सालों में उनकी यह महिला संबंधी संवेदना नहीं जागी। अब आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित जीत तथा कांग्रेस पार्टी की अप्रत्याशित हार से उनकी जैंडर संबंधी चेतना तथा संवेदना कुलांचे मारने लग गई है।इससे पहले वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्षा, महिला कांग्रेस में महासचिव भी रह चुकी हैं। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने स्वयं महिलाओं के लिए क्य़ा किया यह बताने की जरूरत उन्होंने नही समझी।
उत्तर प्रदेश में राम मंदिर का मुद्दा गरमाने में असफल संघ परिवार ने बहू बेटी बचाओ के मुद्दे को हथियार बनाकर संप्रदायों के ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई है। ताकि 2014 तक वह अपना खोया आधार वापस पा सके।अब जब मीडिया में राहत शिविरों में रह रहे लोग अपनी बहू बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार का आरोप लगा रहे हैं तो भाजप चुप है। उधर गुजरात में पटेल वोटों की खातिर सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने का कार्यक्रम बनाया गया है और पूरे देश में एकता अखंडता के लिए दौड़ का आयोजन किया गया। बिहार में नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान बम विस्फोट में मारे गए लोगों के घर मोदी व अंय भाजप नेता पहुचते हैं मुआवजा  दिया जाता है, अस्थि कलस प्रदेष में जगह जगह घुमाए जाते हैं, ताकि भावनाएं भड़काई जासकें।परंतु मुजफ्फर नगर दंगों में मारे गए लोगों के साथ कोई भी सहानुभूति नहीं दर्शाई जाती है। कैंपों में जो बच्चे बीमारी तथा ठंड से मर रहे हैं उससे भी पार्टी को कोई सरोकार नहीं लगता। कैंपों में सामूहिक बलात्कार पीड़ितों का दर्द भी इनकी संवेदनाओं को नहीं झकझोरता। यह पेच खाली हिंदू मुसलमान का नहीं लगता। महिला संबंधी प्रश्न खालिस राजनीतिक फायदे नुकसान को देखते हुए उठाए जाते हैं।
भाजप हो या संघ परिवार इसमें महिला अधिकार की कोई अवधारणा नहीं है।यदि होती तो सबसे पहले पार्टी के अपने प्रधान मंत्री पद के उमीदवार से अपने घर की महिला जशोदाबेन चिमनलाल मोदी(देखियेhttp://www.openthemagazine.com/article/nation/i-am-narendra-modi-s-wife)के साथ न्याय करने उसको उसके कानून सम्मत अधिकार,उसका उचित दर्जा देने की शर्त रखते। जो सख्श अपने घर की महिला के साथ न्याय नहीं कर सकता उससे इस देश की औरतें क्या उमीद रख सकती हैं, संघ परिवार की औरतें भी क्या उमीद रख सकती हैं। जिस दिन उनके हित संघ परिवार के पुरुषों के हितों के आड़े आएगे प्राथमिकता तो पुरुषों के हितों को ही मिलेगी। यदि सुषमा स्वराज जैसी अनुशासित व कद्दावर नेता ने नेतृत्व की दौड़ में धकियाए जाने में चुप रहने में ही खैरियत समझी तो और संघ परिवार की महिलाओं से संघ परिवार के संगठनों के भीतर महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने की क्या अपेक्षा की जासकती है। जब आशाराम तथा उसके बेटे के यौन अपराधों के मामले सामने आए तो उमा भरती उनके समर्थन में आगई। इससे पहले उमा भरती ने जब तत्कालीन मुख्य मंत्री दिगविजय के विरुद्ध मध्य प्रदेश के चुनावी मोर्चा खोला था तब भी मध्य प्रदेश में यौन हिंसा, महिलाओं की असुरक्षा को मुद्दा बनाया था। लेकिन दस साल सत्ता में रहने के बावजूद राज्य में यौन अपराध नही घटे। तस्करी संबंधी अपराध तो बढ़े ही है। इस चुनाव में यह मुद्दा ही नही था।यह चुनाव दस साल के काम पर लड़ा गया। उमा भारती को इसका कोई गम नही दिखा।
इस प्रकार जैन्डर संबंधी सवाल या तो भावनाएं भड़काने के लिए (बहू,बेटी बचाओ) या पोलिटिकल माइलेज लेने के लिए ही उठाए जाते हैं। आश्चर्य की बात यह भी है कि कई तेज तर्रार महिला प्रवक्ता होने के बावजूद भाजप संगठन के अंदर महिला संबंधी सवालों पर भारत समेत पूरे विश्व में होरहे महिला अधिकार विमर्श को अपनाने के लिए कोई दबाव बनता नहीं दिखता। जबकि विंदा करात जैसे नेता अपने पार्टी के भीतर महिलाओं की समानता, स्वतंत्रता के लिए सतत प्रयास करते नजर आती है। जरुरत पड़ने पर संगठन के भीतर की पितृसत्ता से दो दो हाथ भी करती है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान एनी बेसेंन्ट और सरोजिनी नाइडू जैसी जुझारु महिलाओं ने 1916 से ही महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठानी प्रारंभ कर दी थी। इस आंदोलन के हर चरण में चाहे साइमन कमीशन का बहिष्कार हो, या गोलमेज सम्मेलन हो या हिंदू कोड बिल के लिए वातावरण बनाने के लिए उठाए गए कदम हों या संविधान सभा में महिला अधिकारों पर चर्चा हो तत्कालीन महिला नेतृत्व महिला संबंधी मुद्दे उठा रहे थे न कि संगठन के भीतर हावी पितृसत्ता के समर्थन में संगठन के सुर में सुर मिला रहे थे।संघ परिवार खासकर भाजप की महिलाओं में महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता के सवालों पर व्याप्त (अ)संवेदना शायद अज्ञान भी चिंता का विषय है। जिस प्रकार चाहे सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट हो या कोई और प्रबुद्ध महिला पार्टी प्रवक्ता हो वे सब एक ही सुर में गुजरात सरकार द्वारा की गई एक महिला की जासूसी को उसके पिता के कहने पर की गई है कह कर सही ठहराती है वह महिलाओं के समान अधिकारों की अवधारणा पर ही कुठाराघात है। जबकि इस घटना को मुद्दा बनाकर उनको अपने संगठन के भीतर महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता के अधिकारों की स्वीकृति के लिए दबाव बनाना चाहिये था। ऐसा नही कर वे देश की महिलाओं के हितों के साथ साथ अपने राजनीतिक भविष्य को भी नुकसान पहुचा रही हैं।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

जनभागीदारी की देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए बहुत अहमियत है।



जब कांग्रेस ने आप पार्टी की शर्तों को मान लिया तो आप पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के समर्थन की चिट्ठी लेकर दिल्ली की जनता के पास जाने का एलान किया।मीडिया को बताया कि जनता की राय लेने के बाद ही सरकार बनाने या न बनाने का निर्णय करेंगे। इसका स्वागत होने के बजाय आप के विरोधी राजनीतिक दलों के साथ साथ टी वी एंकर, विशेषज्ञ तथा अंय मीडिया के  लोग भी इसको आप पार्टी का टालू रवैया या सरकार न बनाने के लिए बहाने बनाने जैसे तर्क दे रहे थे। सीधे सीधे कहा जारहा था जब चुनाव में जीत कर आए हो तो राज करो।रोजमर्रा के शासन प्रशासन में जन भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है इसको पहचाने बिना आप पार्टी पर तंज किया जारहा था। शायद किसी को यह एहसास नहीं था कि सरकार पर ही नहीं समाज के विध्वंसक तत्वों पर नियंत्रण रखने के लिए जनभागीदारी आवश्यक है। यदि आमजन अपनी जिंदगी, अपना पर्यावरण, अपने संसाधनों के प्रबंधन आदि में सक्रिय न हो तो वह आसानी से देशी विदेशी स्वार्थी तत्वों के हाथों कठपुतली बन जाता है और पड़ोसी ही पड़ोसी के खून का प्यासा बन जाता है। आपस में बटा भारत कमजोर ही होगा। विदेशी ताकतों को यही चाहये। जैसे 1980-90 के दशक में अफगानिस्तान में वे स्थानीय स्वार्थी तत्वों को पैसे के बल पर खरीद रहे थे क्यों नही भारत में वे ऐसा नहीं करते होंगे। यहां पर स्टीव कौल की पुस्तक घोस्ट वार्स पेंग्विन 2004 अपने समय की न्यू यार्क टाइम्स की बैस्ट सैलर पुस्तक का जिक्र करना आवश्यक है।
 जाने माने पत्रकार,तथा पुलिट्जर पुरस्कार से नवाजे गए स्टीव काल ने 9,11,2001 घटना की पृष्टभूमि का खुलासा करने के लिए ही शायद घोस्ट वार्स नामक जो पुस्तक लिखी है। इस किताब में स्टीव काल ने सरकारी दस्तावेजों की सहायता से बड़े ही सटीक तरीके से बताया है कि किस प्रकार नवंबर 1979 से नवंबर 2001 तक विभिन्न देशों के गुप्तचर संस्थाए अपने अपने देशों के पूंजीपतियों के हित साधने के लिए अफगानिस्तान  में ही नहीं अंय देशों में भी हिंसा तोड़ फोड़ करा रही थी। इसी दौरान सोवियत संघ के विघटन की नींव भी डाल दी गई।इसमें बताया गया है कि किस प्रकार इन गुप्तचर संस्थाओं द्वारा स्थानीय स्वार्थी तत्वों को अपने पाले में लाने के लिए धन पानी की तरह बहाया जारहा था। किस प्रकार भ्रष्ट राजनीतिक, प्रशासनिक तंत्र इस धन से अपना हित साध रहा था तथा धार्मिक उंमाद और घृणा फैला कर आम गरीब जनों को एक दूसरे का हलाल करने को प्रेरित कर रहा था। इस हिंसा के लिये हथियार भी यही गुप्तचर संस्थाएं मुफ्त में दे रही थी। पेज 238 में स्टीव कौल बताते हैं कि 1992 में अफगानिस्तानवासियों के पास जो निजी हथियार थे उनकी संख्या उस समय के भारतवासियों तथा पाकिस्तानवासियों के पास के निजी हथियारों के कुल  योग से अधिक थे। 80 के दशक में अफगानिस्तान में दुनियां के किसी भी देश में भेजे गए हथियारों से अधिक हथियार भेजे गए थे।
      हमारे देश में भी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रवाद के नाम पर विभिन्न समूह हिंसा,घृणा, वैमनश्य फैलाते रहे हैं। लोगों को आपस में लड़ाते रहे हैं। अभी मुजफ्फरनगर में हजारों लोग कड़कड़ाती ठंड में धार्मिक हिंसा के डर के मारे राहत शिविरों में रहने को मजबूर है। क्या यह हिंसा महज सत्ता पाने के लिए वोटों का धुर्वीकरण करने लिए थी या इसके पीछे कोई विदेशी हाथ है? खालिस्तान आंदोलन की विदेशी जड़ों पर अक्सर चर्चा होती थी। परन्तु क्या इंद्रिरा गांधी की हत्या व उसके बाद सिक्खों के विरुद्ध जो हिंसा हुई वह केवल उंमाद था या उसके पीछे कोई विदेशी साजिश थी? इस पुस्तक को पढ़ने के बाद यही शंका बाबरी मस्जिद ध्वंस, गोधरा व गोधरा के बाद की हिंसा, समझौता एक्सप्रेस,और मालेगांव के विस्फोटों के बारे में भी उपजती है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बम विस्फोटों की बाढ़ सी आगई है। उनके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जाता है। समझौता एक्सप्रेस व मालेगांव की हिंसा के पीछे भी विदेशी हाथ है।
  1970 के दशक में सत्ता पाने के बाद श्रीमती इंद्रिरा गांधी हर अप्रिय घटना के लिए विदेशी हाथ को जिम्मेदार ठहराती थी।विपक्ष अक्सर उनका उपहास करता था कि अपनी गल्ती मानने और सुधारने के बजाय सारा ठीकरा विदेशी हाथ के सिर फोड़ दिया जाता था। स्टीव कौल इस किताब में हम तीसरी दुनियां के वासियों के लिए विदेशी हाथ का एक नया ही आयाम खोलते हैं। इस किताब में बताया गया है किस प्रकार गुप्तचर संस्थाएं पैसा पानी की तरह बहा रही थी। और यह पैसा तथा हथियार व विस्फोटक स्थानीय स्वार्थी तत्वों को बड़ी उदारता से दिया जारहा था।और ये स्वार्थी तत्व धार्मिक वैमनष्य फैला कर गरीब गुरबों को धर्म के नाम पर अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए लड़ने के लिए उकसा रहे थे। जहां स्वार्थी तत्व अपनी धन संपत्ति बढ़ा रहे थे तो गरीब या भूखे मर रहे थे या धर्म के नाम पर कुरबानियां दे रहे थे। हमारे यहां भी घृणा, वैमनश्य फैलाने वाले, हिंसा का आह्वान करने वाले तो सरकारी सुरक्षा में, पांच सितारा की सुविधाओं में अपनी राजनीति करते हैं। मरता आम आदमी है।कांचा इलैया ने एक लेख में लिखा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपों में जेलों में बंद अधिकतर लोग तथा कथित निम्न जातियों के थे। अंय हिंसक घटनाएं भी काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कोई अपवाद नहीं है।दुर्भाग्य से हमारे यहां स्टीव कौल जैसे खोजी लेखक नही मिलते। शायद यहां लेखकों के पास उतने साधन भी नही होते।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

मांओं तथा बहिनों का कवच




नारी के रूप अनेक और हर रूप में वह पुरुष की ही सेवा सुश्रुषा करती है। नरेंद्र मोदी कोई अपवाद नहीं है।अभी पांच राज्यों में चुनावों के दौरान जब सुरक्षा के नाम पर एक महिला की जासूसी करवाने का आरोप मोदी पर लगा तो मोदी ने अपने एक भाषण में खुद पर खतरा बताया साथ ही मांओं तथा बहिनों के कवच के संरक्षण में खुद को सुरक्षित बताया। इससे पहले जब गुजराती महिलाओं और लड़कियों के कुपोषण का मुद्दा उछला तो मोदी साहब ने फरमाया कि पतला दिखने के चक्कर में महिलाएं और लड़कियां दूध नही पीती। में इसी दौरान एक टी वी चैनल पर मल्लिका सारभाई ने बताया कि मोदी ने गुजरात की महिलाओं को आश्वासन दिया था कि उनको अपनी सुरक्षा कि चिंता करने की जरुरत नहीं है कारण उनका भाई पूरी रात जागकर उनकी रक्षा करता है। लेकिन जब 600 किसानियों जिनके पतियों ने आत्महत्या करली थी मोदी से मदद की गुहार की तो मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया। यही व्यवहार उन 150 महिलाओँ के साथ किया गया था जिनके पति जहरीली शराब पी कर मर गये थे। ऐसा लगता है मोदी माओं बहिनों से केवल लेना जानते हैं देना  नहीं। राष्ट्रीय स्तर पर भी सुषमा स्वराज सीनियरिटी के हिसाब से प्रधान मंत्री पद की सबसे मजबूत दावेदार थी। पर मोदी उनको धकिया कर खुद को आगे बढ़ा दिया। उन्होंने नही कहा कि अपनी बहिन को जिताने के लिए काम करेंगे अपने लिए नहीं। यहां तक तो फिर भी ठीक ही था। आखिर राजनीति में यह तो चलता ही है।
      लेकिन हद तो तब होगई जब मोदी ने जम्मू में अपने समर्थन में हवा बनाने के लिए काश्मीरी महिलाओं के समान अधिकारों को सवाल उठा दिया और उदाहरण काश्मीर के मुख्य मंत्री की बहिन का दिया गया। अधिकार तो गुजराती महिलाओं के खास कर उनकी स्वयं की पत्नी के भी हैं।क्या जशोदाबेन चिमनलाल मोदी(देखियेhttp://www.openthemagazine.com/article/nation/i-am-narendra-modi-s-wife) के कोई अधिकार नहीं है।  वह भी किसी की बेटी है। शादी के बाद उसके भी तो अधिकार बनते हैं। और यदि वह स्वंय ऐसे अत्याचार करते हैं तो औरों को किस मुह से रोकेंगे।