आम आदमी पार्टी ने अपनी जीत का जश्न
क्रांतिकारी गीत गा कर किया न कि फटाकों की लड़िया फोड़कर। कारण पार्टी पर्यावरण
प्रदूषण के बारे में सचेत थी। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी को गुजरात की एक अदालत से
गुजरात मामलों में मिली फौरी राहत का जश्न भा.ज.पा. ने फटाकों की लड़ियां फोड़कर
ही मनाया। साफ है पार्टी के लोग अपनी खुशी के ज्वार को पर्यावरण की संवेदना से
नियंत्रित नहीं करना चाहते थे।पर्यावरण प्रदूषण के अलावा फटाकेबाजी समस्त
प्राणीजगत को आतंकित करती है। दिवाली की रात हम देखते है कि पक्षी आतंकित होकर एक
पेड़ से दूसरे पेड़ पर उड़ते रहते हैं। पर समाज के कर्णधार धनी संभ्रांत अपने मद
में चूर लोगों के फर्क नहीं पड़ता।वे फटाके फोड़ते ही रहते हैं।
महिला
संबंधी प्रश्न आज की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण होगए हैं। कल यानि 26,12,13,को
जब अलका लांबा का काग्रेस छोड़कर आप में जाने का समाचार टीवी चैनलों में उछला तो
एक चैनल को फोन पर अलका जी ने बताया कि शीला दीक्षित ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल
में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया। लेकिन इन पूरे 15 सालों में
उनकी यह महिला संबंधी संवेदना नहीं जागी। अब आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित जीत
तथा कांग्रेस पार्टी की अप्रत्याशित हार से उनकी जैंडर संबंधी चेतना तथा संवेदना
कुलांचे मारने लग गई है।इससे पहले वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्षा,
महिला कांग्रेस में महासचिव भी रह चुकी हैं। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने स्वयं
महिलाओं के लिए क्य़ा किया यह बताने की जरूरत उन्होंने नही समझी।
उत्तर
प्रदेश में राम मंदिर का मुद्दा गरमाने में असफल संघ परिवार ने बहू बेटी बचाओ के
मुद्दे को हथियार बनाकर संप्रदायों के ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई है। ताकि 2014 तक
वह अपना खोया आधार वापस पा सके।अब जब मीडिया में राहत शिविरों में रह रहे लोग अपनी
बहू बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार का आरोप लगा रहे हैं तो भाजप चुप है। उधर
गुजरात में पटेल वोटों की खातिर सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने का कार्यक्रम बनाया
गया है और पूरे देश में एकता अखंडता के लिए दौड़ का आयोजन किया गया। बिहार में
नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान बम विस्फोट में मारे गए लोगों के घर मोदी व अंय
भाजप नेता पहुचते हैं मुआवजा दिया जाता
है, अस्थि कलस प्रदेष में जगह जगह घुमाए जाते हैं, ताकि भावनाएं भड़काई जासकें।परंतु
मुजफ्फर नगर दंगों में मारे गए लोगों के साथ कोई भी सहानुभूति नहीं दर्शाई जाती
है। कैंपों में जो बच्चे बीमारी तथा ठंड से मर रहे हैं उससे भी पार्टी को कोई
सरोकार नहीं लगता। कैंपों में सामूहिक बलात्कार पीड़ितों का दर्द भी इनकी
संवेदनाओं को नहीं झकझोरता। यह पेच खाली हिंदू मुसलमान का नहीं लगता। महिला संबंधी
प्रश्न खालिस राजनीतिक फायदे नुकसान को देखते हुए उठाए जाते हैं।
भाजप हो या
संघ परिवार इसमें महिला अधिकार की कोई अवधारणा नहीं है।यदि होती तो सबसे पहले
पार्टी के अपने प्रधान मंत्री पद के उमीदवार से अपने घर की महिला जशोदाबेन चिमनलाल
मोदी(देखियेhttp://www.openthemagazine.com/article/nation/i-am-narendra-modi-s-wife)के साथ न्याय करने उसको उसके कानून सम्मत अधिकार,उसका उचित
दर्जा देने की शर्त रखते। जो सख्श अपने घर की महिला के साथ न्याय नहीं कर सकता
उससे इस देश की औरतें क्या उमीद रख सकती हैं, संघ परिवार की औरतें भी क्या उमीद रख
सकती हैं। जिस दिन उनके हित संघ परिवार के पुरुषों के हितों के आड़े आएगे
प्राथमिकता तो पुरुषों के हितों को ही मिलेगी। यदि सुषमा स्वराज जैसी अनुशासित व
कद्दावर नेता ने नेतृत्व की दौड़ में धकियाए जाने में चुप रहने में ही खैरियत समझी
तो और संघ परिवार की महिलाओं से संघ परिवार के संगठनों के भीतर महिला अधिकारों के
लिए संघर्ष करने की क्या अपेक्षा की जासकती है। जब आशाराम तथा उसके बेटे के यौन
अपराधों के मामले सामने आए तो उमा भरती उनके समर्थन में आगई। इससे पहले उमा भरती
ने जब तत्कालीन मुख्य मंत्री दिगविजय के विरुद्ध मध्य प्रदेश के चुनावी मोर्चा
खोला था तब भी मध्य प्रदेश में यौन हिंसा, महिलाओं की असुरक्षा को मुद्दा बनाया
था। लेकिन दस साल सत्ता में रहने के बावजूद राज्य में यौन अपराध नही घटे। तस्करी
संबंधी अपराध तो बढ़े ही है। इस चुनाव में यह मुद्दा ही नही था।यह चुनाव दस साल के
काम पर लड़ा गया। उमा भारती को इसका कोई गम नही दिखा।
इस प्रकार
जैन्डर संबंधी सवाल या तो भावनाएं भड़काने के लिए (बहू,बेटी बचाओ) या पोलिटिकल
माइलेज लेने के लिए ही उठाए जाते हैं। आश्चर्य की बात यह भी है कि कई तेज तर्रार
महिला प्रवक्ता होने के बावजूद भाजप संगठन के अंदर महिला संबंधी सवालों पर भारत
समेत पूरे विश्व में होरहे महिला अधिकार विमर्श को अपनाने के लिए कोई दबाव बनता
नहीं दिखता। जबकि विंदा करात जैसे नेता अपने पार्टी के भीतर महिलाओं की समानता,
स्वतंत्रता के लिए सतत प्रयास करते नजर आती है। जरुरत पड़ने पर संगठन के भीतर की
पितृसत्ता से दो दो हाथ भी करती है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान एनी बेसेंन्ट और
सरोजिनी नाइडू जैसी जुझारु महिलाओं ने 1916 से ही महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज
उठानी प्रारंभ कर दी थी। इस आंदोलन के हर चरण में चाहे साइमन कमीशन का बहिष्कार
हो, या गोलमेज सम्मेलन हो या हिंदू कोड बिल के लिए वातावरण बनाने के लिए उठाए गए
कदम हों या संविधान सभा में महिला अधिकारों पर चर्चा हो तत्कालीन महिला नेतृत्व
महिला संबंधी मुद्दे उठा रहे थे न कि संगठन के भीतर हावी पितृसत्ता के समर्थन में
संगठन के सुर में सुर मिला रहे थे।संघ परिवार खासकर भाजप की महिलाओं में महिलाओं
की स्वतंत्रता, समानता के सवालों पर व्याप्त (अ)संवेदना शायद अज्ञान भी चिंता का
विषय है। जिस प्रकार चाहे सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट हो या कोई और प्रबुद्ध महिला
पार्टी प्रवक्ता हो वे सब एक ही सुर में गुजरात सरकार द्वारा की गई एक महिला की
जासूसी को उसके पिता के कहने पर की गई है कह कर सही ठहराती है वह महिलाओं के समान
अधिकारों की अवधारणा पर ही कुठाराघात है। जबकि इस घटना को मुद्दा बनाकर उनको अपने
संगठन के भीतर महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता के अधिकारों की स्वीकृति के
लिए दबाव बनाना चाहिये था। ऐसा नही कर वे देश की महिलाओं के हितों के साथ साथ अपने
राजनीतिक भविष्य को भी नुकसान पहुचा रही हैं।
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