जब कांग्रेस ने आप पार्टी की शर्तों को
मान लिया तो आप पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के समर्थन की चिट्ठी लेकर दिल्ली की जनता
के पास जाने का एलान किया।मीडिया को बताया कि जनता की राय लेने के बाद ही सरकार
बनाने या न बनाने का निर्णय करेंगे। इसका स्वागत होने के बजाय आप के विरोधी
राजनीतिक दलों के साथ साथ टी वी एंकर, विशेषज्ञ तथा अंय मीडिया के लोग भी इसको आप पार्टी का टालू रवैया या सरकार
न बनाने के लिए बहाने बनाने जैसे तर्क दे रहे थे। सीधे सीधे कहा जारहा था जब चुनाव
में जीत कर आए हो तो राज करो।रोजमर्रा के शासन प्रशासन में जन भागीदारी कितनी
महत्वपूर्ण है इसको पहचाने बिना आप पार्टी पर तंज किया जारहा था। शायद किसी को यह
एहसास नहीं था कि सरकार पर ही नहीं समाज के विध्वंसक तत्वों पर नियंत्रण रखने के
लिए जनभागीदारी आवश्यक है। यदि आमजन अपनी जिंदगी, अपना पर्यावरण, अपने संसाधनों के
प्रबंधन आदि में सक्रिय न हो तो वह आसानी से देशी विदेशी स्वार्थी तत्वों के हाथों
कठपुतली बन जाता है और पड़ोसी ही पड़ोसी के खून का प्यासा बन जाता है। आपस में बटा
भारत कमजोर ही होगा। विदेशी ताकतों को यही चाहये। जैसे 1980-90 के दशक में अफगानिस्तान
में वे स्थानीय स्वार्थी तत्वों को पैसे के बल पर खरीद रहे थे क्यों नही भारत में
वे ऐसा नहीं करते होंगे। यहां पर स्टीव कौल की पुस्तक घोस्ट वार्स पेंग्विन 2004
अपने समय की न्यू यार्क टाइम्स की बैस्ट सैलर पुस्तक का जिक्र करना आवश्यक है।
जाने माने पत्रकार,तथा पुलिट्जर पुरस्कार से
नवाजे गए स्टीव काल ने 9,11,2001 घटना की पृष्टभूमि का खुलासा करने के लिए ही शायद
घोस्ट वार्स नामक जो पुस्तक लिखी है। इस किताब में स्टीव काल ने सरकारी दस्तावेजों
की सहायता से बड़े ही सटीक तरीके से बताया है कि किस प्रकार नवंबर 1979 से नवंबर
2001 तक विभिन्न देशों के गुप्तचर संस्थाए अपने अपने देशों के पूंजीपतियों के हित
साधने के लिए अफगानिस्तान में ही नहीं अंय
देशों में भी हिंसा तोड़ फोड़ करा रही थी। इसी दौरान सोवियत संघ के विघटन की नींव
भी डाल दी गई।इसमें बताया गया है कि किस प्रकार इन गुप्तचर संस्थाओं द्वारा स्थानीय
स्वार्थी तत्वों को अपने पाले में लाने के लिए धन पानी की तरह बहाया जारहा था। किस
प्रकार भ्रष्ट राजनीतिक, प्रशासनिक तंत्र इस धन से अपना हित साध रहा था तथा
धार्मिक उंमाद और घृणा फैला कर आम गरीब जनों को एक दूसरे का हलाल करने को प्रेरित
कर रहा था। इस हिंसा के लिये हथियार भी यही गुप्तचर संस्थाएं मुफ्त में दे रही थी।
पेज 238 में स्टीव कौल बताते हैं कि 1992 में अफगानिस्तानवासियों के पास जो निजी
हथियार थे उनकी संख्या उस समय के भारतवासियों तथा पाकिस्तानवासियों के पास के निजी
हथियारों के कुल योग से अधिक थे। 80 के
दशक में अफगानिस्तान में दुनियां के किसी भी देश में भेजे गए हथियारों से अधिक हथियार
भेजे गए थे।
हमारे देश में भी जाति, धर्म, भाषा,
क्षेत्रवाद के नाम पर विभिन्न समूह हिंसा,घृणा, वैमनश्य फैलाते रहे हैं। लोगों को
आपस में लड़ाते रहे हैं। अभी मुजफ्फरनगर में हजारों लोग कड़कड़ाती ठंड में धार्मिक
हिंसा के डर के मारे राहत शिविरों में रहने को मजबूर है। क्या यह हिंसा महज सत्ता
पाने के लिए वोटों का धुर्वीकरण करने लिए थी या इसके पीछे कोई विदेशी हाथ है? खालिस्तान आंदोलन की विदेशी जड़ों पर अक्सर चर्चा होती थी। परन्तु क्या
इंद्रिरा गांधी की हत्या व उसके बाद सिक्खों के विरुद्ध जो हिंसा हुई वह केवल
उंमाद था या उसके पीछे कोई विदेशी साजिश थी? इस पुस्तक को
पढ़ने के बाद यही शंका बाबरी मस्जिद ध्वंस, गोधरा व गोधरा के बाद की हिंसा, समझौता
एक्सप्रेस,और मालेगांव के विस्फोटों के बारे में भी उपजती है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बम विस्फोटों की बाढ़ सी आगई है।
उनके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जाता है। समझौता एक्सप्रेस व मालेगांव की हिंसा के पीछे भी विदेशी हाथ है।
1970 के दशक में सत्ता पाने के बाद श्रीमती इंद्रिरा गांधी हर अप्रिय घटना
के लिए विदेशी हाथ को जिम्मेदार ठहराती थी।विपक्ष अक्सर उनका उपहास करता था कि
अपनी गल्ती मानने और सुधारने के बजाय सारा ठीकरा विदेशी हाथ के सिर फोड़ दिया जाता
था। स्टीव कौल इस किताब में हम तीसरी दुनियां के वासियों के लिए विदेशी हाथ का एक
नया ही आयाम खोलते हैं। इस किताब में बताया गया है किस प्रकार गुप्तचर संस्थाएं
पैसा पानी की तरह बहा रही थी। और यह पैसा तथा हथियार व विस्फोटक स्थानीय स्वार्थी
तत्वों को बड़ी उदारता से दिया जारहा था।और ये स्वार्थी तत्व धार्मिक वैमनष्य फैला
कर गरीब गुरबों को धर्म के नाम पर अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए लड़ने के
लिए उकसा रहे थे। जहां स्वार्थी तत्व अपनी धन संपत्ति बढ़ा रहे थे तो गरीब या भूखे
मर रहे थे या धर्म के नाम पर कुरबानियां दे रहे थे। हमारे यहां भी घृणा, वैमनश्य
फैलाने वाले, हिंसा का आह्वान करने वाले तो सरकारी सुरक्षा में, पांच सितारा की
सुविधाओं में अपनी राजनीति करते हैं। मरता आम आदमी है।कांचा इलैया ने एक लेख में
लिखा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपों में जेलों में बंद अधिकतर लोग तथा कथित
निम्न जातियों के थे। अंय हिंसक घटनाएं भी काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कोई
अपवाद नहीं है।दुर्भाग्य से हमारे यहां स्टीव कौल जैसे खोजी लेखक नही मिलते। शायद यहां
लेखकों के पास उतने साधन भी नही होते।
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