अरविंद केजरीवाल तथा आप को भगोड़ा शब्द
से आपत्ति नहीं होना चाहिये।आज के संदर्भ में तो यह बहुत बड़ा कम्प्लीमैंट है। जरा
अपने चारों ओर देखिये क्या स्थिति है? हमारे इकलौतो
घोषित प्रधान मंत्री पद के उमीदवार हर सभा में ताल ठोक कर कह रहे हैं कि मतदान से
पहले ही चुनाव होगया है। पूरे देश की जनता ने उन्हें चुन लिया है। पर क्या वे अपनी
मुख्य मंत्री की कुर्सी छोड़ने का साहस कर पारहे हैं? पूरा मीडिया और जन मानस को देखिये ! कोई भी उनके एक पूर्णकालिक पद पर रहते हुए पूर्णकालिक चुनाव
अभियान में में पिछले कई महिनों से व्यस्त रहने पर सवाल नहीं उठा रहा है।आखिर
गुजरात की जनता ने उन्हें भारी बहुमत से गुजरात की सेवा के लिए चुना था।यदि वह
दूसरी कुर्सी के लिये प्रयत्न कर रहे हैं तो कम से कम दूसरे जनप्रतिनिध को गुजरात
का शासन चलाने की जिम्मेदारी लेने दें। पर ऐसा नहीं हो रहा। क्यों ?
दूसरी
बानगी देखिये।अभी पूर्व नौकरशाहों की दो किताबों का विमोचन हुआ है जिनमें हमारे
ईमानदार प्रधान मंत्री को निर्णय नहीं ले पाने की कमजोर या दयनीय स्थिति में
दर्शाया गया है। इसका कांग्रेस विरोधियों ने खूब फायदा उठाया है उनके साथ साथ
मीडिया भी नेहरू गांधी परिवार पर जी भर कर दोषारोपण कर रहा है। पर कोई नहीं कह रहा
कि दस साल ईमानदार प्र धान मंत्री जी ने असहाय मूकदर्शक बने रहने के बजाय इस्तीफा
क्यों नही दे दिया? लाल बहादुर शास्त्री के इस्तीफे के साथ ही सिद्धांत और नैतिकता के आधार पर
सत्ता त्याग करने का जमाना चला गया है। आपको फिर से इसे वापस लाना है।
आज की
संस्कृति चिपकू की है। कुछ भी हो जाय कुर्सी मत छोड़िये। आखिर सारी कोशिश सत्ता
पाने और उसका भरपूर लुत्फ उठाने के लिए होती है। दूसरा यदि सिद्धांतों के लिए
कुर्सी की यह कवायद जनमानस में बस गई तो क्या होगा। लोकनायक जयप्रकाश नारायण का
सत्तर के दशक का भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन की उपज आज के राजनीतिज्ञ भलीभांति
जानते हैं कि दूसरा जे पी आंदोलन किसी भी हालत में नहीं होने देना है। इसलिए
जनमानस में भगोड़ा कह कर आपकी नकारात्मक छवि बनाना इनकी मजबूरी है और रणनीती भी।
अंयथा इनका अस्तित्व खतरे मे पड़ जायागा। इसलिए आपको रक्षात्मक होने को बजाय अपने उस बयान --सिद्धांतों तथा मूल्यों के लिए सत्ता
की कुर्सी हजार बार कुर्बान पर डटे रहना है।
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