सोमवार, 30 जुलाई 2012

उपवास स्थल पर लोगों की कम उपस्थिति



टीम अन्ना के उपवास स्थल पर पहले तीन दिन लोगों की कम उपस्थिति सरकार और बाबा रामदेव के लिए आत्मतुष्टि का सबब बनते देखकर आश्चर्य हुआ।मैं तो सोच रही थी यह सबके लिए चिंता  का विषय है। क्योंकि भ्रष्टाचार का मुद्दा जस का तस है। आज टीम अन्ना सी ए जी की रपटों तथा अन्य विश्वसनीय सूत्रों जुटाए तथ्यों के आधार पर मनमोहन सिंह समेत उनकी सरकार के 15 मंत्रियों को सबूतों के साथ कठघरे में खड़ा कर रही है। जब कि पिछले अनशन के समय ये पाकसाफ नजर आरहे थे। सरकार के पास इन सबूतों का कोई माकूल जबाब नहीं है।  वह मीडिया में टीम अन्ना के सदस्यों से उल्टा सीधा तो कह रही है पर उस पर लगाए गए आरोपों पर जांच कराने की बात से बच रही है साथ ही टीम अन्ना के विरुद्ध कोई कानूनी कारवाही भी नहीं कर रही है। आम इंसान जो पिछले उपवासों में बड़ी आशा तथा उमीद के साथ इस आंदोलन से जुड़ा था उसके लिए यह भयावह स्थिति है। भ्रष्टाचार की वजह से उसके जीने के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाएं दिन पर दिन उससे दूर होती जारही हैं। दूसरी तरफ पिछले एक साल में सरकार ने जन लोकपाल विधेयक लाने से बचने के लिए जो दांव पेच खेले हैं वे सबके सामने हैं।ऐसे में लोगों की टीम अन्ना के अहिंसात्मक तरीकों से नाउमीदी भारतीय संविधान तथा लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी थी न कि टीम अन्ना खासकर अरविंद केजरीवाल से मोहभंग था।
      आमजन की अपेक्षतया कम उपस्थिति पर जो बहस टी वी चैनलों पर होरही थी उसपर आश्चर्य होरहा था। बाबा जी ने तो रामलीला मैदान में जो आंदोलन की रणनीति का जिक्र किया और 9 अगस्त को दिल्ली में 9 लाख लोगों के आने का दावा किया उससे जन आंदोलनों में आमजन की स्वतः सुपूर्त भागीदारी की धारणा को ही सिर के बल खड़ा कर दिया। इस पर उनके प्रवक्ता एक चैनल में उनको आंदोलन का जनक तथा टीम अन्ना खासकर अरविन्द केजरीवाल को आंदोलन की उपज बता रहे थे। मैं सोच रही थी जब हमने तथाकथित जनक का नाम भी नहीं सुना था तब अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के झुग्गीवासियों के साथ राशन की दुकानों या डीडीए के दफ्तर जैसी जगहों में होने वाले भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे थे कई बार राशन के दुकानदारों ने इनकी टीम पर हमला भी किया।आज भी उनकी संस्था के दरवाजे झुग्गीवालों के लिए खुले हैं। मैं ऐसे कई झुग्गीवालों को जानती हूं जिनकी उन्होंने मदद की थी। आज भी जरूरत पड़ने पर वे उनकी संस्था में जाते हैं। उनको जानने वाले झुग्गीवालों का उनपर अटूट विश्वास है। अन्ना के पिछले आंदोलनों में इन झुग्गीवासियों ने अपना सक्रिय योगदान दिया। अरविन्द केजरीवाल  तथा प्रशांत भूषण जैसे अन्ना टीम के सदस्य अपना ढ़ोल खुद नहीं पीटते हैं। लेकिन उनको जानने वाले जानते है वे क्या हैं।खुद को आंदोलन का जनक मानने वालों को समझना चाहिये कि बंद मुट्ठी ही लाख की होती है। आज जब सरकार में  किसी को भी संविधान या लोकतंत्र की चिंता नहीं दिखती ऐसे में मीडिया तथा आंदोलन के आलोचकों को आंदोलन की सकारात्मक आलोचना करनी चाहिये ताकि तू तू मैं मैं के बदले कुछ ऐसे सुझाव इन बहस मुबाहिसाओं से निकलें जिससे टीम अन्ना को अपनी गल्तियों का एहसास हो और आगे की रणनीति बनाने के  लिए कुछ नए आयाम  मिल जाए ताकि आमजन का विश्वास अपनी संगठित ताकत तथा जन आंदोलनों पर बना रहे। मेरा मानना है कि सवाल भीड़ का नहीं सवाल जनशक्ति पर विश्वास का है।  

मंगलवार, 14 जून 2011

एम एफ हुसैन का जाना

एम एफ हुसैन एक नए अंतहीन सफर के लिए निकल पड़े हैं। उनके निधन ने बहादुरशाह जफर की याद दिला दी। वह भी जीवन के अंतिम क्षणों में वतन की माटी के लिए तरसते रहे। एम एफ हुसैन को भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदारों ने देश छोड़ने मजबूर कर दिया। ऐसा करते समय उनको यह भी याद नहीं रहा कि भारतीय संस्कृति में उम्र को सम्मान दिया जाता है।जन भावनाएं भड़का कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के फिराक में शायद हर घर में बच्चों को सिखाई जाने वाली यह छोटी सी मान्यता कि --बड़ों की इज्जत करो--भूल गए। परंतु एम एफ हुसैन का जाना कई सवाल छोड़ गया।
पहला क्या भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदार एम एफ हुसैन को अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार चित्र बनाने से रोक पाए। समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार रामायण के पात्रों पर चित्र बनाना उनके अधूरे कार्यक्रमों में एक था जिसमें मौत ने ही बाधा डाली ।
दूसरा हुसैन ने भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों की नाजुक भावनाओं के आहत होने पर, खबरों के अनुसार, दुःख अवश्य जताया।पर क्या ये उनसे घूंघट में (जिसको शायद ये भारतीय परंपरा मानते हैं) में हिंदू देवियों के चित्र बनाने का आश्वाशन ले पाए? यदि नही तो हुसैन को देश निकाला देकर क्या हासिल किया? हुसैन ने तो इनको अपनी कूची, वाणी तथा कर्म से निशस्त्र कर दिया। देश या देश के बाहर वह अपना काम करते रहे। उनको व्यक्तिगततौर पर जानने वालों में से किसी ने भी उनके आक्रामक, सांप्रदायिक या अशांत होने की बात नहीं कही। वह चुपचाप कूची चलाते चलाते चले गए, साथ में लिख गए कि जहां निधन हो वही दफना भी दिया जाय। इस प्रकार उन्होंने एक बार फिर भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों को निशस्त्र कर दिया।
इसकी एक बानगी तब दिखी जब एक टी वी चैनल में इनके एक प्रवक्ता सरकार पर उनके शव को भारत लाने के लिए सहयोग का आश्वासन देने के लिए हमला बोल रहे थे और आरोप लगा रहे थे कि कांग्रेस सरकार हिंदू साधु संतों की तो परवाह नही करती। स्वामी निगमानंद के निधन ने उनकी तथा उनकी पार्टी की हिंदू साधु संतों की संरक्षक की छबि पर जो दाग लगा है उसको धोने के लिए कम से कम देश तथा साधु संतो से माफी तथा भविष्य में सावधान रहने का आश्वासन तो मिलना ही चाहिये था। पर इतना बड़ा दिल तथा इतना सच्चाई गांधी के इस देश में आज कहां! खैर हुसैन तो चले गए क्या इतिहास ऐसे तत्वों को माफ करेगा ?

मंगलवार, 7 जून 2011

ईमानदार व सच्चे प्रधान मंत्री

हमारे प्रधान मंत्री बड़े सच्चे आदमी हैं। कुछ समय पहले जब उन्होंने साझा सरकार की मजबूरियों की ओर इशारा किया था तो पूरा मीडिया उनकी साफगोई तथा इमानदारी पर एक ओर से फिदा हो गया था। इसी प्रकार जब सुप्रीम कोर्ट ने अनाज सड़ाने के बजाय गरीबों को बांटने का सुझाव दिया था तो प्रधान मंत्री ने दो टूक शब्दों में न्यायपालिका को अपनी हद में रहने को कह दिया। महंगाई कम करने के मुद्दे पर भी कई बार वादे करने बाद प्रधान मंत्री ने कह दिया कि वह ज्योतिषी तो नहीं हैं। अब भ्रष्टाचार के मामले में बुरी तरह घिर चुकी सरकार को बचाने के लिए भी प्रधान मंत्री ने कह दिया कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए मेरे पास कोई जादुई छड़ी नहीं है।
प्रधान मंत्री सही कह रहे हैं इस देश तथा इस देश के वासियों की समस्याओं का निदान करना उनके वश की बात नही है। पर अमेरिका के साथ परमाणु संधि, जैतापुर में परमाणु बिजली योजना या पास्को को आदिवासियों की जमीन देना या सेज के लिए ओने पौने दामों में उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहण जैसी तमाम पर्यावरण विरोधी, जन विरोधी और अक्सर विधि असम्मत कार्यक्रमों को आमजन के विरोध के बावजूद लागू कराने की जादुई छड़ी अचानक प्रधान मंत्री जी के पास आ जाती है।
यह जादुई छड़ी कैसे और कहां से आजाती है समझने के लिए हमें अपने प्रधान मंत्री की मजबूरियों को समझना होगा। बेचारे प्रधान मंत्री की सारी ताकत तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय बाजार उपलब्ध कराने व कच्चे माल के स्त्रोत खोलने में खर्च हो जाती है। यदि ऐसा नही करें तो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव और अमेरिकी राष्ट्रपतियों का कोप भाजन होना पड़ेगा। और यह कोपभाजन भारतीय जनमानस के कोपभाजन से भारी पड़ेगा ऐसा उन्हें लगता है इसीलिए एक प्रकार के कार्यक्रमों के लिए उनके पास जादुई छड़ी है जबकि दूसरे प्रकार के कार्यक्रम उनके वश में नहीं है। विरोधी दलों के नेताओं के मुंह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मलाई लग गई है। इसलिए वे विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उन कंपनियों पर प्रहार नहीं करते। उनको सारे कमियों बुराइयों की जड़ सोनियां गांधी लगती हैं और उनके सारे वार सोनियां गांधी पर होते हैं। आखिर औरत पर लाठी भांजने में मर्दानगी अधिक निखरती है। मसलन् राजघाट पर धरना देते समय कई भा ज पा नेताओं को नाचते हुए टी वी चैनलों ने दिखाया परन्तु कांग्रेस को सुषमा स्वराज ही नाचती नजर आई। जो मजा सुषमा स्वराज पर लाठी भांजने में आया होगा वह पुरुष नेताओं पर भाजने में नही आया होगा ना।

रविवार, 13 मार्च 2011

जापान में हुई तबाही

जापान में हुई तबाही के आंकलन में प्राकृतिक कारणों के साथ साथ मानव कृत कारणों का भी ईमानदारी से आंकलन होना चाहिये। साथ ही भारत को मानव कृत कारणों से सबक सीखना चाहिये।खासकर परमाणु ऊर्जा संयत्रों से पूरे देशवासियों तथा पूरी मानवता पर जो खतरा मडरा रहा है इस संदर्भ में हमें सोचना चाहिये कि क्या इस कीमत पर हम परमाणु ऊर्जा चाहते हैं। इसका उत्तर उन लोगों से लेना चाहिये जिनके इलाकों में परमाणु ऊर्जा संयत्रों को लगाने का सरकार की इरादा है। यदि जापानी सरकार अपने पक्के इरादों तथा उन्नत तकनीकी ज्ञान के बावजूद अपने लोगों को विकीरण से नहीं बचा पा रही है तो अपनी भ्रष्ट व अकुशल व्यवस्थाओं से हम क्या उमीद कर सकते हैं यह भोपाल गैस कांड पीड़ित हमें हर साल अपनी व्यथा बताकर एहसास कराते हैं।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

महिला दिवस 2011

आज महिला दिवस है। शहरों में मध्य वर्ग की कुछ महिलाएं इस दिन कोई न कोई कार्यक्रम करती हैं। या सेमिनार, बहस तथा मुबाहिसा होते हैं। परन्तु क्या अस्तित्व के संकट से जूझती आदिवासी महिलाएं, या पति की आत्महत्या के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी किसान महिलाएं किसी कार्यक्रम या या बहस तथा मुबाहिसा की चिंता का विषय कभी बनी हैं। मेरी जानकारी में नहीं। आज मुझे पुन्य प्रसून बाजपेई की छत्तीसगड़ में पुलिस ज्यादतियों की शिकार आदिवासी महिलाओं पर लिखी रपट याद आरही हैं। इस पर उन्हें पुरस्कार तो मिल गया। पर सभ्य समाज जिसको शायद सिविल सोसाइटी कहते हैं ने उन पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कोई मुहिम नहीं छेड़ी। चूंकि दमन की मुहिम अबिलम्ब चल रही है। इतने सालों में कई और पीडित आदिवासी महिलाओं नाम उन भुग्तभोगी महिलाओं के साथ जुड़ गए होंगे।पर समाज न तब जागा था न अब जागा है। आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरद्ध न महिला संगठन आवाज उठाते हैं न ही महिला आयोग की ये महिलाएं प्रार्थमिकता होती हैं और न ही अनुसूचित जाति अनुसुचित जनजाति आयोग इन महिलाओं के साथ हो रही ज्यादतियों पर कोई प्रतिक्रिया जताते हैं। महिला आंदोलनों का यह दुर्भाग्य रहा है कि बहनापे के नारे के बावजूद यह मध्य वर्ग से नीचे नहीं खिसक पाए हैं।जीवन की मूल सुविधाएं रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम आम गरीब, दलित शोषित महिलाएं, पग पग पर अस्तित्व के संकट से जूझती हर प्रकार की यौन हिंसा का शिकार आदिवासी महिलाओं के संघर्ष के मुद्दे यदि महिला आंदोलन या संगठनों की प्रार्थमिकता होती तो सुषमा स्वराज को महिला आरक्षण की भीख लोक सभा में पुरुष सदस्यों से नहीं मांगनी पड़ती। देश की 48 प्रतिशत महिलाएं 33 प्रतिशत आरक्षण पाने का इंतजार पिछले डेढ़ दशक से कर रही हैं और आज नेता विपक्ष इसके लिए भीख मांग रही है, इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या होसकती है। 80 प्रतिशत गरीब महिलाओं के संघर्षों से दूर ये महिलाए 33 प्रतिशत आपक्षण पाकर क्या सशक्त हो पाएंगी।

सोमवार, 17 जनवरी 2011

ईमानदारी का पैमाना

आजकल सत्ता के गलियारों में सर्वत्र भ्रष्टाचार की बयार बह रही है।ऐसा लगता है कि सत्ताशीनों के लिए ईमानदारी से शासन करना संभव ही नहीं है। यह सब तब हो रहा है जब हमारे प्रधान मंत्री की निजी ईमानदारी पर कोई शक नही करता। उन पर कोई कमिशनखोरी की इल्जाम उनके धुर विरोधी भी नहीं लगाते। समझ में नहीं आता प्रधानमंत्री इतने बेइमानों को झेलने के लिए क्य़ो मजबूर हैं.उनकी पिछली तथा वर्तमान मंत्री परिषद में धूमिल छबि के लोग मंत्री बने। ठीक है गठबंधन सरकार है। पर क्या एक ईमानदारी प्रधान मंत्री अपने सहयोगियों के सामने यह शर्त तो रख ही सकता है कि वह धूमिल छवि वाले मंत्रियों का नेत्रत्व नहीं करेगा। मनमोहन सिंह की स्थिति तो और भी मजबूत थी। जनता ने उनके नहीं श्रीमती सोनियां गांधी के नेत्रत्व को वोट दिया था। ऐसे में मनमोहन सिंह यह शर्त अपनी पार्टी के सामने भी रख सकते थे। पर ऐसा नहीं हुआ। पूरे पांच साल वह दागी मंत्रियों को मंत्रि परिषद में रखने का दंश झेलते रहे।अब जो होरहा है सबके सामने है। मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचारी शासको, प्रशासकों के सामने लाचार नजर आरही है। ऐसे में कई सवाल मन में आरहे हैं. पहला क्या ईमानदार इंसान इतना कमजोर होता है कि बेइमान को झेलना उसकी मजबूरी होती है। मनमोहन सिंह तो चुनाव भी कभी नहीं लड़े हैं।चुनाव खर्च की चिंता तो उन्हें कभी नही रही फिर क्यों वह यह शर्त नहीं रखा पाए उनके साथी ईमानदारी की मिशाल कायम रखेंगे अन्यथा वे सरकार नहीं चलाएगे। इस देश में एक मोहनदास करमचंद गांधी हुए थे। वह तो अपनी शर्त पर ही आंदोलन सत्याग्रह आंदोलन चलाते थे। शर्त टूटी नहीं कि उन्होंने आंदोलन वापस लिया। आज हम उनको भूल गए हैं।याद करते तो देश को आधुनिक सभ्यता की आग में नहीं झोंकते
दूसरा प्रश्न ईमानदारी की प्रकृति से जुड़ा है। क्या बेइमानी नजरअंदाज करना ईमानदारी के दायरे में नहीं आता। जिस प्रकार से अमेरिका के साथ परमणु संधि के लिए संसद में समर्थन जुटाया गया क्या वह ईमानदारी के दायरे में आता है।या परमाणु संधि से होने वाले लाभों का जो झुनझुना जनता को दिखाया गया क्या वह इमानदारी थी। या विकास के नाम पर जो विनाश होने दिया जारहा है वह इस देश तथा इसका जनता के साथ ईमानदारी है। बहुत सारे सवाल हैं पर उत्तर नही मिलता। कई बार सोचती हूं कि सत्यवादी हरीश चंद्र ने भी तो कुछ वादे शादी के समय सात फेरे लेते समय अपनी पत्नी से किये होंगे। पर जब परीक्षा की घड़ी आई तो उन पत्नी को दिये गए उन वादों का क्या हुआ। क्या ईमानदारी केवल मजबूत के संदर्भ में ही होनी चाहिये। अमेरिका को दिये गए वादे तो इस देश व जनता को हर कष्ट देकर निभाएं पर संविधान में इस देश के नागरिकों को दिये गए वादों का क्या । गिलास आधा भरा आधा खाली

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

औरत और परिवार

वह विवाहित है। उसके दो बच्चे भी हैं। पर वह अपने घर से अपने प्रेमी के साथ भाग कर आई है। इसलिए वह आम भारतीय महिला तो नहीं है जो अपने बच्चों के लिए कलपती रहे। अपना जीवन अपने प्रेमी के साथ मजे से जीना चाहती है। यहां पर एक पेच आगया है।उसका प्रेमी जैसा अक्सर होता है उसको छोड़कर अपने गांव वापस चला गया है। सुना है शादी रचा रहा है। उस पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा है।उसकी सपनों का संसार टूट गया है।वह किसी भी हालत में अपने प्रेमी को हासिल करना चाहती है। परंतु उसके पास शादी का कोई सबूत नहीं है। हां दस महिने वह आदमी उसका पति बन कर रहा है यह गवाही काफी लोग देने तैयार हैं।परंतु जिस संसथा में वह मदद मांगने गई वह इसको ज्यादा तवज्जों नहीं दे रही है। हां मदद का बादा नहीं ठुकराया है।
वह जल्दी में है।उसको अपने प्रेमी की शादी रुकवाने में अति शीघ्र मदद चाहिए।उसकी कोई महिला मित्र भी नहीं है जो उसको ढ़ढ़स बधा सके। वह जिसको भी अपनी व्यथा सुनाएगी वही उसको नीचा देखेगी।मायके वालों से भी कोई संवाद नही है। अलबत्ता अपने पड़ोसी पुरुषों से उसको सहानुभूति तथा मदद का वादा मिल रहा है।एक ने गांव जाकर उसके प्रेमी का अपहरण कर उसको सौंप दिने का वादा किया। वह उस पड़ौसी के साथ गाव जाने तैयार होगई।
यहीं से मेरी चिंता शुरु होगई।मैंने उसको कानून अपने हाथ में नहीं लेने की सलाह दी। उसको हो सकने वाले खतरों के बारे मे बताया। लेकिन वह अपना जिद पर अड़ी रही। मेरी चिंता बढ़ गई। मैं उसे धैर्य रखने व ठंडे दिमाग से सोच सम कर ही अगला कदम उठाने की सलाह देने लगी। पर बह कहां मानने वाली थी।आखिर उसने अल्टीमेटम दे दिया कि वह चार दिन की छुट्टी लेकर उस पड़ोसी के साथ गांव जाएगी और हर हालत अपने प्रेमी को साथ लेकर आएगी।
जब वह अपना हिसाब मांगने आई तो संयोग से एक सहेली बैठी थी जिसने काफी समय तक काउनसिलिंग का काम किया है। वह बार बार उस महिला से उसके मायके वालों के बारे में पूछ रही थी। उसको समझ में नही आरहा था कि प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर वह दिल्ली क्यों आई मायके क्यों नहीं गई। खैर बड़ी मुस्किल से उसने अपना इरादा बदला और यहीं से अपना प्रेमी के विरुद्ध कागजी लड़ाई लड़ने तैयार हो गई।पर यह पूरी कवायद मन में कई सवाल छोड़ गई। मसलन् क्या उसको गांव जाने से रोकना व अपराधियों की मदद से अपने प्रेमी को हासिल करने से रोकना सही था य़ा गलत।या औरत का परिवार से रिस्ते की लक्ष्मण रेखा क्या है। परिवार तो तभी पीछे खड़ा होगा जब स्त्री के हित व परिवार के हित समान होंगे। अक्सर दोनों के आपसी हितो में द्वंद उत्पन्न हो जाता है। मसलन् दहेज का मामला।अक्सर माता पिता दहेज के लोभी परिवारों के अत्याचार सहने बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।जिनका अंजाम कई बार दहेज के लिए की गई हत्या होता है। ऐसे में अगर समाज भी औरत से उसके मायके वालों के बारे में तीखे सवाल पूछना कितना सही है।
उस पड़ौसी पर शक करना कितना सही है। क्या कोई पुरुष निस्वार्थ किसी स्त्री की सहायता के लिए कानून हाथ में लेने की हद तक जा सकता है। वह गांव नही गई और यहां सुरक्षित है। जीने के लिए उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है। यह संतोष उपरोक्त सवालों से धुधला हो गया है।क्या पितृसत्ता के चुंगल से निकलना इतना कठिन है कि मैं स्वयं तो नहीं उबर पाई यदि कोई उबरने की कोशिश भी करती है तो अनिष्ट की संभावनाओं से कांप कर उसके भी पर बांध देने की कोशिश करती हूं।