सोमवार, 20 अगस्त 2012

ये समानताएं!!!





पिछले 12 दिन से पुलिस को छकाने का नाटक करने के बाद आखिर आज (18,8,12 की सुबह चार बजे ) गोपाल कांडा ने आत्मसमर्पण कर दिया। इन 12 दिनों में कांडा के बारे में हर समाचार चैनल में बताया जाता था।इस दौरान हिंदी के किसी चैनल में कांडा को आदरसूचक शब्दों से ही संबोधित किया जाता रहा । इन संवाददाताओं, एंकरों को सुनकर लगता ही नही था कि वे किसी बाहुबली और आरोपी भगोड़ा के कानून के चुंगल से भागने की कोशिशों के समाचार देरहे थे।लेकिन यदि आरोपी सफेदपोश तथा अपने राजनीतिक व सामाजिक संपर्कों की वजह से प्रभावशाली न हो तो उसके लिए ऐसी संभ्रांत भाषा का प्रयोग नहीं होता। मैंने चंदन तस्कर बीरप्पन के लिए आदरसूचक शब्दों का प्रयोग होते नहीं सुना। माओवादी आंदोलन से जुड़े होने के आरोप में पकड़े गए उच्चतम् शिक्षा प्राप्त लोगों के बारे में बताते समय किसी भी प्रकार के आदरसूचक शब्दों का प्रयोग होते नहीं सुना। कुछ समय पहले इंटरनैट में एक फोटो देखी। जिसमें एक क्रांतिकारी महिला को मार गिराने के बाद सुरक्षा बल के दो सिपाही उसके हाथ और पावों को एक लकड़ी को पोल में बाधकर पोल के दो सिरों को कंधे में रख कर लेजारहे थे। भगत सिंह के देश में क्रांतिकारियों के इस तरह के अपमान को देखकर मन खिन्न हुआ। पुलिस यदि मीडिया का दबाव न हो तो शायद सफेदपोश अपराधियों के पकड़े ही नहीं। क्रातिकारियों के साथ उनकी गिरफ्दारी के बाद उनसे अमानवीय ब्यवहार करती है तथा मृत्यु के बाद भी उनको सम्मान नहीं देती। क्रांतिकारियों के साथ आपका उनसे मतभेद हो सकता है। पर उनकी सिद्धांतबद्धता की कदर तो होनी ही चाहिये। दुर्भाग्य से आज अपने देश में क्रांति के शहीदों को आदर देना उतना महत्वपूर्ण नहीं माना जाता जितना सफेदपोश अपराधियों को सम्मानपूर्वक संबोधित करना। पुलिस हिरासत या जेल में उन्हें पांच सितारा सुविधाएं देना।


जमानत में जेल से छूट कर ए राजा का जिस तरह से गृह प्रदेश में स्वागत हुआ उसी प्रकार का स्वागत नैनीताल उच्च न्यायालय से जमानत मिलने पर बालकृष्ण का हुआ। माना कि सरकार ने बालकृष्ण पर आरोप रामदेव द्वारा चलाए जारहे आंदोलन की वजह से लगाए। (12 दिन तक कानून को अंगूठा दिखाने के बाद गोपाल कांडा ने भी खूब धूमधाम से पुलिस थाने में आत्मसमर्पण किया। दूसरे दिन अदालत में पेश होते समय भी वैसी ही भीड़ थी।) पर प्रथमदृष्टिया अदालत ने उन आरोपों को सही पाया। इसीलिए सारी नामीग्रामी वकीलों की सेवाएं हासिल होने के बावजूद बालकृष्ण को इतने दिन जेल में रहना पड़ा।आज भी वह कानून की नजर में आरोपी है। फिर इस प्रकार का विजय दिवश क्यों? इस देश का हर नागरिक जानता है कि सरकारों को भ्रष्टाचार तथा भ्रष्टाचारियों से कोई आपत्ति नहीं होती है। परन्तु जब ये भ्रष्ट तत्व सरकार को आंखें दिखाना शुरु करते हैं तो संबंधित राज्य या केंद्र की सरकार उसका कच्चा चिट्ठा खोल देती है। फिर कानून को अपना काम करने दिया जाता है। पणिनिति गिरफ्दारी, जेल, अदालती कार्यवाही होती है। सरकार हमेशा ही अपने लिए खतरा पैदा करने वालों को फसाने के लिए भी जाल बुनती है। परन्तु यदि वे पाक साफ हुए तो कानून की चक्की में पिसने से बच जाते हैं। भूतपूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का उदाहरण हमारे सामने है।

बाबा रामदेव अक्सर अपने अल्पाहार का जिक्र करते रहते हैं।हर भारतीय को उन जैसी सुख सुविधाएं तथा पोषक आहार मिले तो वह भी अल्पाहारी ही होगा। भूख मिटाने तो गरीब खाता है। सेठ तो हमेशा मुह का स्वाद बदलने के लिए खाते हैं। अल्पाहारी गांधी भी थे। पर वे इसका ढ़िढ़ोरा नहीं पीटते थे। उनका अल्पाहार स्वाद के लिए नहीं शरीर को आवश्यक पोषक तत्व देने के लिए होता था।उसी प्रकार गांधी अपरिग्रही थे।पर यह उनके भाषणों की हिस्सा नहीं होता। बाबा रामदेव तथा अन्ना हजारे अपने भाषणों में बताते नहीं थकते कि उनके पास कोई निजी संपत्ति नहीं है। इसकी क्या आवश्यकता है समझ में नहीं आता। जिस प्रकार के अत्याधुनिक सुख सुविधाओं में बाबा रामदेव रहते हैं यदि बिना किसी संपत्ति   के स्वामित्व के ये सभी सुविधाएं हासिल हो जाएं तो संपत्ति के जंजाल में पड़ना कौन चाहेगा।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

RIGHT TO LIFE




Article 21 of our Constitution  gives  RIGHT TO LIFE  to every person  residing in India. It reads:
no person shall be deprived of his life or personal  liberty except according to procedure established by law.

 The hon. Supreme Court in its various judgements has given positive and very broad interpretation of this Article.  In actual practice The Indian State seems to be violating this article both at policy formulation and implementation level.  The non-functioning CCTV cameras at the blast site in Pune on 1,8, 2012 is the latest example. Earlier also there have been numerous incidents of CCTV cameras installed in government establishments failing the investigating agencies at the time of terrorist attack, accidents, road rage violence or crimes against women. The most blatant case of playing with the lives of our defence and security agencies is the supply of substandard bullet-poof jackets. At the time of 26/11 it cost precious lives of our police personnel. Whenever these omissions and commissions come to light due to man made calamity the police and other concerned authorities have explanations for non functional gadgets installed by government in public establishments. But the responsibility is never fixed. Why are these gadgets not maintained? If the installing agency was not equipped to maintain them what was the logic behind installing them? We are never told. It is the public money that is wasted  in  installing these nonfunctional gadgets and nobody is held responsible for this waste.  

Similar non-concern is shown towards the safety of children going to privately- run schools. Because the parents of these children are well off they spent huge amounts of money on their(children’s) education. They (the children) travel long distances in their school buses which are quite costly. While, money is extracted from hapless parents on one pretext or the other no concern have been shown towards the safety of these children. We read the news of a Xth standard boy dying because the windows of the school bus he was travelling were not properly protected. A little girl slips from the huge hole in the floor of school bus and gets crushed by the same bus she was travelling. Yet nobody is accountable. No body is punished. Government  uses public money to provide compensation. No explanations are given as to who is responsible for getting the Supreme Court directives regarding the safety of school buses implemented. Why are they not being implemented? Parents too, who are well placed,  leave no stone unturned to help their wards to be at top in the class or in the school do not seem to be worried about the safety of their children. Because we do not read news about parents joining hands and forcing the authorities to implement the hon. Courts directions regarding the safety of school buses. One does not knot whether many parents have time to find out what these directives are and why they were given by the court?

सोमवार, 30 जुलाई 2012

उपवास स्थल पर लोगों की कम उपस्थिति



टीम अन्ना के उपवास स्थल पर पहले तीन दिन लोगों की कम उपस्थिति सरकार और बाबा रामदेव के लिए आत्मतुष्टि का सबब बनते देखकर आश्चर्य हुआ।मैं तो सोच रही थी यह सबके लिए चिंता  का विषय है। क्योंकि भ्रष्टाचार का मुद्दा जस का तस है। आज टीम अन्ना सी ए जी की रपटों तथा अन्य विश्वसनीय सूत्रों जुटाए तथ्यों के आधार पर मनमोहन सिंह समेत उनकी सरकार के 15 मंत्रियों को सबूतों के साथ कठघरे में खड़ा कर रही है। जब कि पिछले अनशन के समय ये पाकसाफ नजर आरहे थे। सरकार के पास इन सबूतों का कोई माकूल जबाब नहीं है।  वह मीडिया में टीम अन्ना के सदस्यों से उल्टा सीधा तो कह रही है पर उस पर लगाए गए आरोपों पर जांच कराने की बात से बच रही है साथ ही टीम अन्ना के विरुद्ध कोई कानूनी कारवाही भी नहीं कर रही है। आम इंसान जो पिछले उपवासों में बड़ी आशा तथा उमीद के साथ इस आंदोलन से जुड़ा था उसके लिए यह भयावह स्थिति है। भ्रष्टाचार की वजह से उसके जीने के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाएं दिन पर दिन उससे दूर होती जारही हैं। दूसरी तरफ पिछले एक साल में सरकार ने जन लोकपाल विधेयक लाने से बचने के लिए जो दांव पेच खेले हैं वे सबके सामने हैं।ऐसे में लोगों की टीम अन्ना के अहिंसात्मक तरीकों से नाउमीदी भारतीय संविधान तथा लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी थी न कि टीम अन्ना खासकर अरविंद केजरीवाल से मोहभंग था।
      आमजन की अपेक्षतया कम उपस्थिति पर जो बहस टी वी चैनलों पर होरही थी उसपर आश्चर्य होरहा था। बाबा जी ने तो रामलीला मैदान में जो आंदोलन की रणनीति का जिक्र किया और 9 अगस्त को दिल्ली में 9 लाख लोगों के आने का दावा किया उससे जन आंदोलनों में आमजन की स्वतः सुपूर्त भागीदारी की धारणा को ही सिर के बल खड़ा कर दिया। इस पर उनके प्रवक्ता एक चैनल में उनको आंदोलन का जनक तथा टीम अन्ना खासकर अरविन्द केजरीवाल को आंदोलन की उपज बता रहे थे। मैं सोच रही थी जब हमने तथाकथित जनक का नाम भी नहीं सुना था तब अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के झुग्गीवासियों के साथ राशन की दुकानों या डीडीए के दफ्तर जैसी जगहों में होने वाले भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रहे थे कई बार राशन के दुकानदारों ने इनकी टीम पर हमला भी किया।आज भी उनकी संस्था के दरवाजे झुग्गीवालों के लिए खुले हैं। मैं ऐसे कई झुग्गीवालों को जानती हूं जिनकी उन्होंने मदद की थी। आज भी जरूरत पड़ने पर वे उनकी संस्था में जाते हैं। उनको जानने वाले झुग्गीवालों का उनपर अटूट विश्वास है। अन्ना के पिछले आंदोलनों में इन झुग्गीवासियों ने अपना सक्रिय योगदान दिया। अरविन्द केजरीवाल  तथा प्रशांत भूषण जैसे अन्ना टीम के सदस्य अपना ढ़ोल खुद नहीं पीटते हैं। लेकिन उनको जानने वाले जानते है वे क्या हैं।खुद को आंदोलन का जनक मानने वालों को समझना चाहिये कि बंद मुट्ठी ही लाख की होती है। आज जब सरकार में  किसी को भी संविधान या लोकतंत्र की चिंता नहीं दिखती ऐसे में मीडिया तथा आंदोलन के आलोचकों को आंदोलन की सकारात्मक आलोचना करनी चाहिये ताकि तू तू मैं मैं के बदले कुछ ऐसे सुझाव इन बहस मुबाहिसाओं से निकलें जिससे टीम अन्ना को अपनी गल्तियों का एहसास हो और आगे की रणनीति बनाने के  लिए कुछ नए आयाम  मिल जाए ताकि आमजन का विश्वास अपनी संगठित ताकत तथा जन आंदोलनों पर बना रहे। मेरा मानना है कि सवाल भीड़ का नहीं सवाल जनशक्ति पर विश्वास का है।  

मंगलवार, 14 जून 2011

एम एफ हुसैन का जाना

एम एफ हुसैन एक नए अंतहीन सफर के लिए निकल पड़े हैं। उनके निधन ने बहादुरशाह जफर की याद दिला दी। वह भी जीवन के अंतिम क्षणों में वतन की माटी के लिए तरसते रहे। एम एफ हुसैन को भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदारों ने देश छोड़ने मजबूर कर दिया। ऐसा करते समय उनको यह भी याद नहीं रहा कि भारतीय संस्कृति में उम्र को सम्मान दिया जाता है।जन भावनाएं भड़का कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के फिराक में शायद हर घर में बच्चों को सिखाई जाने वाली यह छोटी सी मान्यता कि --बड़ों की इज्जत करो--भूल गए। परंतु एम एफ हुसैन का जाना कई सवाल छोड़ गया।
पहला क्या भारतीय संस्कृति के स्वयंभू झंडाबरदार एम एफ हुसैन को अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार चित्र बनाने से रोक पाए। समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार रामायण के पात्रों पर चित्र बनाना उनके अधूरे कार्यक्रमों में एक था जिसमें मौत ने ही बाधा डाली ।
दूसरा हुसैन ने भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों की नाजुक भावनाओं के आहत होने पर, खबरों के अनुसार, दुःख अवश्य जताया।पर क्या ये उनसे घूंघट में (जिसको शायद ये भारतीय परंपरा मानते हैं) में हिंदू देवियों के चित्र बनाने का आश्वाशन ले पाए? यदि नही तो हुसैन को देश निकाला देकर क्या हासिल किया? हुसैन ने तो इनको अपनी कूची, वाणी तथा कर्म से निशस्त्र कर दिया। देश या देश के बाहर वह अपना काम करते रहे। उनको व्यक्तिगततौर पर जानने वालों में से किसी ने भी उनके आक्रामक, सांप्रदायिक या अशांत होने की बात नहीं कही। वह चुपचाप कूची चलाते चलाते चले गए, साथ में लिख गए कि जहां निधन हो वही दफना भी दिया जाय। इस प्रकार उन्होंने एक बार फिर भारतीय संस्कृति के इन स्वयंभू झंडाबरदारों को निशस्त्र कर दिया।
इसकी एक बानगी तब दिखी जब एक टी वी चैनल में इनके एक प्रवक्ता सरकार पर उनके शव को भारत लाने के लिए सहयोग का आश्वासन देने के लिए हमला बोल रहे थे और आरोप लगा रहे थे कि कांग्रेस सरकार हिंदू साधु संतों की तो परवाह नही करती। स्वामी निगमानंद के निधन ने उनकी तथा उनकी पार्टी की हिंदू साधु संतों की संरक्षक की छबि पर जो दाग लगा है उसको धोने के लिए कम से कम देश तथा साधु संतो से माफी तथा भविष्य में सावधान रहने का आश्वासन तो मिलना ही चाहिये था। पर इतना बड़ा दिल तथा इतना सच्चाई गांधी के इस देश में आज कहां! खैर हुसैन तो चले गए क्या इतिहास ऐसे तत्वों को माफ करेगा ?

मंगलवार, 7 जून 2011

ईमानदार व सच्चे प्रधान मंत्री

हमारे प्रधान मंत्री बड़े सच्चे आदमी हैं। कुछ समय पहले जब उन्होंने साझा सरकार की मजबूरियों की ओर इशारा किया था तो पूरा मीडिया उनकी साफगोई तथा इमानदारी पर एक ओर से फिदा हो गया था। इसी प्रकार जब सुप्रीम कोर्ट ने अनाज सड़ाने के बजाय गरीबों को बांटने का सुझाव दिया था तो प्रधान मंत्री ने दो टूक शब्दों में न्यायपालिका को अपनी हद में रहने को कह दिया। महंगाई कम करने के मुद्दे पर भी कई बार वादे करने बाद प्रधान मंत्री ने कह दिया कि वह ज्योतिषी तो नहीं हैं। अब भ्रष्टाचार के मामले में बुरी तरह घिर चुकी सरकार को बचाने के लिए भी प्रधान मंत्री ने कह दिया कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए मेरे पास कोई जादुई छड़ी नहीं है।
प्रधान मंत्री सही कह रहे हैं इस देश तथा इस देश के वासियों की समस्याओं का निदान करना उनके वश की बात नही है। पर अमेरिका के साथ परमाणु संधि, जैतापुर में परमाणु बिजली योजना या पास्को को आदिवासियों की जमीन देना या सेज के लिए ओने पौने दामों में उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहण जैसी तमाम पर्यावरण विरोधी, जन विरोधी और अक्सर विधि असम्मत कार्यक्रमों को आमजन के विरोध के बावजूद लागू कराने की जादुई छड़ी अचानक प्रधान मंत्री जी के पास आ जाती है।
यह जादुई छड़ी कैसे और कहां से आजाती है समझने के लिए हमें अपने प्रधान मंत्री की मजबूरियों को समझना होगा। बेचारे प्रधान मंत्री की सारी ताकत तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारतीय बाजार उपलब्ध कराने व कच्चे माल के स्त्रोत खोलने में खर्च हो जाती है। यदि ऐसा नही करें तो विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव और अमेरिकी राष्ट्रपतियों का कोप भाजन होना पड़ेगा। और यह कोपभाजन भारतीय जनमानस के कोपभाजन से भारी पड़ेगा ऐसा उन्हें लगता है इसीलिए एक प्रकार के कार्यक्रमों के लिए उनके पास जादुई छड़ी है जबकि दूसरे प्रकार के कार्यक्रम उनके वश में नहीं है। विरोधी दलों के नेताओं के मुंह भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मलाई लग गई है। इसलिए वे विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उन कंपनियों पर प्रहार नहीं करते। उनको सारे कमियों बुराइयों की जड़ सोनियां गांधी लगती हैं और उनके सारे वार सोनियां गांधी पर होते हैं। आखिर औरत पर लाठी भांजने में मर्दानगी अधिक निखरती है। मसलन् राजघाट पर धरना देते समय कई भा ज पा नेताओं को नाचते हुए टी वी चैनलों ने दिखाया परन्तु कांग्रेस को सुषमा स्वराज ही नाचती नजर आई। जो मजा सुषमा स्वराज पर लाठी भांजने में आया होगा वह पुरुष नेताओं पर भाजने में नही आया होगा ना।

रविवार, 13 मार्च 2011

जापान में हुई तबाही

जापान में हुई तबाही के आंकलन में प्राकृतिक कारणों के साथ साथ मानव कृत कारणों का भी ईमानदारी से आंकलन होना चाहिये। साथ ही भारत को मानव कृत कारणों से सबक सीखना चाहिये।खासकर परमाणु ऊर्जा संयत्रों से पूरे देशवासियों तथा पूरी मानवता पर जो खतरा मडरा रहा है इस संदर्भ में हमें सोचना चाहिये कि क्या इस कीमत पर हम परमाणु ऊर्जा चाहते हैं। इसका उत्तर उन लोगों से लेना चाहिये जिनके इलाकों में परमाणु ऊर्जा संयत्रों को लगाने का सरकार की इरादा है। यदि जापानी सरकार अपने पक्के इरादों तथा उन्नत तकनीकी ज्ञान के बावजूद अपने लोगों को विकीरण से नहीं बचा पा रही है तो अपनी भ्रष्ट व अकुशल व्यवस्थाओं से हम क्या उमीद कर सकते हैं यह भोपाल गैस कांड पीड़ित हमें हर साल अपनी व्यथा बताकर एहसास कराते हैं।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

महिला दिवस 2011

आज महिला दिवस है। शहरों में मध्य वर्ग की कुछ महिलाएं इस दिन कोई न कोई कार्यक्रम करती हैं। या सेमिनार, बहस तथा मुबाहिसा होते हैं। परन्तु क्या अस्तित्व के संकट से जूझती आदिवासी महिलाएं, या पति की आत्महत्या के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी किसान महिलाएं किसी कार्यक्रम या या बहस तथा मुबाहिसा की चिंता का विषय कभी बनी हैं। मेरी जानकारी में नहीं। आज मुझे पुन्य प्रसून बाजपेई की छत्तीसगड़ में पुलिस ज्यादतियों की शिकार आदिवासी महिलाओं पर लिखी रपट याद आरही हैं। इस पर उन्हें पुरस्कार तो मिल गया। पर सभ्य समाज जिसको शायद सिविल सोसाइटी कहते हैं ने उन पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कोई मुहिम नहीं छेड़ी। चूंकि दमन की मुहिम अबिलम्ब चल रही है। इतने सालों में कई और पीडित आदिवासी महिलाओं नाम उन भुग्तभोगी महिलाओं के साथ जुड़ गए होंगे।पर समाज न तब जागा था न अब जागा है। आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरद्ध न महिला संगठन आवाज उठाते हैं न ही महिला आयोग की ये महिलाएं प्रार्थमिकता होती हैं और न ही अनुसूचित जाति अनुसुचित जनजाति आयोग इन महिलाओं के साथ हो रही ज्यादतियों पर कोई प्रतिक्रिया जताते हैं। महिला आंदोलनों का यह दुर्भाग्य रहा है कि बहनापे के नारे के बावजूद यह मध्य वर्ग से नीचे नहीं खिसक पाए हैं।जीवन की मूल सुविधाएं रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम आम गरीब, दलित शोषित महिलाएं, पग पग पर अस्तित्व के संकट से जूझती हर प्रकार की यौन हिंसा का शिकार आदिवासी महिलाओं के संघर्ष के मुद्दे यदि महिला आंदोलन या संगठनों की प्रार्थमिकता होती तो सुषमा स्वराज को महिला आरक्षण की भीख लोक सभा में पुरुष सदस्यों से नहीं मांगनी पड़ती। देश की 48 प्रतिशत महिलाएं 33 प्रतिशत आरक्षण पाने का इंतजार पिछले डेढ़ दशक से कर रही हैं और आज नेता विपक्ष इसके लिए भीख मांग रही है, इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या होसकती है। 80 प्रतिशत गरीब महिलाओं के संघर्षों से दूर ये महिलाए 33 प्रतिशत आपक्षण पाकर क्या सशक्त हो पाएंगी।