मंगलवार, 13 जुलाई 2010

औरत और परिवार

वह विवाहित है। उसके दो बच्चे भी हैं। पर वह अपने घर से अपने प्रेमी के साथ भाग कर आई है। इसलिए वह आम भारतीय महिला तो नहीं है जो अपने बच्चों के लिए कलपती रहे। अपना जीवन अपने प्रेमी के साथ मजे से जीना चाहती है। यहां पर एक पेच आगया है।उसका प्रेमी जैसा अक्सर होता है उसको छोड़कर अपने गांव वापस चला गया है। सुना है शादी रचा रहा है। उस पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा है।उसकी सपनों का संसार टूट गया है।वह किसी भी हालत में अपने प्रेमी को हासिल करना चाहती है। परंतु उसके पास शादी का कोई सबूत नहीं है। हां दस महिने वह आदमी उसका पति बन कर रहा है यह गवाही काफी लोग देने तैयार हैं।परंतु जिस संसथा में वह मदद मांगने गई वह इसको ज्यादा तवज्जों नहीं दे रही है। हां मदद का बादा नहीं ठुकराया है।
वह जल्दी में है।उसको अपने प्रेमी की शादी रुकवाने में अति शीघ्र मदद चाहिए।उसकी कोई महिला मित्र भी नहीं है जो उसको ढ़ढ़स बधा सके। वह जिसको भी अपनी व्यथा सुनाएगी वही उसको नीचा देखेगी।मायके वालों से भी कोई संवाद नही है। अलबत्ता अपने पड़ोसी पुरुषों से उसको सहानुभूति तथा मदद का वादा मिल रहा है।एक ने गांव जाकर उसके प्रेमी का अपहरण कर उसको सौंप दिने का वादा किया। वह उस पड़ौसी के साथ गाव जाने तैयार होगई।
यहीं से मेरी चिंता शुरु होगई।मैंने उसको कानून अपने हाथ में नहीं लेने की सलाह दी। उसको हो सकने वाले खतरों के बारे मे बताया। लेकिन वह अपना जिद पर अड़ी रही। मेरी चिंता बढ़ गई। मैं उसे धैर्य रखने व ठंडे दिमाग से सोच सम कर ही अगला कदम उठाने की सलाह देने लगी। पर बह कहां मानने वाली थी।आखिर उसने अल्टीमेटम दे दिया कि वह चार दिन की छुट्टी लेकर उस पड़ोसी के साथ गांव जाएगी और हर हालत अपने प्रेमी को साथ लेकर आएगी।
जब वह अपना हिसाब मांगने आई तो संयोग से एक सहेली बैठी थी जिसने काफी समय तक काउनसिलिंग का काम किया है। वह बार बार उस महिला से उसके मायके वालों के बारे में पूछ रही थी। उसको समझ में नही आरहा था कि प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर वह दिल्ली क्यों आई मायके क्यों नहीं गई। खैर बड़ी मुस्किल से उसने अपना इरादा बदला और यहीं से अपना प्रेमी के विरुद्ध कागजी लड़ाई लड़ने तैयार हो गई।पर यह पूरी कवायद मन में कई सवाल छोड़ गई। मसलन् क्या उसको गांव जाने से रोकना व अपराधियों की मदद से अपने प्रेमी को हासिल करने से रोकना सही था य़ा गलत।या औरत का परिवार से रिस्ते की लक्ष्मण रेखा क्या है। परिवार तो तभी पीछे खड़ा होगा जब स्त्री के हित व परिवार के हित समान होंगे। अक्सर दोनों के आपसी हितो में द्वंद उत्पन्न हो जाता है। मसलन् दहेज का मामला।अक्सर माता पिता दहेज के लोभी परिवारों के अत्याचार सहने बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।जिनका अंजाम कई बार दहेज के लिए की गई हत्या होता है। ऐसे में अगर समाज भी औरत से उसके मायके वालों के बारे में तीखे सवाल पूछना कितना सही है।
उस पड़ौसी पर शक करना कितना सही है। क्या कोई पुरुष निस्वार्थ किसी स्त्री की सहायता के लिए कानून हाथ में लेने की हद तक जा सकता है। वह गांव नही गई और यहां सुरक्षित है। जीने के लिए उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है। यह संतोष उपरोक्त सवालों से धुधला हो गया है।क्या पितृसत्ता के चुंगल से निकलना इतना कठिन है कि मैं स्वयं तो नहीं उबर पाई यदि कोई उबरने की कोशिश भी करती है तो अनिष्ट की संभावनाओं से कांप कर उसके भी पर बांध देने की कोशिश करती हूं।

गुरुवार, 24 जून 2010

परिवार की झूठी आन बान के लिए
राखी व भाई दूज धूमधाम से मनाने वाले इस देश में धर्म और संस्कृति बचाने के नाम पर बहनों तथा बेटियों की हत्या परिवार, समाज,व पंचायत की सहमति या आह्वान पर हो रही है। समाज के स्वंयभू ठेकेदार इन हत्याओं को ताल ठोक कर सही ठहरा रहै हैं। पर जेल जाने तथा अपने कर्मों की सजा भुगतने तैयार नही हैं।इसीलिए आपनी राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग कर कानून बदलवाने का कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आम भारतीय स्त्री पुरुष अपने निजी संबंधों खास कर यौन संबंधों में इस प्रकार की जड़ता स्वीकार नही करते। इसके तीन उदाहरण पिछले एक सप्ताह में देखने को मिले।
उदाहरण एक--
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
उदाहरण दो
ख का पति ख को मारने के बाद उसको मरा जान कर भाग गया। अभी तक वापस नहीं आया। उसके पड़ोसी और दोस्त ने डाक्टर के पास समय पर ले जाकर उसकी जान बचाई। पूरा इलाज कराया। आज वे दोनों साथ साथ रह रहे हैं। उनके बच्चे भी हैं।
उदाहरण तीन
ग विधवा है उसके दो बेटे हैं जो अपनी दादी के के पास हैं। वह अपने दोस्त के साथ शहर आगई है फिर से जिंदगी बसाने। संघर्ष हैं पर जीने की तमन्ना भी है जो रो रो कर किस्मत को कोसने से हजार गुना अच्छा है।
असल में ब्राह्मणी पितृसत्ता को भारतीय पितृसत्ता बताना अंग्रेजों ने प्रारंभ किया। हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों कानूनों में एक रूपता लाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने बनारस के पंडितों की एक समिति बनाई। इस समिति ने हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर जो नियम सुझाए उनको हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों के तौर पर मान्यता दे दी गई। यहां यह बताना आवश्यक है कि तब हिंदू धर्म शास्त्रों की वर्जनाएं ब्राह्मणों पर ही लागू होती थी। अंग्रेजी कानून व न्याय व्यवस्था ने इसे सारे हिंदू समाज पर थोप दिया।आज धर्म के ठेकेदार इसे भारतीय के नाम पर सबके ऊपर थोपने पर आमदा हैं।

परिवार की इज्जत की खातिर -1

उदाहरण एक--
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।

परिवार की इज्जत की खातिर

परिवार की झूठी आन बान के लिए राखी व भाई दूज धूमधाम से मनाने वाले इस देश में धर्म और संस्कृति बचाने के नाम पर बहनों तथा बेटियों की हत्या परिवार, समाज,व पंचायत की सहमति या आह्वान पर हो रही है। समाज के स्वंयभू ठेकेदार इन हत्याओं को ताल ठोक कर सही ठहरा रहै हैं। पर जेल जाने तथा अपने कर्मों की सजा भुगतने तैयार नही हैं।इसीलिए आपनी राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग कर कानून बदलवाने का कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आम भारतीय स्त्री पुरुष अपने निजी संबंधों खास कर यौन संबंधों में इस प्रकार की जड़ता स्वीकार नही करते। इसके तीन उदाहरण पिछले एक सप्ताह में देखने को मिले।

बुधवार, 23 जून 2010

भोपाल गैस पीड़ितों को न्याय

मंत्री समूह ने आखिरकार अपनी रपट प्रधान मंत्री को दे दी और उमीद के अनुरूप ही अपने सुझाव दिये। मंत्री समूह को दाव जोंस के विरुद्ध जाने की हिम्मत ही नहीं थी। अतः 25 साल बाद भोपाल का जहरीला कचरा अपने खर्चे पर निपटाने का सुझाव दे डाला। ओबामा जैसी शिद्दत से मुआवजा वसूलने का माद्दा इन मंत्रियों के पास होता तो क्या आज हमारे देश की यह हालत होता।

शुक्रवार, 7 मई 2010

प्रतीकों की राजनीति

प्रतीकों की राजनीति

पूंजीवाद, साम्राज्यवाद की एक विशेषता प्रतीकों की राजनीति भी है। एक तरफ उपभोक्तावाद बढ़ाकर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध शोषण किया जाता है तो दूसरी ओर इन संसाधनों के विलुप्त होने का रोना भी रोया जाता है। इनके संरक्षण संवर्धन के लिए राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार, गोष्टियाँ होती हैं, कन्वैनशनों पर हस्ताक्षर होते हैं, दौड़ों का आयोजन होता है, दिवस मनाए जाते हैं, अभियान चलाए जाते हैं, कई महान विभूतियों को उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए पुरुस्कार दिये जाते हैं, कई स्वयंसेवी संगठनों को इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात

चूँकि संसाधनों की बरबादी नहीं थमती इसलिए इन सारे तमाशों के बावजूद हवा, पानी, नदियों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों, जड़ी-बूटियों,पेड़- पौधों तथा इन प्राकृतिक संसाधनों पर जीवित रहने वाले हाशिये पर रह रहे लोगों पर संकट बढ़ता जारहा है। संकट के बढ़ने के साथ साथ नए प्रतीकों के साथ नई राजनीति प्रारंभ हो जाती है।

अपने देश में इंदिरा गांधी ने गरीबी को सत्ता हथियाने का एक कारगर प्रतीक बनाया। याद कीजिये उस समय को। तब भी अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, तथा विभिन्न तबकों के गरीबों का आक्रोश नक्सलबाड़ी व अन्य जन आंदोलनों के माध्यम से उभर रहा था।इंदिरा गांधी इस प्रतीक को भुनाने इतनी सफल हुई कि आज भी बहुत गरीब ऐसे हैं जो विश्वास करते हैं कि वह गरीबों की हितैषी थी।

उदारीकरके बाद स्थिति दिन प्रतिदिन भयावह होती जारही है। जब अर्जुन सेनगुप्ता की रपट आई थी तब खाद्य पदार्थों में महंगाई एक निश्चित रफ्तार से बढ़ रही थी। तब भी 79 प्रतिशत लोग 20 रुपया रोज की आमदनी में कैसे गुजारा कर रहे होंगे यह ऊपर वाला ही जानता है। आज जब महंगाई आसमान छू रही है उन लोगों का क्या हाल होगा यह इस देश की नैया खेवनहारों की चिंता का विषय नहीं है। हाँ कुछ नए प्रतीक जरूर आगए हैं।

जैसे सादगी बरतने का प्रतीक। दलितों के घर रात विताने का प्रतीक। या आंबेडकर जयंती मनाने की प्रतीक।या बिहार में महादलित का सगूफा। दलितों के नाम का जाप अब हर राजनीतिक दल करता है। सभी राजनीतिक दलों को भली प्रकार मालूम है कि दलितों, आदिवासियों तथा गरीब गुरबाओं को बल पर सत्ता तभी तक हथियाई जा सकती है जब तक वे हासिये पर रहें और हासिये से मुख्यधारा में लाने का सपना दिखा कर ही उनके वोट लिए जासकते है। इसीलिए एक ओर उनको गरीब बनाए रखने के लिए नीतियाँ लागू की जाती हैं। दूसरी ओर गरीबों के हितों की रक्षा के सूझाव देने वाली समितियों और कमिशनों की रपटों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है या उन समितियों और कमिशनों का कार्यकाल ही समाप्त कर दिया जाता है या गरीबों के हित में चल रहे कार्यक्रमों को भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया जाता है। आखिर भ्रष्ट भी तो वही हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। यदि कोई राजनीतिक दल भ्रष्टों सरक्षण देना बंद कर दे तो उसके शासन काल में भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा।पर क्या बिना भ्रष्टाचार के कोई राजनीतिक दल जिंदा रह पाएगा

प्रतीकों की राजनीति

पूंजीवाद, साम्राज्यवाद की एक विशेषता प्रतीकों की राजनीति भी है। एक तरफ उपभोक्तावाद बढ़ाकर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध शोषण किया जाता है तो दूसरी ओर इन संसाधनों के विलुप्त होने का रोना भी रोया जाता है। इनके संरक्षण संवर्धन के लिए राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेमिनार, गोष्टियाँ होती हैं, कन्वैनशनों पर हस्ताक्षर होते हैं, दौड़ों का आयोजन होता है, दिवस मनाए जाते हैं, अभियान चलाए जाते हैं, कई महान विभूतियों को उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए पुरुस्कार दिये जाते हैं, कई स्वयंसेवी संगठनों को इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात

चूँकि संसाधनों की बरबादी नहीं थमती इसलिए इन सारे तमाशों के बावजूद हवा, पानी, नदियों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों, जड़ी-बूटियों,पेड़- पौधों तथा इन प्राकृतिक संसाधनों पर जीवित रहने वाले हाशिये पर रह रहे लोगों पर संकट बढ़ता जारहा है। संकट के बढ़ने के साथ साथ नए प्रतीकों के साथ नई राजनीति प्रारंभ हो जाती है।

अपने देश में इंदिरा गांधी ने गरीबको सत्ता हथियाने का एक कारगर प्रतीक बनाया। याद कीजिये उस समय को। तब भी अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, तथा विभिन्न तबकों के गरीबों का आक्रोश नक्सलबाड़ी व अन्य जन आंदोलनों के माध्यम से उभर रहा था।इंदिरा गांधी इस प्रतीक को भुनाने इतनी सफल हुई कि आज भी बहुत गरीब ऐसे हैं जो विश्वास करते हैं कि वह गरीबों की हितैषी थी।

उदारीकरके बाद स्थिति दिन प्रतिदिन भयावह होती जारही है। जब अर्जुन सेनगुप्ता की रपट आई थी तब खाद्य पदार्थों में महंगाई एक निश्चित रफ्तार से बढ़ रही थी। तब भी 79 प्रतिशत लोग 20 रुपया रोज की आमदनी में कैसे गुजारा कर रहे होंगे यह ऊपर वाला ही जानता है। आज जब महंगाई आसमान छू रही है उन लोगों का क्या हाल होगा यह इस देश की नैया खेवनहारों की चिंता का विषय नहीं है। हाँ कुछ नए प्रतीक जरूर आगए हैं।

जैसे सादगी बरतने का प्रतीक। दलितों के घर रात विताने का प्रतीक। या आंबेडकर जयंती मनाने की प्रतीक।या बिहार में महादलित का सगूफा। दलितों के नाम का जाप अब हर राजनीतिक दल करता है। सभी राजनीतिक दलों को भली प्रकार मालूम है कि दलितों, आदिवासियों तथा गरीब गुरबाओं को बल पर सत्ता तभी तक हथियाई जा सकती है जब तक वे हासिये पर रहें और हासिये से मुख्यधारा में लाने का सपना दिखा कर ही उनके वोट लिए जासकते है। इसीलिए एक ओर उनको गरीब बनाए रखने के लिए नीतियाँ लागू की जाती हैं। दूसरी ओर गरीबों के हितों की रक्षा के सूझाव देने वाली समितियों और कमिशनों की रपटों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है या उन समितियों और कमिशनों का कार्यकाल ही समाप्त कर दिया जाता है या गरीबों के हित में चल रहे कार्यक्रमों को भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया जाता है। आखिर भ्रष्ट भी तो वही हैं जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। यदि कोई राजनीतिक दल भ्रष्टों सरक्षण देना बंद कर दे तो उसके शासन काल में भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा।पर क्या बिना भ्रष्टाचार के कोई राजनीतिक दल जिंदा रह पाएगा

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मायावती मनुवादियों के रास्ते पर ही तो चल रही हैं।

15-16 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती ने अपने विरोधियों तथा मनुवादी समाज को दिल भर के चिढ़ाया। 15 मार्च को माया को (बकौल कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह के) दस मीटर लंबी हजार रुपये के नोटों की माला पहनाई गई थी। एक रपट के अनुसार इस माला में 50000 नोट लगे थे। सारे टी वी चैनल हतप्रभ थे। एक ऐंकर ने तो स्वामी रामदेव से वादा भी ले लिया कि राजनीति में आने के बाद स्वामी जी नोटों की माला नहीं पहनेंगे।(क्या वादा निभाने कभी कोई राजनीति में आता है?) राजनीतिज्ञों तथा मीडिया की हायतौबा को धत्ता बताते हुए मायावती ने 16 मार्च को फिर 18 लाख रुपये की नोटों की माला पहन ली। साथ ही अपने समर्थकों से घोषणा भी करवा दी कि भविष्य में मायावती का स्वागत उनके दल के लोग नोटों की माला पहना कर ही करेंगे।

15-16 की शाम प्राइम टाइम में करीब करीब सभी चैनलों ने माला प्रकरण में बहस मुबाहिसे करवाईं। इन बहसों में भाग लेने वाले अधिकतर विशेषज्ञ भी नोटों की माला प्रकरण से क्षुब्ध थे। केवल दलित विशेषज्ञों को ही इसमें कुछ भी अनुचित नहीं लग रहा था। इससे पहले रैली के लिए नगर की साज सज्जा, प्रकाश तथा रैली भाग लेने वालों के खाने पीने के विस्तृत इंतजाम पर भी अंगुली उठ रही थी। कारण यह सब सरकारी पैसे से हो रहा था। क्या लालू के महा रैला निजी धन खर्च कर होते थे? या अन्य सत्ताशीन दल अपने पैसे से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। इंदौर में बीजेपी का सम्मेलन किसके पैसे से हुआ?इससे पहले भी मायावती के पार्क निर्माण, मूर्तियाँ लगाने में किए गए सरकारी धन की बरबादी पर, जन्म दिन मनाने के लिए धन उगाही, तथा जन्म दिन पर हीरे जवाहरात पहनने पर मीडिया में हाय तौबा होती रही है।

मैं मायावती की न समर्थक हू न ही प्रशंसक। पर इतना जानती हू कि मायावती वही कर रही हैं जो मनुवादी परंपरा के अनुकूल है। अपने कदम को सही ठहराने के लिए वह अन्य दलों तथा उनके नेताओं के उदाहरण देती है। अभी रविवार को ही एक राष्ट्रीय अखवार के संपादक ने दिल्ली की मुख्य मंत्री के घर की सज्जा तथा लचीज खाने की तारीफ लिखी थी। मैं मानती हूँ कि धन के भौंडे प्रदर्शन और सुरुचिपूर्ण सजावट में फर्क है। परंतु सादा जीवन की परिचायक तो दोनों में से एक भी नहीं है। आज राजनेताओं में ममता बैनर्जी, अशोक गहलोत, ए.के ऐन्टनी जैसे अंगुलियों में गिने जाने वाले नेताओँ को ही मीडिया में सादगी का जीवन व्यतीत करने वालों में शामिल करता है। और तो सभी राजसी ठाट में रहते हैं। उस राजसी ठाट के कुछ नजारे वर्तमान सरकार के दो विदेश मंत्रियों की फिजूल खर्ची में सामने आए और मीडिया के दबाव में उन्हें पाँच सितारा होटल छोड़ने पड़े। यहाँ मीडिया के व्यवहार में एक भिन्नता साफ नजर आती है। सवर्ण नेताओं के मामले में मीडिया सवाल उठाता है, दबाव भी बनाता है पर मामले को उस तरह तूल नहीं देता जिस तरह दलित, आदिवासी नेताओं के अप्रत्याशित मनुवादी व्यवहार को देता है।

मायावती माला प्रकरण से प्रधानतया चार मुद्दे सामने आए। पहला सरकारी तंत्र व धन की बरबादी, दूसरा धन का भौंडा प्रदर्शन, तीसरा धन का स्रोत व चौथा नोटों को तोड़ना मरोड़ना। इसके अलावा गरीबों के हितार्थ कार्यक्रम चलाने के बजाय मूर्तियाँ बनवाने के लिए भी आलोचना होती रहती है। मायावती भर्तसना करने से पहले हमें अपने अंदर झाँकना होगा और खुद से पूछना होगा कि क्या आजाद भारत में तो हर कोई यह चारों काम करने आजाद नहीं है? संसद से लेकर सड़क तक हम में से हर कोई सरकारी तंत्र व धन की बरबादी करता रहता है। सड़क पर कोई हादसा हो जाए, अस्पताल में कोई मर जाए परिजन व आम जनता सार्वजनिक संपत्ति की तोड़ फोड़ कर ही अपना गुस्सा उतारती हैं। भारतीय सेना में कर्नल रहे कर्नल बैसला के नेतृत्व में चले गूजर आंदोलन के दौरान जिस तरह से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया जिस प्रकार से दूध सड़कों में बहाया गया उससे तो सुप्रीम कोर्ट तक दहल गया था। परंतु किसी ने नहीं कहा कि दूध को सड़क में बहाने के बजाय गरीबों में बाटा जा सकता था। राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय स्तर के नेता अपने साथियों के इस प्रकार के व्यवहार को सही ठहराते नहीं थकते। क्या सभी दलों के अध्यक्ष, सरकारों के मंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासक आदि आदि स्वयं अपने व अपने परिजनों के लिए जायज व नाजायज तरीके सारी सरकारी सुविधाएँ व ऊँचे पद नहीं जुटाते हैं? कुछ समय पहले अखबार में पढ़ने को मिला कि एक न्यायाधीश महोदय अपने सरकारी विदेशी दौरे में अपनी पत्नी के लिए भी वही सब सुविधाएँ चाह रहे थे जिसके वे स्वयं हकदार थे। पर कानून इसकी इजाजत नहीं दे रहा था इसलिए सारा विवाद होरहा था। 29, 3, 10 की जनसत्ता में संसद में रेलवे द्वारा चलाई जा रही कैंटीनों में सरकारी अनुदान से परोसे जा रहे सस्ते भोजन के बारे में खबर छपी थी। इन कैंटीनों के प्रबंधन को लिए बनी सभी दलों के सांसदों की समिति को बाजार में बढ़ती कीमतों के अनुसार इन कैंटीनों में परोसे जाने वाले सामान की कीमतों को बढ़ाने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई।

सांसद, विधायक व स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधि सदन में बहस के माध्यम से सरकार को घेरने के बजाय सदन की कार्यवाही बाधित कर अपना विरोध प्रकट करते हैं। सदन की कार्यवाही नहीं चलने देने से कितने सरकारी धन की बरबादी होती है? जो राजनीतिक दल मायावती की इस सवाल पर आलोचना कर रहे थे उनको कभी भी यह चिंतन करने की आवश्यकता ही महसूस हुई कि वे और उनके दल के लोग किस तरह विभिन्न स्तरों की जन प्रतिनिधि सभाओं का काम बाधित कर कितना सरकारी धन और सुविधाओं का दुरुपयोग करते रहे हैं तथा कितने सरकारी धन का दुरुपयोग इन प्रतिनिधि सभाओं के सत्रों से अनुपस्थित होकर करते हैं। यह हकीकत है कि हर जन प्रतिनिधि सभा के सत्र में कोरम का टोटा हमेशा रहता है।

धन का भौंडा प्रदर्शन तो सदियों पुरानी बीमारी है तथा समाज का हर वर्ग इससे ग्रसित है। अभी हरिद्वार के कुंभ मेले में विभिन्न अखाड़ों ने जो धन संपत्ति का प्रदर्शन किया उसके सामने तो राजनेताओं की संपत्ति फीकी लग रही थी। जो साधु संत सांसारिक मोह माया त्याग कर ईश्वर प्राप्ति ही अपना जीवन लक्ष्य बना चुके हों उनके स्नान को शाही स्नान क्यों कहा जाता है? मुझे समझ नहीं आता। दूसरा, सबसे पवित्र महूर्त को क्यों संतो के स्नान के लिए आरक्षित किया गया है? यह भी मेरी मोटी बुद्धि को समझ नहीं आता। आम धार्मिक गृहस्थ तो संतो की तरह कठिन तप कर मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए शायद उसे मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे पवित्र महूर्त में स्नान करने की अधिक आवश्यकता होती है।जबकि संत तो मोक्ष प्राप्त कर चुके होते हैं। उनके तो स्पर्श मात्र से ही हर जल पवित्र हो जाता है। कहने का मतलब है कि आदि काल से ही हमारी पूरी व्यवस्था असमानता व खास के लिए खास सुविधा आरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है। मायावती क्या कर रही है केवल इतना ही कि इस व्यवस्था की चादर को अपने सिर पर भी तान रही है। जब ऊपरी जमात यह करती है तो हमें कोई परेशानी नहीं होती परंतु जब सदियों से दलित बनाए गए लोग करते हैं तो हमें मिर्ची लगती है। हमें गरीब गुरबे याद आते हैं।

हमारे धार्मिक संस्थानों में धन का जब प्रदर्शन होता है तब भी हमें गरीब याद नहीं आते। मुंबई में गणेश उत्सव के बाद हर साल चढ़ावे की खबरें मीडिया में चटकारे ले ले कर बताई जाती हैं। बहुमूल्य रत्न जड़ित आभूषणों के फोटो दिखाए जाते हैं। या अक्सर धनी लोगों द्वारा रत्न जड़ित मुकुट या कुर्सी का चढ़ावा या करोड़ों बड़े बड़े मंदिरों में चढ़ावा मीडिया में खबर बनता है। पर कहीं यह प्रश्न नहीं उठती कि भारत जैसे गरीब देश में इस पूँजी को गरीबी, कुपोषण दूर करने के लिए क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए? यह उस धर्म के अनुयाइयों का हाल है जिस धर्म में जीव मात्र में भगवान के दर्शन होते हैं। पर हम जीव मात्र की पूजा करने के बजाय धन की पूजा करते हैं।

मायावती ने लखनऊ नौएडा में पार्क बनाए मूर्तियाँ लगाई तो उत्तर प्रदेश के गरीब व पिछड़े, समाज के सभी प्रबुद्ध जनों को याद आए। लेकिन मुलायम सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब सैफई में क्या कर रहे थे? या अन्य दलों के नेता अपने प्रतीकों पर कितना सार्वजनिक धन संपत्ति बरबाद करते हैं? क्या गरीब या गरीबी केवल उत्तर प्रदेश में है। महाराष्ट्र में कांग्रेस, बीजेपी शिव सेना क्या प्रतीकों की राजनीति नही करते क्या वहाँ गरीब नहीं है।(14वीं लोक साभा व महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव से ऐन पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में जो शिवाजी की विशालकाय मूर्ति लगाने की घोषणा की थी उस समय महाराष्ट्र के गरीबों या मुंबई के गरीबों की याद किसी ने सरकार को नहीं दिलाई।) दिल्ली में राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक बनाने में जो संसाधन लगाए गए यदि उन संसाधनों का उपयोग में हाशिये पर रह रहे लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए किया जाता तो क्या वह उन नेताओं को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होती? दिल्ली में रह रहे अधिकतर लोगों के पास भी जीवन की मूल सुविधाएँ नहीं हैं।

सिविल सोसाइटी भी गरीबों को हासिये में रखने में विश्वास करती है। पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में भारत के लगभग सभी बड़े शहरों में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उद्योगों को बंद कर दिया गया। लाखों मजदूर बेरोजगार होगए। इसी बहाने गरीबों की झुग्गियाँ तोड़ी जाती हैं। सिविल सोसाइटी ने पर्यावरण के नाम पर इस कदम को सराहा। परंतु जब धार्मिक उत्सवों के बाद मूर्ति व पूजा सामग्री विसर्जन से नदियों, तालावों व समुद्र का पानी प्रदूषित होता है। फटाकों से ध्वनि प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषण होता है। सिविल सोसाइटी आँख मूँद लेती है। मीडीया में हर साल पिछले साल से बड़ी मूर्तियाँ या सबसे बड़ी मूर्ति लगाने का दावा धार्मिक संस्थाएँ करती हैं। श्रद्धा में डूबे लोगों से पर्यावरण प्रदूषण के बारे में कोई नहीं पूछता। यहाँ पर भी खास लोगों के लिए खास सुविधाएं वाला सिद्धांत ही लागू होता है। बूढ़े़, बीमार व अशक्त पर इस पर्यावरण प्रदूषण का असर सर्वाधिक पड़ता है। बूढ़े़, बीमार व अशक्त भी तो एक तरह से हाशिये के लोग ही तो हैं। गरीबों में इनकी तादाद अधिक होती है। हम मानव कल्याण की बात तो करते हैं पर काम नहीं। हमें भी गरीब को तभी याद करते हैं जब मायावती व अन्य दलित धन प्रदर्शन करते हैं।

मैं मायावती का समर्थन या बचाव नहीं कर रही हूँ। गलत काम गलत है चाहे गलती कोई भी करे। परंतु यदि गल्ती करना हमारी आदत बन गई हो और इसको सामाजिक मान्यता मिल गई हो तो मामला गंभीर हो जाता है। हमें समरथ को नहीं दोष गोसाईं वाली मानसिकता को समाप्त करना होगा। मायावती से पहले सदियों से चले आ रहे समाज के उन कर्णधारों को खास से आम बनना होगा जिनको मायावती के खास बनने पर आम जन की याद आती है। ऐसा किये बगैर मायावती की आलोचना करना महज अपने मनुवादी दुराग्रहों को अभिव्यक्ति देना ही होगा।