मंगलवार, 13 जुलाई 2010
औरत और परिवार
वह जल्दी में है।उसको अपने प्रेमी की शादी रुकवाने में अति शीघ्र मदद चाहिए।उसकी कोई महिला मित्र भी नहीं है जो उसको ढ़ढ़स बधा सके। वह जिसको भी अपनी व्यथा सुनाएगी वही उसको नीचा देखेगी।मायके वालों से भी कोई संवाद नही है। अलबत्ता अपने पड़ोसी पुरुषों से उसको सहानुभूति तथा मदद का वादा मिल रहा है।एक ने गांव जाकर उसके प्रेमी का अपहरण कर उसको सौंप दिने का वादा किया। वह उस पड़ौसी के साथ गाव जाने तैयार होगई।
यहीं से मेरी चिंता शुरु होगई।मैंने उसको कानून अपने हाथ में नहीं लेने की सलाह दी। उसको हो सकने वाले खतरों के बारे मे बताया। लेकिन वह अपना जिद पर अड़ी रही। मेरी चिंता बढ़ गई। मैं उसे धैर्य रखने व ठंडे दिमाग से सोच सम कर ही अगला कदम उठाने की सलाह देने लगी। पर बह कहां मानने वाली थी।आखिर उसने अल्टीमेटम दे दिया कि वह चार दिन की छुट्टी लेकर उस पड़ोसी के साथ गांव जाएगी और हर हालत अपने प्रेमी को साथ लेकर आएगी।
जब वह अपना हिसाब मांगने आई तो संयोग से एक सहेली बैठी थी जिसने काफी समय तक काउनसिलिंग का काम किया है। वह बार बार उस महिला से उसके मायके वालों के बारे में पूछ रही थी। उसको समझ में नही आरहा था कि प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर वह दिल्ली क्यों आई मायके क्यों नहीं गई। खैर बड़ी मुस्किल से उसने अपना इरादा बदला और यहीं से अपना प्रेमी के विरुद्ध कागजी लड़ाई लड़ने तैयार हो गई।पर यह पूरी कवायद मन में कई सवाल छोड़ गई। मसलन् क्या उसको गांव जाने से रोकना व अपराधियों की मदद से अपने प्रेमी को हासिल करने से रोकना सही था य़ा गलत।या औरत का परिवार से रिस्ते की लक्ष्मण रेखा क्या है। परिवार तो तभी पीछे खड़ा होगा जब स्त्री के हित व परिवार के हित समान होंगे। अक्सर दोनों के आपसी हितो में द्वंद उत्पन्न हो जाता है। मसलन् दहेज का मामला।अक्सर माता पिता दहेज के लोभी परिवारों के अत्याचार सहने बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।जिनका अंजाम कई बार दहेज के लिए की गई हत्या होता है। ऐसे में अगर समाज भी औरत से उसके मायके वालों के बारे में तीखे सवाल पूछना कितना सही है।
उस पड़ौसी पर शक करना कितना सही है। क्या कोई पुरुष निस्वार्थ किसी स्त्री की सहायता के लिए कानून हाथ में लेने की हद तक जा सकता है। वह गांव नही गई और यहां सुरक्षित है। जीने के लिए उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है। यह संतोष उपरोक्त सवालों से धुधला हो गया है।क्या पितृसत्ता के चुंगल से निकलना इतना कठिन है कि मैं स्वयं तो नहीं उबर पाई यदि कोई उबरने की कोशिश भी करती है तो अनिष्ट की संभावनाओं से कांप कर उसके भी पर बांध देने की कोशिश करती हूं।
गुरुवार, 24 जून 2010
राखी व भाई दूज धूमधाम से मनाने वाले इस देश में धर्म और संस्कृति बचाने के नाम पर बहनों तथा बेटियों की हत्या परिवार, समाज,व पंचायत की सहमति या आह्वान पर हो रही है। समाज के स्वंयभू ठेकेदार इन हत्याओं को ताल ठोक कर सही ठहरा रहै हैं। पर जेल जाने तथा अपने कर्मों की सजा भुगतने तैयार नही हैं।इसीलिए आपनी राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग कर कानून बदलवाने का कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आम भारतीय स्त्री पुरुष अपने निजी संबंधों खास कर यौन संबंधों में इस प्रकार की जड़ता स्वीकार नही करते। इसके तीन उदाहरण पिछले एक सप्ताह में देखने को मिले।
उदाहरण एक--
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
उदाहरण दो
ख का पति ख को मारने के बाद उसको मरा जान कर भाग गया। अभी तक वापस नहीं आया। उसके पड़ोसी और दोस्त ने डाक्टर के पास समय पर ले जाकर उसकी जान बचाई। पूरा इलाज कराया। आज वे दोनों साथ साथ रह रहे हैं। उनके बच्चे भी हैं।
उदाहरण तीन
ग विधवा है उसके दो बेटे हैं जो अपनी दादी के के पास हैं। वह अपने दोस्त के साथ शहर आगई है फिर से जिंदगी बसाने। संघर्ष हैं पर जीने की तमन्ना भी है जो रो रो कर किस्मत को कोसने से हजार गुना अच्छा है।
असल में ब्राह्मणी पितृसत्ता को भारतीय पितृसत्ता बताना अंग्रेजों ने प्रारंभ किया। हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों कानूनों में एक रूपता लाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने बनारस के पंडितों की एक समिति बनाई। इस समिति ने हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर जो नियम सुझाए उनको हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों के तौर पर मान्यता दे दी गई। यहां यह बताना आवश्यक है कि तब हिंदू धर्म शास्त्रों की वर्जनाएं ब्राह्मणों पर ही लागू होती थी। अंग्रेजी कानून व न्याय व्यवस्था ने इसे सारे हिंदू समाज पर थोप दिया।आज धर्म के ठेकेदार इसे भारतीय के नाम पर सबके ऊपर थोपने पर आमदा हैं।
परिवार की इज्जत की खातिर -1
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
परिवार की इज्जत की खातिर
बुधवार, 23 जून 2010
भोपाल गैस पीड़ितों को न्याय
शुक्रवार, 7 मई 2010
प्रतीकों की राजनीति
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पूंजीवाद,
अपने
उदारी
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