मंगलवार, 8 मार्च 2011
महिला दिवस 2011
आज महिला दिवस है। शहरों में मध्य वर्ग की कुछ महिलाएं इस दिन कोई न कोई कार्यक्रम करती हैं। या सेमिनार, बहस तथा मुबाहिसा होते हैं। परन्तु क्या अस्तित्व के संकट से जूझती आदिवासी महिलाएं, या पति की आत्महत्या के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी किसान महिलाएं किसी कार्यक्रम या या बहस तथा मुबाहिसा की चिंता का विषय कभी बनी हैं। मेरी जानकारी में नहीं। आज मुझे पुन्य प्रसून बाजपेई की छत्तीसगड़ में पुलिस ज्यादतियों की शिकार आदिवासी महिलाओं पर लिखी रपट याद आरही हैं। इस पर उन्हें पुरस्कार तो मिल गया। पर सभ्य समाज जिसको शायद सिविल सोसाइटी कहते हैं ने उन पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कोई मुहिम नहीं छेड़ी। चूंकि दमन की मुहिम अबिलम्ब चल रही है। इतने सालों में कई और पीडित आदिवासी महिलाओं नाम उन भुग्तभोगी महिलाओं के साथ जुड़ गए होंगे।पर समाज न तब जागा था न अब जागा है। आदिवासी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरद्ध न महिला संगठन आवाज उठाते हैं न ही महिला आयोग की ये महिलाएं प्रार्थमिकता होती हैं और न ही अनुसूचित जाति अनुसुचित जनजाति आयोग इन महिलाओं के साथ हो रही ज्यादतियों पर कोई प्रतिक्रिया जताते हैं। महिला आंदोलनों का यह दुर्भाग्य रहा है कि बहनापे के नारे के बावजूद यह मध्य वर्ग से नीचे नहीं खिसक पाए हैं।जीवन की मूल सुविधाएं रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं से महरूम आम गरीब, दलित शोषित महिलाएं, पग पग पर अस्तित्व के संकट से जूझती हर प्रकार की यौन हिंसा का शिकार आदिवासी महिलाओं के संघर्ष के मुद्दे यदि महिला आंदोलन या संगठनों की प्रार्थमिकता होती तो सुषमा स्वराज को महिला आरक्षण की भीख लोक सभा में पुरुष सदस्यों से नहीं मांगनी पड़ती। देश की 48 प्रतिशत महिलाएं 33 प्रतिशत आरक्षण पाने का इंतजार पिछले डेढ़ दशक से कर रही हैं और आज नेता विपक्ष इसके लिए भीख मांग रही है, इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या होसकती है। 80 प्रतिशत गरीब महिलाओं के संघर्षों से दूर ये महिलाए 33 प्रतिशत आपक्षण पाकर क्या सशक्त हो पाएंगी।
सोमवार, 17 जनवरी 2011
ईमानदारी का पैमाना
आजकल सत्ता के गलियारों में सर्वत्र भ्रष्टाचार की बयार बह रही है।ऐसा लगता है कि सत्ताशीनों के लिए ईमानदारी से शासन करना संभव ही नहीं है। यह सब तब हो रहा है जब हमारे प्रधान मंत्री की निजी ईमानदारी पर कोई शक नही करता। उन पर कोई कमिशनखोरी की इल्जाम उनके धुर विरोधी भी नहीं लगाते। समझ में नहीं आता प्रधानमंत्री इतने बेइमानों को झेलने के लिए क्य़ो मजबूर हैं.उनकी पिछली तथा वर्तमान मंत्री परिषद में धूमिल छबि के लोग मंत्री बने। ठीक है गठबंधन सरकार है। पर क्या एक ईमानदारी प्रधान मंत्री अपने सहयोगियों के सामने यह शर्त तो रख ही सकता है कि वह धूमिल छवि वाले मंत्रियों का नेत्रत्व नहीं करेगा। मनमोहन सिंह की स्थिति तो और भी मजबूत थी। जनता ने उनके नहीं श्रीमती सोनियां गांधी के नेत्रत्व को वोट दिया था। ऐसे में मनमोहन सिंह यह शर्त अपनी पार्टी के सामने भी रख सकते थे। पर ऐसा नहीं हुआ। पूरे पांच साल वह दागी मंत्रियों को मंत्रि परिषद में रखने का दंश झेलते रहे।अब जो होरहा है सबके सामने है। मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचारी शासको, प्रशासकों के सामने लाचार नजर आरही है। ऐसे में कई सवाल मन में आरहे हैं. पहला क्या ईमानदार इंसान इतना कमजोर होता है कि बेइमान को झेलना उसकी मजबूरी होती है। मनमोहन सिंह तो चुनाव भी कभी नहीं लड़े हैं।चुनाव खर्च की चिंता तो उन्हें कभी नही रही फिर क्यों वह यह शर्त नहीं रखा पाए उनके साथी ईमानदारी की मिशाल कायम रखेंगे अन्यथा वे सरकार नहीं चलाएगे। इस देश में एक मोहनदास करमचंद गांधी हुए थे। वह तो अपनी शर्त पर ही आंदोलन सत्याग्रह आंदोलन चलाते थे। शर्त टूटी नहीं कि उन्होंने आंदोलन वापस लिया। आज हम उनको भूल गए हैं।याद करते तो देश को आधुनिक सभ्यता की आग में नहीं झोंकते
दूसरा प्रश्न ईमानदारी की प्रकृति से जुड़ा है। क्या बेइमानी नजरअंदाज करना ईमानदारी के दायरे में नहीं आता। जिस प्रकार से अमेरिका के साथ परमणु संधि के लिए संसद में समर्थन जुटाया गया क्या वह ईमानदारी के दायरे में आता है।या परमाणु संधि से होने वाले लाभों का जो झुनझुना जनता को दिखाया गया क्या वह इमानदारी थी। या विकास के नाम पर जो विनाश होने दिया जारहा है वह इस देश तथा इसका जनता के साथ ईमानदारी है। बहुत सारे सवाल हैं पर उत्तर नही मिलता। कई बार सोचती हूं कि सत्यवादी हरीश चंद्र ने भी तो कुछ वादे शादी के समय सात फेरे लेते समय अपनी पत्नी से किये होंगे। पर जब परीक्षा की घड़ी आई तो उन पत्नी को दिये गए उन वादों का क्या हुआ। क्या ईमानदारी केवल मजबूत के संदर्भ में ही होनी चाहिये। अमेरिका को दिये गए वादे तो इस देश व जनता को हर कष्ट देकर निभाएं पर संविधान में इस देश के नागरिकों को दिये गए वादों का क्या । गिलास आधा भरा आधा खाली
दूसरा प्रश्न ईमानदारी की प्रकृति से जुड़ा है। क्या बेइमानी नजरअंदाज करना ईमानदारी के दायरे में नहीं आता। जिस प्रकार से अमेरिका के साथ परमणु संधि के लिए संसद में समर्थन जुटाया गया क्या वह ईमानदारी के दायरे में आता है।या परमाणु संधि से होने वाले लाभों का जो झुनझुना जनता को दिखाया गया क्या वह इमानदारी थी। या विकास के नाम पर जो विनाश होने दिया जारहा है वह इस देश तथा इसका जनता के साथ ईमानदारी है। बहुत सारे सवाल हैं पर उत्तर नही मिलता। कई बार सोचती हूं कि सत्यवादी हरीश चंद्र ने भी तो कुछ वादे शादी के समय सात फेरे लेते समय अपनी पत्नी से किये होंगे। पर जब परीक्षा की घड़ी आई तो उन पत्नी को दिये गए उन वादों का क्या हुआ। क्या ईमानदारी केवल मजबूत के संदर्भ में ही होनी चाहिये। अमेरिका को दिये गए वादे तो इस देश व जनता को हर कष्ट देकर निभाएं पर संविधान में इस देश के नागरिकों को दिये गए वादों का क्या । गिलास आधा भरा आधा खाली
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
औरत और परिवार
वह विवाहित है। उसके दो बच्चे भी हैं। पर वह अपने घर से अपने प्रेमी के साथ भाग कर आई है। इसलिए वह आम भारतीय महिला तो नहीं है जो अपने बच्चों के लिए कलपती रहे। अपना जीवन अपने प्रेमी के साथ मजे से जीना चाहती है। यहां पर एक पेच आगया है।उसका प्रेमी जैसा अक्सर होता है उसको छोड़कर अपने गांव वापस चला गया है। सुना है शादी रचा रहा है। उस पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा है।उसकी सपनों का संसार टूट गया है।वह किसी भी हालत में अपने प्रेमी को हासिल करना चाहती है। परंतु उसके पास शादी का कोई सबूत नहीं है। हां दस महिने वह आदमी उसका पति बन कर रहा है यह गवाही काफी लोग देने तैयार हैं।परंतु जिस संसथा में वह मदद मांगने गई वह इसको ज्यादा तवज्जों नहीं दे रही है। हां मदद का बादा नहीं ठुकराया है।
वह जल्दी में है।उसको अपने प्रेमी की शादी रुकवाने में अति शीघ्र मदद चाहिए।उसकी कोई महिला मित्र भी नहीं है जो उसको ढ़ढ़स बधा सके। वह जिसको भी अपनी व्यथा सुनाएगी वही उसको नीचा देखेगी।मायके वालों से भी कोई संवाद नही है। अलबत्ता अपने पड़ोसी पुरुषों से उसको सहानुभूति तथा मदद का वादा मिल रहा है।एक ने गांव जाकर उसके प्रेमी का अपहरण कर उसको सौंप दिने का वादा किया। वह उस पड़ौसी के साथ गाव जाने तैयार होगई।
यहीं से मेरी चिंता शुरु होगई।मैंने उसको कानून अपने हाथ में नहीं लेने की सलाह दी। उसको हो सकने वाले खतरों के बारे मे बताया। लेकिन वह अपना जिद पर अड़ी रही। मेरी चिंता बढ़ गई। मैं उसे धैर्य रखने व ठंडे दिमाग से सोच सम कर ही अगला कदम उठाने की सलाह देने लगी। पर बह कहां मानने वाली थी।आखिर उसने अल्टीमेटम दे दिया कि वह चार दिन की छुट्टी लेकर उस पड़ोसी के साथ गांव जाएगी और हर हालत अपने प्रेमी को साथ लेकर आएगी।
जब वह अपना हिसाब मांगने आई तो संयोग से एक सहेली बैठी थी जिसने काफी समय तक काउनसिलिंग का काम किया है। वह बार बार उस महिला से उसके मायके वालों के बारे में पूछ रही थी। उसको समझ में नही आरहा था कि प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर वह दिल्ली क्यों आई मायके क्यों नहीं गई। खैर बड़ी मुस्किल से उसने अपना इरादा बदला और यहीं से अपना प्रेमी के विरुद्ध कागजी लड़ाई लड़ने तैयार हो गई।पर यह पूरी कवायद मन में कई सवाल छोड़ गई। मसलन् क्या उसको गांव जाने से रोकना व अपराधियों की मदद से अपने प्रेमी को हासिल करने से रोकना सही था य़ा गलत।या औरत का परिवार से रिस्ते की लक्ष्मण रेखा क्या है। परिवार तो तभी पीछे खड़ा होगा जब स्त्री के हित व परिवार के हित समान होंगे। अक्सर दोनों के आपसी हितो में द्वंद उत्पन्न हो जाता है। मसलन् दहेज का मामला।अक्सर माता पिता दहेज के लोभी परिवारों के अत्याचार सहने बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।जिनका अंजाम कई बार दहेज के लिए की गई हत्या होता है। ऐसे में अगर समाज भी औरत से उसके मायके वालों के बारे में तीखे सवाल पूछना कितना सही है।
उस पड़ौसी पर शक करना कितना सही है। क्या कोई पुरुष निस्वार्थ किसी स्त्री की सहायता के लिए कानून हाथ में लेने की हद तक जा सकता है। वह गांव नही गई और यहां सुरक्षित है। जीने के लिए उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है। यह संतोष उपरोक्त सवालों से धुधला हो गया है।क्या पितृसत्ता के चुंगल से निकलना इतना कठिन है कि मैं स्वयं तो नहीं उबर पाई यदि कोई उबरने की कोशिश भी करती है तो अनिष्ट की संभावनाओं से कांप कर उसके भी पर बांध देने की कोशिश करती हूं।
वह जल्दी में है।उसको अपने प्रेमी की शादी रुकवाने में अति शीघ्र मदद चाहिए।उसकी कोई महिला मित्र भी नहीं है जो उसको ढ़ढ़स बधा सके। वह जिसको भी अपनी व्यथा सुनाएगी वही उसको नीचा देखेगी।मायके वालों से भी कोई संवाद नही है। अलबत्ता अपने पड़ोसी पुरुषों से उसको सहानुभूति तथा मदद का वादा मिल रहा है।एक ने गांव जाकर उसके प्रेमी का अपहरण कर उसको सौंप दिने का वादा किया। वह उस पड़ौसी के साथ गाव जाने तैयार होगई।
यहीं से मेरी चिंता शुरु होगई।मैंने उसको कानून अपने हाथ में नहीं लेने की सलाह दी। उसको हो सकने वाले खतरों के बारे मे बताया। लेकिन वह अपना जिद पर अड़ी रही। मेरी चिंता बढ़ गई। मैं उसे धैर्य रखने व ठंडे दिमाग से सोच सम कर ही अगला कदम उठाने की सलाह देने लगी। पर बह कहां मानने वाली थी।आखिर उसने अल्टीमेटम दे दिया कि वह चार दिन की छुट्टी लेकर उस पड़ोसी के साथ गांव जाएगी और हर हालत अपने प्रेमी को साथ लेकर आएगी।
जब वह अपना हिसाब मांगने आई तो संयोग से एक सहेली बैठी थी जिसने काफी समय तक काउनसिलिंग का काम किया है। वह बार बार उस महिला से उसके मायके वालों के बारे में पूछ रही थी। उसको समझ में नही आरहा था कि प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर वह दिल्ली क्यों आई मायके क्यों नहीं गई। खैर बड़ी मुस्किल से उसने अपना इरादा बदला और यहीं से अपना प्रेमी के विरुद्ध कागजी लड़ाई लड़ने तैयार हो गई।पर यह पूरी कवायद मन में कई सवाल छोड़ गई। मसलन् क्या उसको गांव जाने से रोकना व अपराधियों की मदद से अपने प्रेमी को हासिल करने से रोकना सही था य़ा गलत।या औरत का परिवार से रिस्ते की लक्ष्मण रेखा क्या है। परिवार तो तभी पीछे खड़ा होगा जब स्त्री के हित व परिवार के हित समान होंगे। अक्सर दोनों के आपसी हितो में द्वंद उत्पन्न हो जाता है। मसलन् दहेज का मामला।अक्सर माता पिता दहेज के लोभी परिवारों के अत्याचार सहने बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं।जिनका अंजाम कई बार दहेज के लिए की गई हत्या होता है। ऐसे में अगर समाज भी औरत से उसके मायके वालों के बारे में तीखे सवाल पूछना कितना सही है।
उस पड़ौसी पर शक करना कितना सही है। क्या कोई पुरुष निस्वार्थ किसी स्त्री की सहायता के लिए कानून हाथ में लेने की हद तक जा सकता है। वह गांव नही गई और यहां सुरक्षित है। जीने के लिए उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है। यह संतोष उपरोक्त सवालों से धुधला हो गया है।क्या पितृसत्ता के चुंगल से निकलना इतना कठिन है कि मैं स्वयं तो नहीं उबर पाई यदि कोई उबरने की कोशिश भी करती है तो अनिष्ट की संभावनाओं से कांप कर उसके भी पर बांध देने की कोशिश करती हूं।
गुरुवार, 24 जून 2010
परिवार की झूठी आन बान के लिए
राखी व भाई दूज धूमधाम से मनाने वाले इस देश में धर्म और संस्कृति बचाने के नाम पर बहनों तथा बेटियों की हत्या परिवार, समाज,व पंचायत की सहमति या आह्वान पर हो रही है। समाज के स्वंयभू ठेकेदार इन हत्याओं को ताल ठोक कर सही ठहरा रहै हैं। पर जेल जाने तथा अपने कर्मों की सजा भुगतने तैयार नही हैं।इसीलिए आपनी राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग कर कानून बदलवाने का कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आम भारतीय स्त्री पुरुष अपने निजी संबंधों खास कर यौन संबंधों में इस प्रकार की जड़ता स्वीकार नही करते। इसके तीन उदाहरण पिछले एक सप्ताह में देखने को मिले।
उदाहरण एक--
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
उदाहरण दो
ख का पति ख को मारने के बाद उसको मरा जान कर भाग गया। अभी तक वापस नहीं आया। उसके पड़ोसी और दोस्त ने डाक्टर के पास समय पर ले जाकर उसकी जान बचाई। पूरा इलाज कराया। आज वे दोनों साथ साथ रह रहे हैं। उनके बच्चे भी हैं।
उदाहरण तीन
ग विधवा है उसके दो बेटे हैं जो अपनी दादी के के पास हैं। वह अपने दोस्त के साथ शहर आगई है फिर से जिंदगी बसाने। संघर्ष हैं पर जीने की तमन्ना भी है जो रो रो कर किस्मत को कोसने से हजार गुना अच्छा है।
असल में ब्राह्मणी पितृसत्ता को भारतीय पितृसत्ता बताना अंग्रेजों ने प्रारंभ किया। हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों कानूनों में एक रूपता लाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने बनारस के पंडितों की एक समिति बनाई। इस समिति ने हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर जो नियम सुझाए उनको हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों के तौर पर मान्यता दे दी गई। यहां यह बताना आवश्यक है कि तब हिंदू धर्म शास्त्रों की वर्जनाएं ब्राह्मणों पर ही लागू होती थी। अंग्रेजी कानून व न्याय व्यवस्था ने इसे सारे हिंदू समाज पर थोप दिया।आज धर्म के ठेकेदार इसे भारतीय के नाम पर सबके ऊपर थोपने पर आमदा हैं।
राखी व भाई दूज धूमधाम से मनाने वाले इस देश में धर्म और संस्कृति बचाने के नाम पर बहनों तथा बेटियों की हत्या परिवार, समाज,व पंचायत की सहमति या आह्वान पर हो रही है। समाज के स्वंयभू ठेकेदार इन हत्याओं को ताल ठोक कर सही ठहरा रहै हैं। पर जेल जाने तथा अपने कर्मों की सजा भुगतने तैयार नही हैं।इसीलिए आपनी राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग कर कानून बदलवाने का कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आम भारतीय स्त्री पुरुष अपने निजी संबंधों खास कर यौन संबंधों में इस प्रकार की जड़ता स्वीकार नही करते। इसके तीन उदाहरण पिछले एक सप्ताह में देखने को मिले।
उदाहरण एक--
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
उदाहरण दो
ख का पति ख को मारने के बाद उसको मरा जान कर भाग गया। अभी तक वापस नहीं आया। उसके पड़ोसी और दोस्त ने डाक्टर के पास समय पर ले जाकर उसकी जान बचाई। पूरा इलाज कराया। आज वे दोनों साथ साथ रह रहे हैं। उनके बच्चे भी हैं।
उदाहरण तीन
ग विधवा है उसके दो बेटे हैं जो अपनी दादी के के पास हैं। वह अपने दोस्त के साथ शहर आगई है फिर से जिंदगी बसाने। संघर्ष हैं पर जीने की तमन्ना भी है जो रो रो कर किस्मत को कोसने से हजार गुना अच्छा है।
असल में ब्राह्मणी पितृसत्ता को भारतीय पितृसत्ता बताना अंग्रेजों ने प्रारंभ किया। हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों कानूनों में एक रूपता लाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने बनारस के पंडितों की एक समिति बनाई। इस समिति ने हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर जो नियम सुझाए उनको हिंदू धर्मावलंबियों के सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियमों के तौर पर मान्यता दे दी गई। यहां यह बताना आवश्यक है कि तब हिंदू धर्म शास्त्रों की वर्जनाएं ब्राह्मणों पर ही लागू होती थी। अंग्रेजी कानून व न्याय व्यवस्था ने इसे सारे हिंदू समाज पर थोप दिया।आज धर्म के ठेकेदार इसे भारतीय के नाम पर सबके ऊपर थोपने पर आमदा हैं।
परिवार की इज्जत की खातिर -1
उदाहरण एक--
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
क कुछ साल पहले मुझे घर के काम काज में मदद करती थी। उसकी तीन बेटियां थी। वह बहुत दुखी रहती थी। कारण उसका पति अपनी सारी कमाई नशे पते में बरबाद कर देता था।अभी उसकी एक सहेली ने बताया कि क ने अपना नशेड़ी पति छोड़ दिया है। अपने तीनों बेटियों के साथ वह किसी अंय पुरुष के साथ रहने लग गई। उसका अब एक बेटा भी है।ब्राह्मणी पितृसत्ता के झंडाबरदारों को नारी की यह स्वायत्ता रास नहीं आएगी। अतः वे इसे अधार्मिक अनैतिक अभारतीय कहेंगे।परंतु यह स्वतंत्रता आम भारतीय स्त्री पुरुष ( जो अंग्रेजी से बिलकुल भी वाकिफ नहीं हैं)युगों से भोग रहे हैं। केवल ब्राह्मणी पितृसत्ता स्वायत यौन संबंधों पर नियंत्रण लगाती है। आम भारतीय हमेशा से ही इस पितृसत्ता के दायरे से बाहर रहा है।आज हर भारतीय को इस पितृसत्ता के दायरे में जबरदस्ती लाने की धर्म के ठेकेदारों की कोशिश का पुरजोर विरोध करना आवश्यक है।
परिवार की इज्जत की खातिर
परिवार की झूठी आन बान के लिए राखी व भाई दूज धूमधाम से मनाने वाले इस देश में धर्म और संस्कृति बचाने के नाम पर बहनों तथा बेटियों की हत्या परिवार, समाज,व पंचायत की सहमति या आह्वान पर हो रही है। समाज के स्वंयभू ठेकेदार इन हत्याओं को ताल ठोक कर सही ठहरा रहै हैं। पर जेल जाने तथा अपने कर्मों की सजा भुगतने तैयार नही हैं।इसीलिए आपनी राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग कर कानून बदलवाने का कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आम भारतीय स्त्री पुरुष अपने निजी संबंधों खास कर यौन संबंधों में इस प्रकार की जड़ता स्वीकार नही करते। इसके तीन उदाहरण पिछले एक सप्ताह में देखने को मिले।
बुधवार, 23 जून 2010
भोपाल गैस पीड़ितों को न्याय
मंत्री समूह ने आखिरकार अपनी रपट प्रधान मंत्री को दे दी और उमीद के अनुरूप ही अपने सुझाव दिये। मंत्री समूह को दाव जोंस के विरुद्ध जाने की हिम्मत ही नहीं थी। अतः 25 साल बाद भोपाल का जहरीला कचरा अपने खर्चे पर निपटाने का सुझाव दे डाला। ओबामा जैसी शिद्दत से मुआवजा वसूलने का माद्दा इन मंत्रियों के पास होता तो क्या आज हमारे देश की यह हालत होता।
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