शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

जनभागीदारी की देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए बहुत अहमियत है।



जब कांग्रेस ने आप पार्टी की शर्तों को मान लिया तो आप पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के समर्थन की चिट्ठी लेकर दिल्ली की जनता के पास जाने का एलान किया।मीडिया को बताया कि जनता की राय लेने के बाद ही सरकार बनाने या न बनाने का निर्णय करेंगे। इसका स्वागत होने के बजाय आप के विरोधी राजनीतिक दलों के साथ साथ टी वी एंकर, विशेषज्ञ तथा अंय मीडिया के  लोग भी इसको आप पार्टी का टालू रवैया या सरकार न बनाने के लिए बहाने बनाने जैसे तर्क दे रहे थे। सीधे सीधे कहा जारहा था जब चुनाव में जीत कर आए हो तो राज करो।रोजमर्रा के शासन प्रशासन में जन भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है इसको पहचाने बिना आप पार्टी पर तंज किया जारहा था। शायद किसी को यह एहसास नहीं था कि सरकार पर ही नहीं समाज के विध्वंसक तत्वों पर नियंत्रण रखने के लिए जनभागीदारी आवश्यक है। यदि आमजन अपनी जिंदगी, अपना पर्यावरण, अपने संसाधनों के प्रबंधन आदि में सक्रिय न हो तो वह आसानी से देशी विदेशी स्वार्थी तत्वों के हाथों कठपुतली बन जाता है और पड़ोसी ही पड़ोसी के खून का प्यासा बन जाता है। आपस में बटा भारत कमजोर ही होगा। विदेशी ताकतों को यही चाहये। जैसे 1980-90 के दशक में अफगानिस्तान में वे स्थानीय स्वार्थी तत्वों को पैसे के बल पर खरीद रहे थे क्यों नही भारत में वे ऐसा नहीं करते होंगे। यहां पर स्टीव कौल की पुस्तक घोस्ट वार्स पेंग्विन 2004 अपने समय की न्यू यार्क टाइम्स की बैस्ट सैलर पुस्तक का जिक्र करना आवश्यक है।
 जाने माने पत्रकार,तथा पुलिट्जर पुरस्कार से नवाजे गए स्टीव काल ने 9,11,2001 घटना की पृष्टभूमि का खुलासा करने के लिए ही शायद घोस्ट वार्स नामक जो पुस्तक लिखी है। इस किताब में स्टीव काल ने सरकारी दस्तावेजों की सहायता से बड़े ही सटीक तरीके से बताया है कि किस प्रकार नवंबर 1979 से नवंबर 2001 तक विभिन्न देशों के गुप्तचर संस्थाए अपने अपने देशों के पूंजीपतियों के हित साधने के लिए अफगानिस्तान  में ही नहीं अंय देशों में भी हिंसा तोड़ फोड़ करा रही थी। इसी दौरान सोवियत संघ के विघटन की नींव भी डाल दी गई।इसमें बताया गया है कि किस प्रकार इन गुप्तचर संस्थाओं द्वारा स्थानीय स्वार्थी तत्वों को अपने पाले में लाने के लिए धन पानी की तरह बहाया जारहा था। किस प्रकार भ्रष्ट राजनीतिक, प्रशासनिक तंत्र इस धन से अपना हित साध रहा था तथा धार्मिक उंमाद और घृणा फैला कर आम गरीब जनों को एक दूसरे का हलाल करने को प्रेरित कर रहा था। इस हिंसा के लिये हथियार भी यही गुप्तचर संस्थाएं मुफ्त में दे रही थी। पेज 238 में स्टीव कौल बताते हैं कि 1992 में अफगानिस्तानवासियों के पास जो निजी हथियार थे उनकी संख्या उस समय के भारतवासियों तथा पाकिस्तानवासियों के पास के निजी हथियारों के कुल  योग से अधिक थे। 80 के दशक में अफगानिस्तान में दुनियां के किसी भी देश में भेजे गए हथियारों से अधिक हथियार भेजे गए थे।
      हमारे देश में भी जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रवाद के नाम पर विभिन्न समूह हिंसा,घृणा, वैमनश्य फैलाते रहे हैं। लोगों को आपस में लड़ाते रहे हैं। अभी मुजफ्फरनगर में हजारों लोग कड़कड़ाती ठंड में धार्मिक हिंसा के डर के मारे राहत शिविरों में रहने को मजबूर है। क्या यह हिंसा महज सत्ता पाने के लिए वोटों का धुर्वीकरण करने लिए थी या इसके पीछे कोई विदेशी हाथ है? खालिस्तान आंदोलन की विदेशी जड़ों पर अक्सर चर्चा होती थी। परन्तु क्या इंद्रिरा गांधी की हत्या व उसके बाद सिक्खों के विरुद्ध जो हिंसा हुई वह केवल उंमाद था या उसके पीछे कोई विदेशी साजिश थी? इस पुस्तक को पढ़ने के बाद यही शंका बाबरी मस्जिद ध्वंस, गोधरा व गोधरा के बाद की हिंसा, समझौता एक्सप्रेस,और मालेगांव के विस्फोटों के बारे में भी उपजती है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बम विस्फोटों की बाढ़ सी आगई है। उनके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जाता है। समझौता एक्सप्रेस व मालेगांव की हिंसा के पीछे भी विदेशी हाथ है।
  1970 के दशक में सत्ता पाने के बाद श्रीमती इंद्रिरा गांधी हर अप्रिय घटना के लिए विदेशी हाथ को जिम्मेदार ठहराती थी।विपक्ष अक्सर उनका उपहास करता था कि अपनी गल्ती मानने और सुधारने के बजाय सारा ठीकरा विदेशी हाथ के सिर फोड़ दिया जाता था। स्टीव कौल इस किताब में हम तीसरी दुनियां के वासियों के लिए विदेशी हाथ का एक नया ही आयाम खोलते हैं। इस किताब में बताया गया है किस प्रकार गुप्तचर संस्थाएं पैसा पानी की तरह बहा रही थी। और यह पैसा तथा हथियार व विस्फोटक स्थानीय स्वार्थी तत्वों को बड़ी उदारता से दिया जारहा था।और ये स्वार्थी तत्व धार्मिक वैमनष्य फैला कर गरीब गुरबों को धर्म के नाम पर अपने विरोधियों का सफाया करने के लिए लड़ने के लिए उकसा रहे थे। जहां स्वार्थी तत्व अपनी धन संपत्ति बढ़ा रहे थे तो गरीब या भूखे मर रहे थे या धर्म के नाम पर कुरबानियां दे रहे थे। हमारे यहां भी घृणा, वैमनश्य फैलाने वाले, हिंसा का आह्वान करने वाले तो सरकारी सुरक्षा में, पांच सितारा की सुविधाओं में अपनी राजनीति करते हैं। मरता आम आदमी है।कांचा इलैया ने एक लेख में लिखा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपों में जेलों में बंद अधिकतर लोग तथा कथित निम्न जातियों के थे। अंय हिंसक घटनाएं भी काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कोई अपवाद नहीं है।दुर्भाग्य से हमारे यहां स्टीव कौल जैसे खोजी लेखक नही मिलते। शायद यहां लेखकों के पास उतने साधन भी नही होते।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

मांओं तथा बहिनों का कवच




नारी के रूप अनेक और हर रूप में वह पुरुष की ही सेवा सुश्रुषा करती है। नरेंद्र मोदी कोई अपवाद नहीं है।अभी पांच राज्यों में चुनावों के दौरान जब सुरक्षा के नाम पर एक महिला की जासूसी करवाने का आरोप मोदी पर लगा तो मोदी ने अपने एक भाषण में खुद पर खतरा बताया साथ ही मांओं तथा बहिनों के कवच के संरक्षण में खुद को सुरक्षित बताया। इससे पहले जब गुजराती महिलाओं और लड़कियों के कुपोषण का मुद्दा उछला तो मोदी साहब ने फरमाया कि पतला दिखने के चक्कर में महिलाएं और लड़कियां दूध नही पीती। में इसी दौरान एक टी वी चैनल पर मल्लिका सारभाई ने बताया कि मोदी ने गुजरात की महिलाओं को आश्वासन दिया था कि उनको अपनी सुरक्षा कि चिंता करने की जरुरत नहीं है कारण उनका भाई पूरी रात जागकर उनकी रक्षा करता है। लेकिन जब 600 किसानियों जिनके पतियों ने आत्महत्या करली थी मोदी से मदद की गुहार की तो मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया। यही व्यवहार उन 150 महिलाओँ के साथ किया गया था जिनके पति जहरीली शराब पी कर मर गये थे। ऐसा लगता है मोदी माओं बहिनों से केवल लेना जानते हैं देना  नहीं। राष्ट्रीय स्तर पर भी सुषमा स्वराज सीनियरिटी के हिसाब से प्रधान मंत्री पद की सबसे मजबूत दावेदार थी। पर मोदी उनको धकिया कर खुद को आगे बढ़ा दिया। उन्होंने नही कहा कि अपनी बहिन को जिताने के लिए काम करेंगे अपने लिए नहीं। यहां तक तो फिर भी ठीक ही था। आखिर राजनीति में यह तो चलता ही है।
      लेकिन हद तो तब होगई जब मोदी ने जम्मू में अपने समर्थन में हवा बनाने के लिए काश्मीरी महिलाओं के समान अधिकारों को सवाल उठा दिया और उदाहरण काश्मीर के मुख्य मंत्री की बहिन का दिया गया। अधिकार तो गुजराती महिलाओं के खास कर उनकी स्वयं की पत्नी के भी हैं।क्या जशोदाबेन चिमनलाल मोदी(देखियेhttp://www.openthemagazine.com/article/nation/i-am-narendra-modi-s-wife) के कोई अधिकार नहीं है।  वह भी किसी की बेटी है। शादी के बाद उसके भी तो अधिकार बनते हैं। और यदि वह स्वंय ऐसे अत्याचार करते हैं तो औरों को किस मुह से रोकेंगे। 

रविवार, 17 नवंबर 2013

दूसरे के कंधे पर बंदूक




आजकल हमारे देश में स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण विभूतियों की भूमिका पर चुनावी भाषणों तीखी टिप्पणी की जारही हैं।कुछ पर देश के विभाजन तथा देश को अवनति की दिशा में लेजाने का आरोप लगाए जारहे हैं। लेकिन आरोप लगाने वाले यह नहीं बताते कि जब देश के विभाजन की तथाकथित साजिश चल रही थी उनके अपने संगठन क्या कर रहे थे। क्या उन्होंने इसे रुकवाने की असफल ही सही कोई कोशिश की थी। यदि नहीं तो आज चुनाव में फायदे के लिए इतिहास के साथ खिलवाड़ करने का किसी को क्या अधिकार है।

सरदार पटेल के उचित संमान नहीं दिये जाने के बारे में भी सवाल उठता है पिछली एनडीए सरकार ने क्यों नहीं सरदार पटेल को उचित संमान दिलाने के लिए सही कदम उठाए। असल में चुनाव के समय जनता के मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह शगूफा छो़ड़ा जारहा है।यहां पर चीन के राष्ट्रीय आंदोलन का जिक्र करना समचीन होगा।चीनी राष्ट्रीय आंदोलन के एक स्तंभ सुन येतसेन हैं। उनको राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है। विचारधारा में भिन्नता के बावजूद चीनी कम्युनिष्ट पार्टी ने न तो सुन येत सेन की राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका पर या उनके इतिहास में स्थान पर सवाल उठाए। उल्टे भारत में महात्मा गांधी जैसी हस्ती जिनके समाने विश्व की जानीमानी हस्तिया भी समय समय पर नतमस्तक होती रही हैं उनके जीवनकाल तथा बाद में अनेक प्रकार के अनर्गल आरोप लगते रहे हैं। ऐसा क्यों है। यदि अपने राष्ट्रीय आंदोलन के पुरोधा देश को गलत रास्ते पर लेजारहे थे उनकी आज आलोचना करने वाले संगठन तब चुप क्यों थे। असल में चीनी कम्युनिष्ट पार्टी की एक विचारधारा थी। अपनी विचारधारा के अनुरूप चीन को गढ़ने के लिए उसने संघर्ष किया। कुरबानियां दी। उसके लिए चुनौती अपनी विचारधारा की शुद्धता बनाए रखना उसको चीनी परिस्थियों के अनुरूप गढ़ने की चुनौती थी अतः पार्टी के भीतर ही विचारधारा पर बहस मुबाहिसा होती रहती थी।इसके विपरीत आज के देशभक्तों को पास अपने भूतकाल के बारे में बताने को कुछ नही है।आज अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए राष्ट्रीय आंदोलनों के स्तंभों पर कीचड़ उछाली जारही है।

इन सवालों के उत्तर तो मिलने ही चाहिये


आज 17,11, 2013 की सुबह किसी चैनल में  नजमा हैपतुल्ला को कहते हुए सुना कि गुजरात के 2002 के दंगों के अलावा भा.ज.पा. शासित राज्यों में दंगे नही हुए हैं.। बिहार में भी भा.ज.पा. जे.डी.यू. की दोस्ती टूटने के बाद ही सांप्रदायिक तथा आतंकी हिंसा की बारदातें होने लगी हैं।पर ऐसा क्यों होता है यह समझ में नहीं आता। बिहार में मोदी की रैली से पहले ही विस्पोट होने लगे थे। रैली स्थल में भी विस्फोट हुए। एक जिंदा बम स्टेज के नीचे पाया गया।लेकिन पूरा का पूरा नेतृत्व निर्भीक होकर अपने काम में जुटा रहा।इसके विपरीत जब संसद में हमला हुआ कोई भी नेता सुरक्षा कवज के घेरे को तोड़ कर बाहर  नही निकला। हमले का सारा दंश सुरक्षा बलों ने झेला।कई शहीद हुए। लेकिन नेता कोई बाहर नहीं निकला। बिहार रैली स्थल में ही नहीं उसके बाद भी कई जगह कई लाइव बम पाए गए । इससे पहले एक बार गुजरात में (यदि मुझे ठीक से याद है तो सूरत में) कई जगह इस प्रकार के बम पाए गए। शायद यह पता नहीं चल पाया कि इन बमों को बनाने तथा रखने में किसका हाथ था। तथा क्या कारण था कि इतने सारे बम नही फटे व कई लागों की जानें बच गई।
जब सारा देश सचिन और क्रिकेट के रंग में रगा था टीवी पर पट्टी में लिखा आरहा था की बिहार के कुछ भागों में नमक की कमी की अफवाह गरम थी और नमक 100रु. किलो तक बिक रहा था इसके बाद यह अफवाह अन्य प्रदेशों में भी फैल गई तथा नमक को 200 रु किलो तक बिकने के समाचार पढ़ने को मिले। बहुत साल पहने गणेश जी के दूध पीने की अफवाह जंगल की आग की तरह फैली।इन अफवाहों के लिए कौन जिम्मेदार था या थे पता नहीं चल पाया।

 क्या कभी इन तथा इन जैसे अन्य प्रश्नों के उत्तर मिल पाएंगे।

सोमवार, 11 नवंबर 2013

सरदार के नाम पर ठगी


सरदार पटेल अचानक ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। मोदी के गुजरात में कारपोरेट जगत की चांदी है। आम आदमी की वहां पर कोई कदर नहीं है। इस बेकदरी को ढ़कने में मोदी ने अभी तक तो अपने हिंदू कार्ड के माध्यम से सफलता पाई है।लेकिन जैसा कि सामाजिक विकास के मापदंडों से साफ हुआ है मोदी राज में आम इंसान के जीवन में किसी भी प्रकार की संपनंता नही आई है। चूंकि हिंदू कार्ड का असर पूरे देश में 2014 तक उतना पुख्ता नही किया जासकता जितना गुजरात में किया है इसलिए सरदार कार्ड खेला जारहा है। पूरे देश के किसानों से मूर्ति बनाने के लिए लोहा देने की अपील की जारही है।
किसान ही क्यों लोहा दें। कारण पटेल को सरदार की उपाधि बारडोली के किसान सत्याग्रह के बाद मिली थी। मोदी जो राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ नेताओं को पानी पी पी कर कोस रहे हैं इमानदारी से बताएं इस आंदोलन में आर एस एस की क्या भूमिका थी। दूसरा बताए किस प्रकार पिछले 10 साल में गुजरात में किसान की खुशहाली बढ़ी है। तीसरा बताएं किस प्रकार सरदार की दुनियां में सबसे विशालतम मूर्ति लगाने से गुजरात व देश के किसानों का भला होगा। यदि ये नहीं कर सकते तो कम से कम इस देश के लोगों से इतनी तो इमानदारी बरतें और कहें कि सरदार सरोवर की पृष्टभूमि में वह गुजरात में पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिये यह कदम उठा रहे हैं। मोदी तथा भा.ज.प. दोनों को समझना चाहिये कि भले ही भावनाओं में बह कर लोग आज उन पर विश्वास कर लें ,पांच साल बाद नहीं करेंगे। उत्तर प्रदेश के अपने अनुभव से सबक लेना चाहिये। इतिहास तो इस झूठ के पुलिंदे के लिए उन्हें बिलकुल माफ नही करेगा।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

125 करोड़ भारतीयों के इस अपमान के लिए जिम्मेदार



21,9,2013को टी वी चैनलों में पट्टी चल रही थी कि यह 125 करोड़ भारतीयों  का अपमान है। इस अपमान का कारण स्वामी रामदेव के अनुसार उनको इग्लेंड में कस्टम्स ने उनको रोका पूछताछ की दूसरे दिन फिर जांच के लिए हाजिर होने का वादा लेकर जाने दिया। एक टी वी चैनल में रामदेव जी का प्रवचन चल रहा था जिसमें  नाम लिए बगैर वह सोनिया गांधी को पानी पी पी कर कोस रहे थे और इस घटना के लिए सोनिया को दोष दे रहे थे।उनके श्रोता पढ़े लिखे तो होंगे ही साथ में लम्बे समय से इंग्लेंड में  रह रहे होंगे। पर वे रामदेव जी के आरोपों पर तालियां बजा कर समर्थन कर रहे थे। किसी ने भी स्वामी जी से यह नहीं कहा कि यहां पर कानून का राज है बिना कारण किसी को रोका नहीं जाता है। बाद में एक चैनल में दिखाया गया कि सारी गलतफहमी  वीजा को लेकर थी। असल में वीजा टूरिस्ट था जब कि स्वामी जी वहां योग सिखाने (जिसके लिए अछी खासी राशि ली जाती है।)अतः उन्हें व्यवसायिक वीजा दिया जाना चाहिये था।रैडिफ.काम ने भी विश्वस्त सूत्रों के हवाले बताया वीजा की विसंगतियों की वजह से ही रोका गया।राम देव बार बार कह रहे हैं कि सरकारी तंत्र ने कोई मदद नही की। जबकि इंडिया टुडे का दावा है कि भारतीय उच्चायोग के अधिकारी रामदेव के बरी होने तक हवाई अड्डे पर ही थे उन्ही के हस्तक्षेप से रिहाई हुई।सवाल है कि खुद को साधु कहने वाले स्वामी विदेशी जमी पर घटी इस घटना पर इतना झूठ बोलकर किन भारतीयों का मान बढ़ा रहे थे। पहले तो टूरिस्ट वीजा के लिए अर्जी लगाना ही गलत था।फिर सरेआम सारी घटना का गलत दोष दूसरे पर मढ़कर देश का कौन सा गौरव बढ़ा दिया। साधु संत तो अपनी गलती मानने से गुरेज नही करते।  

शनिवार, 21 सितंबर 2013

मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा के निहितार्थ



अगस्त सितंबर 2013 हुई मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा के जो तथ्य समाचार माध्यमों से सामने आए हैं उनसे साफ होजाता है कि यदि पुलिस व प्रशासन यौन हिंसा के मामलों को गंभीरता से लेता और निष्पक्ष भाव से दोषियों को कानून के हवाले करता तो सांप्रदायिक तत्वों को इस प्रकार की हिंसा के बहाने जन भावनाओं को भड़काने का मौका नहीं मिलता। यह तब होता जब पुलिस प्रशासन शासकों के राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होता। पुलिस प्रशासन को अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए पुलिस रिफार्म आवश्यक हैं। समस्त पुलिस प्रशासन को यौन हिंसा पीड़ितों के दुख दर्दों के प्रति संवेदनशील बनाना दूसरी आवश्यकता है।यदि पुलिस प्रशासन यौन हिंसा के मामलों में जीरो टौलरेंस की नीति अपना ले तो समाज में कई मूलभूत परिवर्तन आजाएंगे। मसलन यौनहिंसा पीड़ित स्वंय पुलिस की सहायता से मुजरिम को कानून का हवाले करा सकती है। ऐसी अवस्था में परिजनों को कानून को हाथ में लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।कमजोर परिवारों व समाजों की महिलाओं को भी न्याय मिलने का विश्वास रहेगा। ऐसे आश्वस्त समाज की भावनाओं को भड़काने लिए  सांप्रदायिक तत्वों के लिए आसान  नहीं होगा।
दूसरा इस जघन्य हिंसाकांड ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजानीति नेताओं के बबुवाओं के बस की नहीं है। राजनीति करने के लिए समाज में रचा बसा होना आवश्यक है। सारी सुविधाओं से लैस पांचसितारा माहौल में बचपन व यौवन काटने के बाद चांदी काटने के लिए राजनीति में आना इस देश व देशवासियों के साथ घोर अन्याय है। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने अभी तक समय की नजाकत को पहचान कर मौके पर पहुच कर आमजन के जख्मों पर मरहम लगाने का जरुरत को महसूस नहीं किया है।इसके विपरीत एक पत्रकार ने अपने लेख में लिखा कि उन्हें अधिकारियों की जमीनी स्तर की रपटों को सुनने में भी कोई रस नहीं आता। ऐसे अवसरों पर थोड़े समय बाद ही वे अपना धैर्य खो बैठते हैं और अपने मोबाइल फौन को पढ़ने लगते हैं। साफ है उन्हें जनता के मामलों को गंभीरता से लेने का पाठ नही पढ़ाया गया है।
सांप्रदायिक हिंसा के बाद हिंसा पीड़ितों को धर्म के आधार पर रेखांकित किया जाता है।सुरक्षा, मुआवजा, पुनर्वास धर्म के आधार पर पीड़ितों को दिया जाता है। परंतु बड़ी संख्या में दंगों की वजह से गरीब मजदूर, रेहड़ी खोम्चे वाले बेरोजगार होगए।बड़ी संख्या में ये लोग सपरिवार पलायन कर चुके हैं। पर उनके इस विस्थापन की ओर सरकार, या पत्रकारों  किसी का भी ध्यान नही गया। दिल्ली की एक छोटी सी बैठक में इस इलाके से दिल्ली पीएचडी करने आए एक सज्जन ने बताया कि कई हजार दलित मजदूर वहां से पलायन कर गए हैं। अभी दो तीन दिन पहले जनसत्ता में छपी एक खबर के अनुसार यहां किसानों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। कारण दंगों की वजह से वे सपरिवार पंजाब या उत्तराखंड को पलायन कर चुके हैं।  परंतु किस मजबूरी में उन्हें पलायन करना पड़ा। इससे उन्हें कितना नुकसान हुआ इसपर किसी को खोज करने की जरूरत नहीं पड़ रही है। यहा यह कहना प्रासंगिक है कि गरीब तथा महिलाएं ही दंगों की मार सबसे अधिक झेलती हैं।